अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*अरुंधति रॉय की किताब: ‘मदर मेरी कम्स टू मीट’: दो संघर्ष, दो जीवन, दो लालसाएं, दो महत्वाकांक्षाएं, दो ज़िदें, दो अरमान*

Share

‘मदर मेरी कम्स टू मीट’-1: ये है मेरी यातना और मेरी अपार ख़ुशी

(अरुंधति रॉय के लेखन की सबसे बड़ी ख़ूबियां उसकी सच्चाई और उसकी मौलिकता हैं। ये खूबियां उन्हें अपने जीवन के खुरदुरे, रूखे, तकलीफ़ों और फटकार और गालियों और अंधड़ों से ‘भरे-पूरे’ अनुभवों से हासिल हुई हैं। उनके सधे और ताप से निखरे लेखन का नतीजा है कि उनका पहला संस्मरण हमें उनके औपन्यासिक रोमांचों की ओर खींच ले जाता है।)

कुएं की ठंडी गहराई में एक सफ़ेद पत्थर की तरह

मेरे भीतर पड़ी हुई है एक अद्भुत याद

मेरे बस में नहीं और छोड़ना भी नहीं चाहती इसेः

ये है मेरी यातना और मेरी अपार ख़ुशी

-यूक्रेन में जन्मीं रूसी कवि आन्ना आख़्मातोवा (1889-1966)

(मूल रूसी से अंग्रेजी में अनुवादः बाबेत डॉयश और अब्राहम यारमोलिन्स्की, मॉडर्न रशियन पोएट्रीः एन एंथलॉजी, हारकोर्ट, ब्रेस एंड कंपनी,1921) (पोएट्स डॉट ओर्ग पर उपलब्ध अंग्रेजी अनुवाद से साभार)

अरुंधति रॉय का, अंजुम जैसी साथियों के साथ मिलकर ‘निर्मित’ किया हुआ अपार ख़ुशी का घराना (मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस) जहां से अपने मूल तत्व लेकर चला था- वो जगह, वो सामान, वो स्मृति, वो गुफ़ा अब हमारे सामने है- ‘मदर मेरी कम्स टू मी’ (मुझ तक आती मेरी मां) के रूप में। अरुंधति की ये पहली संस्मरण-पुस्तक उनकी अब तक की तमाम किताबों के मूल में है। यहां से पाठक और प्रेक्षक के तौर पर आप वापसी का सफ़र कर अरुंधति के लेखन को डिकोड करने की कोशिश कर सकते हैं। कहा नहीं जा सकता वो कोशिश कितनी क़ामयाब होगी लेकिन इस किताब में वे सूत्र बिखरे हुए हैं जिनसे उनके रचनाकर्म की थाह ली जा सकती है। 

परस्पर गुंथे हुए फिक्शन और नॉन-फ़िक्शन

अरुंधति ने अपनी पहली किताब ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ अपनी मां मेरी रॉय और भाई एलकेसी (ललित कुमार क्रिस्टोफ़र) को समर्पित करते हुए लिखा थाः “मेरी रॉय जिन्होंने मुझे बड़ा किया। जिन्होंने सार्वजनिक उपस्थिति के समय उन्हें टोकने से पहले ‘एक्स्यूज़ मी’ कहना सिखाया। जिन्होंने मुझे भरपूर प्यार देकर जाने दिया।“ और भाई के लिए उन्होंने लिखा थाः “एलकेसी के लिए, जो मेरी तरह, बचा रहा।” संस्मरण की ये नयी किताब भी मां और भाई को ही समर्पित की गई है। क्रम उलट है। यहां ललित कुमार क्रिस्टोफर पहले हैं जिनके लिए अरुंधति ने लिखा हैः साथ साथ हम बचे रह पाए और मां मेरी रॉय के लिए लिखाः जिन्होंने कभी नहीं कहा, रहने दो।

पहली किताब में समर्पण के पेज के बाद प्रख्यात ब्रिटिश लेखक और कला-मर्मज्ञ जॉन बर्जर का कथन हैः “नेवर अगेन विल अ सिंगल स्टोरी बी टोल्ड एज़ दो इट्स द ओनली वन।” (एक अकेली कहानी फिर कभी इस तरह नहीं बताई जाएगी जैसे वही एक कहानी हो।) ये पंक्ति बर्जर के बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यास ‘जी.’ से ली गई है। नयी किताब में भी अरुंधति रॉय ने अपने प्रिय लेखक और दोस्त जॉन बर्जर की रचना से एक टिप्पणी को शुरुआती पन्ने में जगह देकर उन्हें याद किया हैः “द गेस्ट्स एज़ दे लेफ़्ट किस्ड द क्राउन ऑफ़ हर हेड एंड शी न्यू देम बाइ देयर वॉयसेज़।”

