अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*मुख्य न्यायाधीश पर हमला: धर्म की राजनीति और संविधान की सीमाएं*

Share

-तेजपाल सिंह तेज’

           सीजेआई जस्टिस बीआर गवई जी पर सुप्रीम कोर्ट मे सुनवाई के दौरान जूता फेंकने वाला शख्स नफरत जीवी कथित सनातनी संघी राकेश किशोर है जिसने सुप्रीम कोर्ट मे ये बेशर्मी से कहा कि “सनातन का अपमान नही सहेंगे, ये वकील उसी नफरती, नस्लीय, जातिवादी सोच का प्रतिनिधित्व करता है जो एक तेजी से असहिष्णु, अनुदान, कट्टर, जॉम्बी बनते जा दौर मे कटाक्ष भी बर्दाश्त नही कर पा रहे। शीर्ष संवैधानिक पद पर आसीन न्यायाधीश के साथ जब गली के गुंडों की तरह बर्ताव होने लगता है, तब हमें मनन करना होगा कि इस सिस्टम मे आखिर हमारी हैसियत क्या है? पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविद को दलित होने की वजह से मंदिर मे प्रवेश नही करने दिया, सर्वोच्च संवैधानिक सत्ता को धर्मसत्ता ने ठेंगे पे रख दिया। इसके पूर्व जीनियस राष्ट्रपति के आर नारायणन को दलित होने की वजह से एवं अटल बिहारी वाजपेयी को संविधान समीक्षा प्रस्ताव पर मुँह की खाने पर दुबारा अवसर नही दिया गया।  पूर्व राष्ट्रपति नारायणन जी के सवाल उठाने पर भारत की सुप्रीम कोर्ट को जस्टिस बालकृष्णन के रुप मे पहला दलित सीजेआई मिला,तत्कालीन सीजेआई बालाकृष्णन जी को भी मीडिया में खबरें प्रायोजित कर उनके दामाद के नाम पर उनकी छवि को चोट पहुंचाई गई जबकि उसी दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य पीएम आवास मे कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया के माध्यम से डील कर रहा था जो मीडिया की सुर्खियो से गायब था। कहने का तात्पर्य ये है कि बाबा साहब अम्बेडकर से लेकर राम सुंदर दास, बाबू जगजीवन राम से लेकर मायावती जी, जस्टिस बालाकृष्णन से लेकर गवई साहेब तक दलित/वंचित समाज के होने के कारण सलीब पर टांगा गया है। पिछले वर्ष 1 अगस्त 2024,को एससी एसटी आरक्षण मे उपवर्गीकरण जैसा अप्रिय निर्णय देकर जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड़ (तत्कालीन सीजेआई)की हां मे हां मिलाने वाले गवई जी को अहसास हो गया होगा कि इस देश में जाति के दैत्य से निपटना कितना मुश्किल है। तिरूपति बालाजी मंदिर मे चर्बी मे लड्डू मिलाने के केस पर जब सुनवाई करते हुए धार्मिक मामलों को राजनीति से दूर रखने का निर्णय दिया था, तब उनकी वाहवाही हुई थी, वहीं दूसरी तरफ जब मध्यप्रदेश के एक धार्मिक स्थल के मामले मे याचिकाकर्ता की जनहित याचिका को खारिज करते हुए उन्होने भगवान विष्णु की मूर्ति को पुरातत्व विभाग का मामला बताते हुए एक पासिंग रिमार्क दिया तो उसे सनातन के अपमान से जोड़ दिया गया। क्या न्यायपालिका के फैसले भी अब आस्था एवं बहुसंख्यको की इच्छाओं से तय होगे? बेहतर होगा कि अपने बचे हुए डेढ माह के कार्यकाल मे सीजेआई गवई एक लकीर खींच के बिदाई लें कि न्यायपालिका का खौफ हर आतंकवादी को उसकी सीमा का अहसास करा दे एवं न्यायालय की स्वायत्तता, निष्पक्षता एवं अखंडता पर  कोई प्रश्नचिन्ह न लगा सके। अब ये गवई साब को तय करना है कि वो इतिहास लिखने वाले बनेंगे या इतिहास बनने को अभिशप्त होंगे।

          रवीश कुमार के हवाले से 06.10.2025 को सुप्रीम कोर्ट में घटित एक निंदनीय घटनाओं का विश्लेषण करने पर जो कहानी सामने आती है, वह है  कि   सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर अदालत के भीतर एक वकील ने सार्वजनिक रूप से निंदा की। अदालत ने इस वकील, राकेश किशोर, के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया। पुलिस ने भी स्वयं को निर्दोष बताते हुए मानहानि की प्रक्रिया को समाप्त कर दिया। इस तरह, सनातन धर्म के नाम पर की गई इस गुस्ताखी को अदालत की उदारता का कवच मिल गया।

