सनत जैन
दक्षिण एशिया में लोकतंत्र की जड़ें गहरी जरूर हैं, लेकिन समय-समय पर सत्ता के केंद्रीकरण और संस्थाओं पर राजनीतिक नियंत्रण ने इन जड़ों को कमजोर किया है। 2018 में बांग्लादेश में लागू साइबर सिक्योरिटी एक्ट ने लोकतंत्र की उस बुनियाद को हिला कर रख दिया था, जिस पर स्वतंत्र मीडिया और अभिव्यक्ति की आज़ादी टिकी होती है।
पत्रकारों, ब्लॉगर्स और आलोचकों को चुप कराने, मीडिया संस्थानों पर सेंसर लगाने, और चुनाव आयोग तथा न्यायपालिका को सरकार के नियंत्रण में लाने की प्रक्रिया ने धीरे-धीरे एक तानाशाही शासन का रूप ले लिया। परिणामस्वरूप, 2024 के आम चुनावों में विपक्ष के बहिष्कार, हिंसा और धांधली ने बांग्लादेश की लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को पूरी तरह खत्म कर दिया।
आवामी लीग की शेख हसीना ने 300 में से 224 सीटें जीतकर सत्ता तो बचा ली, लेकिन जनता का भरोसा खो दिया। इसी के साथ कहा गया कि चुनाव आयोग, न्यायपालिका और पुलिस पर सरकार का सीधा नियंत्रण हो गया। तत्कालीन सरकार के इशारे पर पुलिस कार्यवाही करती देखी जाने लगी और न्यायालय फैसला देने लगे। सत्ता का दुरुपयोग शुरू हुआ तो हसीना सरकार के सारे फैसले राजनीतिक हित साधने वाले और हर शासकीय काम में धनसंग्रह वाले दृष्य दिखाई दिए।
सरकार का एक तरफा निर्णय होना शुरू हुआ। वहीं दूसरी तरफ महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने लोगों में असंतोष फैला दिया, और जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन में 400 से अधिक छात्रों की मौत ने जनाक्रोश को विस्फोटक बना दिया। जब जनता और विपक्ष दोनों को लगा कि चुनाव आयोग सरकार का औजार बन चुका है, न्यायपालिका निष्क्रिय है और पुलिस सत्ता की कठपुतली बन चुकी है, तब शासन की वैधता खत्म हो गई। अंततः 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को अकस्मात देश छोड़ना पड़ा, यह उस राष्ट्र का पतन था जिसने कभी स्वतंत्रता के लिए आंदोलन किया था, पर अब जहां लोकतंत्र खोता हुआ दिखाई दिया। दुर्भाग्य से, भारत में भी कुछ परिदृश्य अब उसी दिशा में जाते दिखाई दे रहे हैं।
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बार-बार उठते सवाल, विपक्ष की शिकायतों पर निष्क्रियता, और सरकार की मर्जी से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, ये सब संकेत हैं कि लोकतांत्रिक संस्थाएं अब स्वतंत्र नहीं रहीं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) जैसी संस्था जब चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठाती है और सुप्रीम कोर्ट से न्याय की जगह तारीखें मिलती हुई नजर आती हैं, तो यह चिंता का विषय हो जाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के बैंक खाते फ्रीज कर दिए गए, जबकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं द्वारा बार-बार आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों पर भी चुनाव आयोग चुप रहा।
अदालतों से भी तत्काल राहत नहीं मिली; ‘तारीख पर तारीख’ ने जनता का न्यायपालिका से भरोसा डगमगा दिया। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने की घटना और उसके बाद देशभर में मिली मिश्रित प्रतिक्रियाएं इस विश्वास संकट को और गहरा कर रही हैं। भारत के लोकतंत्र में जनता का भरोसा सबसे बड़ा स्तंभ रहा है, लेकिन जब यह भरोसा डगमगाने लगे, तब यह चेतावनी होती है कि व्यवस्था खतरे में है। आज बेरोजगारी, महंगाई और युवाओं का असंतोष एक उभरता हुआ सामाजिक विस्फोट बनता जा रहा है।
लेह में चार युवाओं की मौत और सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी ने इस बेचैनी को और बढ़ाया है। यह केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की आवाज है जो अपने भविष्य के लिए चिंतित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को 11 वर्ष हो चुके हैं। 2014 में जब वे सत्ता में आए थे, तो उन्होंने रोजगार, विकास और भ्रष्टाचारमुक्त शासन के वादों के साथ “नई उम्मीद” जगाई थी। परंतु आज जब बेरोजगार युवा सड़कों पर हैं, और चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम भी बांग्लादेश जैसी दिशा में तो नहीं बढ़ रहे?
वैसे भी अब पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा को लेकर लोगों में वह विश्वास नहीं दिख रहा जो 2013-14 में देखने को मिला था। हद यह है कि 2024 के बाद से सारे देश में यह धारणा बनने लगी कि भाजपा चुनाव प्रबंधन करके चुनाव जीत रही है। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का आरोप है, चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव में मतदाता सूची और मतगणना में गड़बड़ी कराकर यह चुनाव भाजपा के पक्ष में प्रभावित किया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार 45 दिन के अंदर जो चुनाव याचिकाएं हरियाणा और महाराष्ट्र में दायर की गईं उसके बाद सरकार ने जिस तरह से नियमों को बदला है और चुनाव आयोग मनमाने तरीके से अपने निर्णय को बार-बार बदल रहा।
इन सब को देखते हुए युवाओं को अब लगने लगा है, चुनाव आयोग पर विश्वास नहीं किया जा सकता। इसलिए बिहार में वोट चोरी के विरोध में रैली निकाली गई, वोट चोर गद्दी छोड़ के नारे लगे। पिछले एक माह में जिस तरह से युवा विभिन्न मांगों को लेकर सड़कों पर आते दिख रहे हैं, जिस तरह के नारे लगाए रहे हैं यह कहीं ना कहीं यह दिखा रहे हैं कि बांग्लादेश और नेपाल में जो हुआ है लगभग उसी तरीके की स्थिति भारत में भी बनने लगी है। लेह में 4 युवाओं की मौत और फिर शांति पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक को जिस तरह से सरकार ने गिरफ्तार कर जेल भेजा, उसकी भी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया देश भर में देखने को मिल रही है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि चुनाव आयोग, न्यायपालिका और मीडिया जैसी संवैधानिक संस्थाएं सत्ता के दबाव में कार्य करेंगी, तो लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा। लोकतंत्र की आत्मा जनविश्वास और निष्पक्षता खो जाएगी।
यह याद रखना होगा कि संविधान किसी सरकार या दल का नहीं, जनता का दस्तावेज़ है। उसकी रक्षा हर संस्था और हर नागरिक का कर्तव्य है। भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। देश को बांग्लादेश या श्रीलंका की तरह आंदोलन और अराजकता की दिशा में जाने से रोकने के लिए जरूरी है कि संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र और पारदर्शी बने रहें। सत्ता, विपक्ष और न्यायपालिका ये तीनों को अपनी सीमाएं पहचाननी होंगी और जनता के विश्वास को प्राथमिकता देनी होगी।
यदि देश के अंदर से आमजन की ओर से आती यह चेतावनी अब भी न समझी गई, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत भी बांग्लादेश की तरह लोकतंत्र के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभाने वाला राष्ट्र बन जाएगा। इसलिए यह समय है आत्ममंथन का। सरकार, संस्थाओं और समाज, तीनों को यह तय करना होगा कि वे लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं या सिर्फ उसकी परछाई को।