(मेहमानों ने जाते हुए उसका माथा चूमा और वो उन्हें उनकी आवाज़ों से पहचानती थी।) जॉन बर्जर ही थे जिन्होंने नर्मदा पर बन रहे बांधों के बारे में अरुंधति के निबंधों को पढ़ने के बाद उन्हें अपनी विशिष्ट हैंडराइटिंग में फैक्स किया था कि “तुम्हारा फिक्शन और गैर-फिक्शन- दोनों तुम्हें दुनिया में ऐसे लिए चलते हैं जैसे तुम्हारे दो पांव।” अरुंधति के मुताबिक वो उन थोड़े से लोगों में से थे जिन्होंने उनके फिक्शन और नॉन-फिक्शन को एक-दूसरे के बरअक्स नहीं रखा। जन्नत गेस्ट हाउस की मालकिन अंजुम से शायद सबसे पहला परिचय लेखिका के बाद जॉन बर्जर का ही था। 

किताब के हाफ डस्ट जैकेट पर अरुंधति के युवा दिनों की तस्वीर है, बीड़ी फूंकते हुए- कार्लो बुलड्रिनी की खींची हुई। और बैक कवर पर प्रौढ़ दिनों की तस्वीर जिसे मयंक ऑस्टिन सूफी ने खींचा है। ये तस्वीरें भी मानो अपनी मां से पीढ़ीगत संवाद की तरह हैं, उनकी ही प्रतिबिंब या उनकी प्रति-छायाएं। और जब आप किताब को उलटकर दोनों कवरों को एक साथ अपने सामने रखें तो पाएंगे कि आज की अरुंधति अपने विशिष्ट, स्मित मुस्कान और निहाल अंदाज़ में कई दशक पहले की अरुंधति को देख रही है, मानो नज़रों से टहोकती हुई कि तुम भी क्या ‘आफ़त’ थी  माई?! 

लाल रंग के कवर पर किताब के टाइटल और लेखिका के नाम के ठीक नीचे और बीड़ी फूंकती अरुंधति के फोटो वाले कवर के ठीक पीछे एक पतंगा (या फतिंगा) उकेरा गया है। मानो वहां छिप कर बैठा हुआ हो। एक तरह से बचपन की स्मृति का प्रतीक, अपनी मां की ओर कभी कातर और कभी निसार निगाहों से देखती एक बच्ची, एक लड़की, एक युवती और एक प्रौढ़ा के भीतर, कहीं भीतर चिपका हुआ या वहीं कहीं फड़फड़ाता हुआ। अपने सूरज की ओर जाने का दुस्साहस करता और बार-बार जलकर राख होता, फिर से जन्म लेता और फिर मंडराने आ जाता हुआ। सूफ़ी संत सरमद शहीद (कासानी) की एक रूबाई हैः

सरमद ग़म-ए-इश्क, बुलहवस रा न-देहंद / सोज़-ए-दिल-ए-परवानः, मगस रा न-देहंद।

इस रूबाई का आशय ये है कि प्रेम का दुख हर किसी को नहीं दिया जा (मिल) सकता (हर कोई नहीं समझ सकता) जैसे परवाने की करुणा मक्खी को नहीं दी जा (मिल) सकती। उस्ताद अमीर ख़ान साहब ने राग प्रिय कल्याण में इस रूबाई को गाया है जहां वो नये रंगों में खिल उठती है और नयी गहराइयों का रुख करती है, दर्द को और हर्ष को और तीव्रतर करती हुई। ये जो परवाना या फतिंगा या मॉथ है- अरुंधति के मन की उलझन, हदस और संत्रास का भी एक बिंब है। उससे उनका पीछा नहीं छूटता। वो प्रेम भी है और यातना भी।

मेरी रॉय, मिसेज रॉय या मां मेरी- कौन थीं वो?

जुनून को पूरी ताकत के साथ खुद को वक़्त पर फेंक मारना होगा, ‘जी.’ उपन्यास में एक पंक्ति कहती है। इस मेमॉयर में लगता है अरुंधति ने कमोबेश यही किया है। समय को फोड़ देने वाले पैशन के साथ उन्होंने अपने घर की, अपने भावनात्मक लैंडस्केप की ये कथा कही है। ऐसी गहरी चोटें वक़्त पर कब किस जुनून की पड़ी थीं?! एक पीढ़ी पहले वही जुनून न सिर्फ़ असम से एक कमोबेश अघोषित परित्यक्त हालत में पनपा था और वहां से कई हज़ार मील दूर हिंद महासागर के एक छोर पर चला आया था नई उत्तेजना जगाने के लिए लेकिन उसे समाज और परिवार की बहुत सारी आगों में भी झुलसना था।

मिसेज रॉय, मेरी रॉय होकर ख़त्म नहीं होना चाहती थीं। वो एक बहुत ढीठ जीवन लेकर आई थी जिसमें भीषण दमे और निराशाओं के जोरदार झटके और उफ़ान थे लेकिन जिजीविषा का भी अंत नहीं था। एक स्त्री अपने संसार का सृजन कर रही थी। इससे ज्यादा सुंदर, ज्यादा सच्ची बात, कायनात में और क्या हो सकती थी लेकिन उस स्त्री की सृजनात्मक क्षमता ने उसका पैशन तो बढ़ा दिया लेकिन करुणा और ममता छीन ली।

अरुंधति ममता की अनुपस्थिति के उसी विराट सन्नाटे, उसी विशाल रिक्त स्थान में पली-बढ़ी, उसी में बनीं। मां के स्नेह से वंचित जीवन में उन्होंने कोई सूखापन नहीं आने दिया बल्कि उसे स्नेह और मातृत्व की कमी के अनुभव से इतना सिंचित कर दिया कि उन्हें अपने आसपास मां ही दिखाई देने लगी। यह यूं तो हार की जीत थी, लेकिन मां से कैसा हारना, कैसा जीतना?

“मिसेज रॉय-विहीन दुनिया की पहली रात, मैं अंतरिक्ष में डोलती रही। मैंने खुद को उनके इर्दगिर्द निर्मित कर दिया था। उन्हें अकोमोडेट करने के लिए मैं एक खास आकार में ढलती चली गई थी। मैं उन्हें कभी हराना नहीं चाहती थी, कभी उनसे जीतना नहीं चाहती थी। मैं हमेशा चाहती थी कि वो रानी की तरह विदा हों। और अब वो उसी ढंग से चली गई तो मुझे खुद को लेकर कुछ सूझता ही नहीं था।” 

जो नैतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक, शैक्षणिक मूल्य मां ने बेटी को दिए, बाद में उन्हीं के लिए उसका प्रतिकार किया- उस पर वो टूट पड़ीं। बौखलाईं, आखिर क्यों? क्या इसका कोई मनोवैज्ञानिक या सामाजिक-सांस्कृतिक तहों वाला जवाब हो सकता है या बता पाना बहुत ही मुश्किल है कि मिसेज रॉय को क्या बेटे-बेटी से नफ़रत थी, या एकल मां के झंझटों, शराब में डूबे पति को छोड़कर आने और अपना संसार फिर से खड़ा करने, या बहुतेरे सामाजिक दबावों की चिढ़ उन पर निकलती थी, या वो इतनी ख़ुदगर्ज और इतनी आत्मकेंद्रित थीं, इतनी सेल्फओबसेस्ड, सेल्फएबसॉर्ब्ड? हम ठीक-ठीक नहीं जान सकते।

ये फ़ाश करने का अरुंधति का कोई इरादा भी नहीं। हर चीज़ को समझना व्यर्थ है। हर चीज़ बताई या समझाई नहीं जा सकती। एक गांव की नदी की धारा की तरह ख़ामोशी में सब बह जाता है या दर्ज हुआ जाता है। नदी के बोल ख़ामोशी के महासागर में जा गिरते हैं। या मेहमाननवाजी में किसी तरह की कोई चूक होने जैसी स्थिति में एक कठिन मां के क्रोध की भयंकर लपटों से जैसे-तैसे झुलसते-गिरते-संभलते-निकलते भाई-बहन एक निर्विकार सी शांति में सीढ़ियों पर जा बैठते हैं। ‘एक तीसरे व्यक्ति की तरह ख़ामोशी भी आकर उनके बीच बैठ जाती है’ एक प्यारी दोस्त की तरह।

मिसेज रॉय को दुनिया उनके दो असाधारण कामों के लिए याद रखेगीः कोट्टायम में एक विशिष्ट स्कूल की स्थापना, जो अपनी खास तरह की शिक्षा-दीक्षा के लिए मशहूर रहा है और दूसरा त्रावंकोर क्रिश्चियन उत्तराधिकार कानून को चुनौती जिसके तहत बेटियों, एकल माताओं और विधवाओं को बहुत ही सीमित अधिकार हासिल थे, और बेटियों को बेटे के शेयर का एक चौथाई हिस्सा या पांच हजार रुपये जो भी कम हो, देने का प्रावधान था। ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई में मेरी रॉय ने इसे चुनौती दी और जीत हासिल की। कोर्ट में मेरी रॉय का प्रतिनिधित्व मशहूर अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने किया था।

मीना पिल्लई ने द हिंदू में प्रकाशित एक रिपोर्ट में लिखा कि मेरी राय ने किसी मदद के बगैर कड़े शारीरिक परिश्रम और अदम्य इच्छाशक्ति की बदौलत दृढ़ता के साथ ये कानूनी लड़ाई लड़ी और ऐतिहासिक जीत हासिल की। लैंगिक समानता के लिए आज भी कोनों-खुंजों से लेकर वृहद परिवेशों तक जारी ऐसी एकल-सामूहिक लड़ाइयों में उम्मीद है मेरी रॉय की ज़िद मशाल का काम करती होगी। 1986 में सुप्रीम कोर्ट ने सीरियाई क्रिश्चियन समुदाय की स्त्रियों को संपत्ति में समान अधिकार देने का फैसला सुनाया था। 

उसी कानून का हवाला देते हुए कई साल पहले मेरी रॉय के बड़े भाई, जी इसाक, बहन को पिता की संपत्ति से बेदखल करने के लिए ऊटी के उस साधारण से घर में आ पहुंचे थे जहां असम से लौटकर मिसेज रॉय ने बच्चों के साथ अपना पहला ठिकाना बनाया था। ये वही जी इसाक थे जिनसे मेरी के झगड़े कभी खत्म नहीं हुए, जिन्होंने संपत्ति से बहन को हटाने की जुर्रत तो कर ली लेकिन नहीं जाना इसके नतीजे उनके लिए कितने दूरगामी और भयानक होने वाले थे।

ये वही जी इसाक थे जिनका व्यवहार अरुंधति की नजरों में अच्छा नहीं था लेकिन उनकी एक प्रवृत्ति ने उन्हें उनके सारे बैर भुला दिए और वो तब हुआ जब एक इंटरव्यू के दौरान बहन से केस हारने के मुद्दे पर जी इसाक ने मजाक में कहा कि अब कम से कम ये तो स्पष्ट हो गया कि वृहद सीरियाई क्रिश्चियन समुदाय के नेता वो नहीं रहे।

अरुंधति के मुताबिक अपने मामा से उन्होंने जाना कि पराजय को कैसे दोस्त बना लेना चाहिए, कि जी इसाक ने दिखा दिया कि हार से दोस्ती कर लेना उसे स्वीकार कर लेने से कितना अलग और उलट है। बाद के दिनों में मिसेज रॉय बीमार हुईं तो एक बार फिर भाई-बहन के बीच लंबे समय की कड़वाहट दूर होती गई। भाई अपनी बहन से मिलने आते रहे, हाथ थामे साथ-साथ पुराने गाने गाते रहे, लगता ही नहीं था कि ये वही आदमी है जो अपनी बहन और उसके दो छोटे मासूम बच्चों को घर से बेदखल करने किसी रोज़ आ धमका था। लेकिन आखिरकार जी इसाक ही दुनिया में अकेले वो शख्स थे जो मिसेज रॉय को उनके पहले नाम से बुला सकते थे, बुलाते थे।

हताशा, स्मृति, दुःस्वप्न, उम्मीद, कामना, तड़प और बाल-मन के विछोड़, उछाड़-पछाड़ को अरुंधति ने जिस मर्मस्पर्शी अंदाज में वर्णन किया है वो बाल मनोविज्ञान सीखने-पढ़ाने-बरतने वालों को भी देखना चाहिए। एक बेटी लगातार अपनी मां के वात्सल्य की छांव में जाने को आतुर रहती है और उसकी ये आतुरता कभी न खत्म होने वाले इंतजार में तब्दील हो जाती है, उस दिन तक जब उसे अपनी बिस्तर पर पड़ी बीमार मां का फोन पर संदेश नहीं आ जाता कि “मैंने दुनिया में तुमसे ज्यादा प्यार किसी को नहीं किया है।” फोन पर आए टेक्स्ट के रूप में ये उद्घोषणा थी। मिसेज रॉय यूं ही नहीं कुछ कह देती थीं।

उनके संदेश ‘स्टेटमेंट ऑफ पॉलिसी’ हुआ करते थे। संदेश पढ़कर अरुंधति की सांस अटक गई, ‘चेहरे पर ख़ून दौड़ गया,’ वो सिहर उठीं, फिर थोड़ा स्थिर होने के बाद कांपती उंगुलियों से उन्होंने मां को जवाब लिखाः “आपके जैसी असाधारण और अद्भुत महिला कोई और नहीं। आपको बहुत ज़्यादा प्यार करती हूं।”