          लेकिन यह घटना केवल एक वकील की बदतमीजी या मानसिक असंतुलन का मामला नहीं है — यह उस “अधिकार” की कहानी है, जिसके नाम पर कोई व्यक्ति मुख्य न्यायाधीश को खुलेआम अपमानित कर सकता है। यह उस मानसिकता की कहानी है, जो धर्म के नाम पर संविधान से ऊपर उठकर बोलने की हिम्मत जुटा चुकी है। जब राकेश किशोर को सुरक्षा कर्मी कोर्ट से बाहर ले जा रहे थे, तब वह चिल्लाया — भारत सनातन का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा।” यह सिर्फ एक नारा नहीं था, बल्कि एक चेतावनी थी — कि अब यह राजनीति तय करेगी कि “सम्मान” क्या है और “अपमान” क्या। अगर यही नारा किसी और धर्म के नाम पर लगाया गया होता, तो शायद अदालत का रुख कुछ और होता।

दलित मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अपमान की भाषा:

          मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई भारत के दूसरे दलित और पहले बौद्ध मुख्य न्यायाधीश हैं। उनकी नियुक्ति के कुछ घंटे बाद ही, अदालत के अंदर “जय भीम” के नारों की चर्चा हुई थी — एक ऐसा नारा जो समानता, न्याय और संवैधानिक मर्यादाओं का प्रतीक है। आज वही व्यक्ति धर्म के नाम पर अपमान का निशाना बन रहा है। अदालत की चुप्पी यहाँ चिंताजनक है। यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे संवैधानिक ढांचे का अपमान है। जब संविधान का रक्षक स्वयं निशाने पर हो, तो बाकी देश किस सुरक्षा की उम्मीद करे?

घटना के राजनीतिक और सामाजिक संकेत:

          जूते फेंकने की यह घटना अचानक नहीं घटी। इसके पीछे महीनों से चल रही वैचारिक ज़मीन तैयार की गई थी। 16 सितंबर को एक याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा था — जाओभगवान से कहो कि वे स्वयं कुछ करें।” यह टिप्पणी धार्मिक कट्टरपंथियों के लिए बहाना बन गई। सोशल मीडिया पर मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ नफरत फैलाने वाले वीडियो बनने लगे। गोदी मीडिया के एंकरों ने भी इसमें आग में घी डालने का काम किया। और नतीजा — अदालत के भीतर एक 70 वर्षीय वकील जूता लेकर पहुंच गया, “सनातन” के नाम पर मुख्य न्यायाधीश को सज़ा देने। यह वही राजनीति है जिसने कभी “जय श्री राम” के नारे के बीच मुसलमानों को पीटा, और कभी चलती ट्रेन में निर्दोष लोगों को मार दिया। अब यह राजनीति न्यायालय तक पहुँच गई है।

मौन सत्ता और उदार अदालत:

          कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सही कहा कि यह हमला न्याय व्यवस्था पर सीधा आघात है। सोनिया गांधी ने भी कहा कि यह हमला केवल व्यक्ति पर नहीं, संविधान पर है।
तमिलनाडु और केरल के मुख्यमंत्रियों ने भी इसे “असहिष्णुता की पराकाष्ठा” कहा।
फिर भी, देश के गृह मंत्री और कानून मंत्री की चुप्पी बहुत कुछ कहती है। अदालत ने भी जो उदारता दिखाई, उसे लोकतांत्रिक सहिष्णुता नहीं, बल्कि संस्थागत असहायता के रूप में देखा जाएगा। जब अदालत किसी वैचारिक अपराध को धर्म के नाम पर माफ़ कर देती है, तो यह संदेश देती है कि संविधान अब राजनीति के आगे झुक चुका है।

संविधान बनाम धर्म की राजनीति:

          आज स्थिति यह है कि धर्म की राजनीति ने खुद को सर्वोच्च न्यायालय से भी ऊपर समझना शुरू कर दिया है। अब वही तय करती है कि संविधान क्या कहेगा और न्याय की सीमा कहाँ तक जाएगी। जातिवादी मानसिकता ने धर्म का मुखौटा पहन लिया है। और अदालतें, मीडिया, और सरकार — सभी इस मुखौटे के आगे झुकते नजर आते हैं। अगर भारत का सर्वोच्च न्यायालय अपने ही मुख्य न्यायाधीश के प्रति ऐसी असहायता दिखाएगा, तो गाँव के किसी दलित किसान या कर्मचारी के साथ क्या होगा? यह घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि यह एक वैचारिक हिंसा है — उस सोच के ख़िलाफ़ जिसने कभी कहा था, जय भीमजय संविधान।

अंत में

          मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने जो संयम और सहिष्णुता दिखाई, वह उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता को दर्शाता है। लेकिन अदालत की चुप्पी संविधान की आत्मा को कमज़ोर करती है। यह वह समय था जब न्यायपालिका एक स्वर में इस वैचारिक हिंसा की निंदा कर सकती थी — लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। आज धर्म की राजनीति कह रही है — यह मेरा देश हैमेरा संविधानमेरा न्याय।” और अदालतें मौन हैं। मौन केवल शब्दों की अनुपस्थिति नहीं होती, यह प्रतिरोध का अंत भी होता है।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें