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*उत्सव जब दम घोंटने लगे!वर्तमान भयावह घुप अंधेरे में फंस गया है*

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आज स्थिति बद से बदतर हो चली है। मिथक, धर्म, संस्कृति, मूल्य और मान्यता जब राजनीति के गिरफ्त में चली जाए, इसमें राज्य सक्रिय भूमिका निभाने लगे और न्यायपालिका के निर्णयों में पूर्वाग्रह प्रभावी हो जाए, तब मानकर चलिए कि सिर्फ इतिहास का नाश नहीं हो रहा है, वर्तमान भयावह घुप अंधेरे में फंस गया है।यह अंधेरा सिर्फ हवा और संस्कृतियों का नहीं है, यह मूलतः हमारी आर्थिक बदहाली का असल रूप है जिसमें जीना और भी मुश्किल होता जा रहा है। आर्थिक बदहालियों के दौर में जादू, टोना, धार्मिक प्रयोजन और नशे में धुत हो जाना अपने समय की चुनौतियों से सिर्फ भागना ही नहीं है, यह प्रायोजित सामूहिक उन्माद में हिस्सा बन जाना भी है। हम जानते हैं कि यह बेहद आत्मघाती है।

अंजनी कुमार

साल-दर-साल दिल्ली की दिपावली प्रदूषण के मामले में भयावह होती जा रही है। पिछले वर्षों जब पटाखों पर प्रतिबंध लगा हुआ था तब स्थिति में कोई खास सुधार नहीं दिखा लेकिन इस बार तो दिल्ली सरकार की ओर पटाखों पर प्रतिबंध हटाने के लिए न्यायपालिका में किया गया आग्रह और कुछ शर्तों के साथ ‘ग्रीन पटाखों’ को अनुमति दे देने के बाद तो स्थिति और भी बदतर हो गई।

यहां दिल्ली की हवा में माइक्रो पार्टिकल यानी पीएम के दो रूपों के बढ़ने का आंकड़ा देने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। इसी तरह एक्यूआई को गिनने का भी कोई अर्थ नहीं रह गया है। जब सरकार और न्यायपालिका एक ही निर्णय पर आ जाएं तब होने वाले परिणाम का अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं था। ऐसे में, पर्यावरण के मापन अंक को देखने का कोई अर्थ नहीं बचा था। दिल्ली की हवा में तैरते जहर को देखना और उसकी भयावहता को मापने के लिए किसी मशीन की जरूरत ही नहीं रह गई थी।
यहां यह देखना जरूरी है कि दिपावली पर इतना जोर पटाखों पर और दीयों की गिनती पर क्यों जा रहा है? धार्मिक मौकों पर राज्य की भागीदारी क्यों इतनी तेजी से बढ़ रही है? सांस्कृतिक मूल्यों पर राजनीति की चाशनी इस तरह चढ़ा दी जा रही है जो हवा में जहर की तरह तैरने लगती है? यह सबकुछ इस स्तर पर हो रहा है जिसमें न्यायपालिका का ‘विवेक’ भी इसकी जद में आ जा रहा है और निर्णयों में सीधा इसका असर दिख रहा है। ऐसे में, एक सामान्य नागरिक के विवेक पर ही हम क्यों सवाल खड़ा करें?
दिपावली को लेकर कई तरह के मिथक हैं। आजकल कई बौद्धधर्म के विद्वान इसे बुद्ध की परम्परा से जोड़कर देखते हैं। कई लोग इसे राम के रावण पर जीत के बाद अयोध्या वापसी पर होने वाले उत्सव की परम्परा में देखते हैं। निश्चित ही, इसमें एक बड़े समुदाय की हार का मसला भी सम्मिलित है।

कई लोग इसे फसल चक्र में होने वाले परिवर्तनों से जोड़कर इसे देखते हैं। इस तरह के त्योहार पर पूरी दुनिया में परम्परा की तरह चले आ रहे हैं। लेकिन, जिस तरह से परम्परा, मान्यता और इतिहास के नाम पर त्योहारों को संस्कृति, धर्म की मान्यताओं से जोड़ दिया जा रहा है, वह नया है। पिछले कुछ दशकों से इस तरह के त्योहारों को जिस तरह से उन्माद में बदल दिया जा रहा है, वह पूरी तरह से नया है।

उन्माद में बदल देने में राज्य, राजनीतिक पार्टी, सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन और यहां तक कि न्यायपालिका तक इसमें सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इस प्रक्रिया में मिथक, परम्परा, मान्यताएं गुणात्मक तौर पर बदलकर एक नया, लेकिन भयावह रूप ले रहा है जिसमें हिंसक उन्माद की मानसिकता शामिल होती जा रही है। यह कई मामलों में आत्मघाती है।
यह देखना उपयुक्त होगा कि दुनिया में होने वाले दिपावली जैसे त्योहार उन देशों में क्या रूप अख्तियार कर रहे हैं? और, भारत में किस तरह से मनाये जा रहे हैं? इस संदर्भ में हम अन्य त्योहारों को भी देख सकते हैं? राम नवमी पर निकलने वाले जुलूस की तुलना हम अन्य धर्मों के प्रवर्तकों पर होने वाले कार्यक्रमों से तुलना कर इसे और आसानी से समझा जा सकता है?

