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*सवाल पूछने पर सोशल मीडिया पर अंकुश*

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          आज भारत की धरती पर सवाल पूछना अपराध बनता जा रहा है। पत्रकारिता की स्वतंत्र आवाज़ दबाने के लिए चैनल्स बंद कर दिए जा रहे हैं, यूट्यूबर और रिपोर्टर डर के साए में जीते हैं, और लोकतंत्र का सबसे बुनियादी अधिकार — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — संकट में है। “हमने प्रधानमंत्री चुना था, तानाशाह नहीं।” यह सिर्फ़ नारा नहीं, बल्कि हर नागरिक का सवाल है, हर पत्रकार की पुकार है, और हर युवा की चिंता है। भारत में लोकतंत्र की नींव जनता की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आधारित है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, इन मौलिक अधिकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं। सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों, कलाकारों और नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला: उदाहरण और सच्चाई:

          द न्यूज़ लॉन्चर और 4PM जैसे स्वतंत्र प्लेटफ़ॉर्म लगातार सवाल उठा रहे थे — पहलगाम से लेकर डॉ. वेंदुसा, नेहा राठौड़ और बंद हुए कई अन्य चैनलों तक। इन सवालों में शामिल थी सत्ता की जवाबदेही, सरकारी लापरवाही, और नागरिक सुरक्षा के मुद्दे। लेकिन सत्ता का जवाब केवल एक ही था: “चुप रहो, या बंद हो जाओ।”

           न्यूज़ लॉन्चर के उदाहरण को लें। यह चैनल लाखों दर्शकों तक सच्चाई पहुँचाता था। सवाल उठाता था — 26 मौतों के मामले में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की जिम्मेदारी, आतंकवाद से सुरक्षा में चूक, कश्मीर में नागरिकों की सुरक्षा की स्थिति। और अचानक, चैनल को बंद कर दिया गया। केवल इसलिए कि उसने सवाल पूछे। संजय शर्मा का 4PM भी इसी तरह निशाना बना। चैनल पर आरोप लगाए गए, धमकियाँ मिलीं, लेकिन पत्रकारों ने सवाल पूछना नहीं छोड़ा। यह दर्शाता है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना ही नागरिक और मीडिया की जिम्मेदारी है। सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। वशिष्ठ का चैनल भी बंद हुआ। लेकिन जनता और पत्रकारों के समर्थन के कारण वह वापस आया। यह साबित करता है कि यदि सवाल उठाने वालों को समर्थन मिले, तो लोकतंत्र जीवित रह सकता है।

सत्ता की असहिष्णु प्रवृत्तियाँ:

          प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का रवैया सवालों से बचाव की ओर इशारा करता है। 26 मौतों के मामलों में माफी नहीं माँगना, विशेष सत्र नहीं बुलाना, जनता के सामने सीधे जवाब नहीं देना — ये संकेत हैं कि सत्ता अब तानाशाही प्रवृत्ति दिखा रही है। लोकतंत्र में जवाबदेही सरकार की दायित्व है और नागरिकों का अधिकार है। सवाल पूछने का अधिकार हर नागरिक का है। जब सत्ता इसे रोकती है, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। जब राहुल गांधी और मल्लिका अर्जुन खड़गे ने संसद में विशेष सत्र बुलाने की मांग की, तब सवाल वही थे: जवाबदेही कहाँ है? क्या प्रधानमंत्री और गृह मंत्री अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं? क्या नागरिकों के सवालों का सामना करने का साहस दिखाएंगे, या केवल दिखावा करेंगे?

मीडिया का बदलता चरित्र:

          आज मीडिया स्वतंत्र नहीं रहा। कॉर्पोरेट घरानों और राजनीतिक दलों की धुरी में फँसा मीडिया केवल वही दिखाता है जिसे दिखाने का आदेश मिलता है। सवाल उठाने वालों को चुप कर दिया जाता है। द न्यूज़ लॉन्चर की टीम ने साफ कहा: “हमने कभी किसी से मदद नहीं मांगी। हम किसी राजनीतिक दल या कॉरपोरेट घराने के अधीन नहीं हैं।” यही स्वतंत्रता की कीमत है। यह भीख नहीं, यह संघर्ष है। लेकिन इस संघर्ष में अकेले रहना पड़ता है। वित्तीय संकट, धमकियाँ, चैनल बंद करना — ये सब उसी स्वतंत्र पत्रकारिता का परिणाम है जो सच्चाई दिखाने की हिम्मत रखती है। वॉइस ऑफ़ विजडम ट्रस्ट ने खुलकर कहा कि उनके पास वित्तीय संसाधन सीमित हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे सवाल पूछना बंद करेंगे। सवाल पूछना ही लोकतंत्र की आत्मा है।

इतिहास की चेतावनी:

          इंदिरा गांधी के आपातकाल में भी प्रेस ने संघर्ष किया। आज भी पत्रकार वही लड़ाई लड़ रहे हैं, हाँ!  डिजिटल मीडिया का जाल और व्यापक है। स्वतंत्र पत्रकारिता अब YouTube, सोशल मीडिया और छोटे चैनल्स पर जीवित है। यही वजह है कि सत्ता इन्हें दबाना चाहती है। यदि सवालों का प्रवाह रोका गया, तो जनता को सच तक पहुँचने का रास्ता बंद हो जाएगा। लेकिन आज का संकट अधिक गहन और चुपके से है। इसे “अघोषित आपातकाल” भी कहा जा सकता है। इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल लगाया, तो संसद में बहुमत था, प्रेस पर सेंसरशिप थी। आज भी यही संकेत मिल रहे हैं, लेकिन डिजिटल माध्यमों के कारण इसे पूरी तरह नियंत्रित करना आसान नहीं। यही वजह है कि स्वतंत्र पत्रकारों पर वित्तीय और कानूनी दबाव निरंतर बढ़ता जा रहा है।

संवेदनशील घटनाओं का विश्लेषण:

·        पहलगाम: यहाँ हुई हिंसा और सुरक्षा की चूक पर सवाल उठाना केवल पत्रकारिता नहीं, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी है।

·        डॉ. वेंदुसा और नेहा राठौड़: इन मामलों में भी मीडिया ने सवाल उठाए कि प्रशासन की जवाबदेही कहाँ है।

·        28 मृतकों का मामला: बच्चों और युवाओं का भविष्य खतरे में। पत्रकारों के सवाल पर जवाब नहीं देना लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है।

          इन घटनाओं में स्पष्ट है कि सवाल पूछने वाले पत्रकार जनता के लिए सुरक्षा और जवाबदेही की आवाज़ हैं। यदि इन्हें दबाया गया, तो यह न केवल मीडिया की हानि नहीं, बल्कि समाज की  भी हानि होगी।

स्वतंत्र पत्रकारिता की चुनौती:

          आज पत्रकारिता केवल खबर देने तक सीमित नहीं रही। यह प्रतिरोध बन गई है। यह चेतावनी बन गई है। यह सवाल बन गई है। स्वतंत्र पत्रकारिता की कीमत संघर्ष है, डरावनी परिस्थितियाँ हैं, लेकिन यही स्वतंत्रता का असली रूप है। वित्तीय संकट, धमकियाँ, चैनल्स का बंद होना — यह सब वही कीमतें हैं जो पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए चुकानी पड़ती हैं। वॉइस ऑफ विजडम ट्रस्ट ने स्पष्ट किया कि वे किसी से मदद नहीं लेंगे, वे स्वतंत्र रहेंगे, वे सवाल पूछते रहेंगे।

प्रधानमंत्री और जवाबदेही:

          प्रधानमंत्री का रवैया स्पष्ट रूप से सवालों से बचाव की ओर है। यदि किसी त्रासदी में माफी नहीं मांगते, तो नागरिकों का विश्वास टूटता है। लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही ही नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि किसी का बचपन किसी मोहल्ले विशेष में बिताने अथवा किसी समुदाय विशेष के मुहल्ले में रहने से सवालों का सामना करना नहीं नकारा जा सकता। सवालों का सामना करना, जवाब देना, माफी माँगना — यही सरकार की जिम्मेदारी है। जनता को जवाब देना तानाशाही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव है।

जनता की भूमिका : लोकतंत्र की रक्षा के लिए एकजुटता आवश्यक

स्पष्ट है कि सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर लगातार हमले कर रही है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। हमें इन हमलों का विरोध करना होगा और लोकतंत्र की रक्षा के लिए एकजुट होना होगा।”हमने प्रधानमंत्री चुना था, तानाशाह नहीं” — यह पंक्ति आज के भारत की सच्चाई को जैसे उजागर करती है। हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा और लोकतंत्र की रक्षा के लिए कदम उठाने होंगे।

          आज 143 करोड़ भारतीयों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल वोट देने तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र सरकार से सवाल पूछने, जवाब मांगने, और सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करने में जीवित रहता है। यही कारण है कि पत्रकार और स्वतंत्र मीडिया इतने महत्वपूर्ण हैं। सवाल पूछने वाले पत्रकार और चैनल्स केवल आवाज़ नहीं हैं। वे लोकतंत्र के प्रहरी हैं। यदि उनके माध्यम से सवालों का प्रवाह रोका गया, तो लोकतंत्र कमजोर होगा। यही वजह है कि द न्यूज़ लॉन्चर यूपी और अन्य प्लेटफ़ॉर्म पर लोगों से अपील की जा रही है।

निष्कर्षत: यह लेख केवल पत्रकारिता की स्थिति की आलोचना नहीं है। यह देश की आत्मा की पुकार है। जब सत्ता सवालों से डरती है, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ता है। जब सत्ता जवाबदेही से भागती है, तो नागरिकों का विश्वास टूटता है। और जब पत्रकार डरे बिना सवाल उठाते हैं, तब ही लोकतंत्र बचता है। “हमने प्रधानमंत्री चुना था, तानाशाह नहीं।” जनता और मीडिया की यह सोच व्यर्थ ही नहीं है, ऐसा लगता है। यह सोच एक चेतावनी भी है। यह पुकार है। यह प्रश्न है। क्या हम इसे जी भर कर सुनेंगे, या चुप रहकर इतिहास को दोहराएँगे? सवाल पूछना अपराध नहीं है। सवाल पूछना लोकतंत्र है।

          आज की लड़ाई केवल चैनलों की नहीं, यह हर भारतीय की लड़ाई है। यह हमारी स्वतंत्रता, हमारी अभिव्यक्ति और हमारी जवाबदेही की लड़ाई है। अगर हम खड़े नहीं हुए, तो कल आवाज़ें और भी दब जाएँगी। अगर हम समर्थन नहीं करेंगे, तो स्वतंत्र पत्रकारिता समाप्त हो जाएगी। लेकिन उम्मीद है। उम्मीद है क्योंकि जनता जाग रही है। उम्मीद है क्योंकि सवाल उठाने वाले अकेले नहीं हैं। उम्मीद है क्योंकि लोकतंत्र की धुरी अब भी हिलती नहीं है। और यही वह संदेश है जो हमें आगे ले जाएगा।

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Ramswaroop Mantri

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