इसी तरह गणेश पूजा, हनुमान जयंती और कांवड़ यात्रा में आ रहे बदलाव का भी तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। इतना साफ है दिखता है कि भारत में धार्मिक त्योहारों का आग्रह का ग्राफ पिछले 30 सालों में तेजी से ऊपर गया है और इसमें हिस्सेदारी त्योहारों की संख्या की बढ़ोत्तरी के प्रतिशत से कहीं अधिक बढ़ा है।

इस आधार पर एक सामान्य निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत के परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों की मान्यताओं में बढ़ोत्तरी हो रही है और नये सांस्कृतिक मूल्यों का रचा जा रहा है। यह सब कुछ अतीत की कुछ मान्यताओं और मिथकों के आधार पर किया जा रहा है जिसमें इतिहास की अवधारणा लगातार डूबते जाने के लिए अभिशप्त है।
आमतौर पर मिथक को इतिहास की तरह देखने का प्रचलन ठीक उसी तरह का है जैसा धर्म और विज्ञान के बीच का है। मिथक इतिहास नहीं होते। वे मानव इतिहास की वे आद्य अवधारणाएं हैं जो इतिहास का हिस्सा बनने से रह गई हैं। एक इतिहासकार की जिम्मेवारी होती है कि इन आद्य अवधारणाओं में नीहित इतिहास को खोलकर सामने रखे और अपने समाज को उसकी आद्यतन यादों को कालखंड में पिरोकर प्रस्तुत करे। यह काम इतना आसान नहीं होता।

पूंजीवादी उत्थान में बने राज्य नये मिथकों को गढ़कर अपनी संरचना बनाते हैं। पूंजीवाद पतित होने के साथ ही मिथकों को बड़े पैमाने पर रचने में लग जाता है। यह अपने फासीवादी दौर में इसका उत्पादन चरम स्तर पर बढ़ा देता है। ऐसे में, उनसे इतिहासकार, वैज्ञानिकों का पीछे रह जाना, उनका हताश हो जाना, …कोई अनहोनी बात नहीं है।

यहां भारत के संदर्भ में एक संयोग भी है कि यूरोपीय पूंजीवाद का उत्थान में ‘आर्य मिथक’ सीधे भारत से जुड़ा और उसके फासीवाद दौर में नस्लीय श्रेष्ठता ने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के कई प्रणेताओं को प्रभावित भी किया। भारत के इतिहासकारों पर यह दोहरा भार था। ठीक यही स्थिति यहां के सामाजिक सुधारकों, वैज्ञानिकों और राजनीतिज्ञ चिंतकों की भी थी।
भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में धर्म, विज्ञान, चिंतन और राजनीति पर चल रही बहसों में मिथकों को गढ़ने को लेकर खुद गांधी जी भी बेहद चिंतित रहे। उन्होंने दिपावली पर होने वाले उत्सवों को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी। यह लगभग 100 साल पुरानी बात है।

इस संदर्भ में एस,एन. साहू का ‘द वायर’ में लिखा लेख देखा जाना चाहिए। आज स्थिति बद से बदतर हो चली है। मिथक, धर्म, संस्कृति, मूल्य और मान्यता जब राजनीति के गिरफ्त में चली जाए, इसमें राज्य सक्रिय भूमिका निभाने लगे और न्यायपालिका के निर्णयों में पूर्वाग्रह प्रभावी हो जाए, तब मानकर चलिए कि सिर्फ इतिहास का नाश नहीं हो रहा है, वर्तमान भयावह घुप अंधेरे में फंस गया है।

यह अंधेरा सिर्फ हवा और संस्कृतियों का नहीं है, यह मूलतः हमारी आर्थिक बदहाली का असल रूप है जिसमें जीना और भी मुश्किल होता जा रहा है। आर्थिक बदहालियों के दौर में जादू, टोना, धार्मिक प्रयोजन और नशे में धुत हो जाना अपने समय की चुनौतियों से सिर्फ भागना ही नहीं है, यह प्रायोजित सामूहिक उन्माद में हिस्सा बन जाना भी है। हम जानते हैं कि यह बेहद आत्मघाती है।

Ramswaroop Mantri

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