‘गैंगस्टर’ नाम के अध्याय से शुरू होती हुई ये किताब 372वें पेज पर ‘डिक्लेरेशन ऑफ लव’ (प्रेम की उद्घोषणा) अध्याय के साथ समाप्त होती है। फिर वो सिर्फ़ अध्याय नहीं रह जाता, वो वास्तव में अरुंधति के जीवन और लेखन का केंद्रीय सूत्र भी बन जाता है- प्रेम और उसकी संभावना और उसका ऐलान। तमाम पराजयों और तमाम निराशाओं के विरुद्ध सतत प्रेम की उद्घोषणा। उस ग्रैविटी से खुद को छुड़ाने का साहस भी उसी ग्रैविटी के भीतर से ही कहीं रिसता हुआ आता है। अरुंधति बताती हैं कि उन्होंने अपनी मां को इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि वो उनसे प्रेम नहीं करती थी, बल्कि इसलिए छोड़ा कि उन्हें प्यार करती रह सकें। उनके साथ रहकर वैसा संभव नहीं होता। 

“एक बार मैं चली गई तो मैंने सालों तक उनसे न मिली न उनसे बात की, उन्होंने भी मेरे बारे में कोई तफ़्तीश नहीं की। उन्होंने कभी नहीं पूछा कि मैं क्यों गई। उसकी ज़रूरत नहीं थी। हम दोनों जानते थे। हम लोगों ने एक झूठ का सहारा ले लिया था। अच्छा झूठ थाः मैंने उसे कुछ यूं पेश कियाः उन्होंने मुझे इतना प्यार किया कि जाने दिया। यही बात मैंने अपने पहले नॉवल के फ्रंट पर लिखी। जो मैंने उन्हें समर्पित किया था।” 

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने अपनी एक नज़्म में कहा हैः “यूं न था मैंने फ़कत चाहा था यूं हो जाए.” 

एक दोहरी-तिहरी याददिहानी जैसी किताब

किताब पढ़ते हुए घर पर एक रोज़ देखा, गेट के पिलर पर कटोरीनुमा एक तश्तरी में पानी रखा है और अपनी चोंच से पानी भरने की कोशिश करती, भर पाती और उड़ जाती और फिर लौटती उस पर एक चिड़िया है। यह बिंब मानो इस किताब में मां के विशाल, जटिल, तटस्थ और बाज़ दफ़ा रूखे, कड़क सामाजिक संसार में अपनी उड़ान के लिए जगह बनाती बेटी के बारे में बताता है। यह कहानी जितना बेटी की मासूमियत और मां से लिपटने की एक सुलगती हुई सी ख़्वाहिश की है उतना ही ये एक मां की दुर्निवार ज़िद, ज़िम्मेदारी, साहस, दोटूकपन, हौसले और आत्मविश्वास और स्वाभिमान की कहानी भी है।

ये मानो जैसे नदी के दो पाटों की दो समांतर कहानियां हैं जो मिल नहीं रही हैं लेकिन लगातार एक दूसरे को देखती, टहोकती जा रही हैं। और कहीं किसी अदृश्य अंतर्धारा में एक दूसरे में समा गयी हैं, इस तरह कि उनके किरदार दो ठोस स्थिर सुदृढ़ पेड़ हैं, जिनके पत्ते अलग अलग रंगों के हैं, शाखाएं अपने अपने ढंग से झूलती-फैलती हैं लेकिन जिनकी जड़ें और जिनका रस कहीं जमीन में बहुत नीचे परस्पर विलीन हो रहा है। अरुंधति रॉय, मेरी रॉय की बेटी ही हो सकती हैं। मेरी रॉय, अरुंधति की मां ही हो सकती थी। अरुंधति ने अपनी मां को ‘अपनी पनाह और अपना तूफ़ान’ यूं ही नहीं कहा है।

“मैंने उन्हें अपना सब कुछ उस समाज पर बरसाते हुए देखाः अपनी प्रतिभा, अपना जीनियस, अपनी विलक्षण सनक, अपनी अपार दयालुता, चरम साहस, अपनी बेरुखी, अपनी क्रूरता, अपनी उदारता, सदाशयता। अपनी दबंगई, अपना कारोबारी मिज़ाज, और अपना बीहड़ अप्रत्याशित तेवर और गुस्सा…।”

ये संस्मरण, लेखिका के कठिन और मुफ़लिसी और दया और क्रूरता, अजनबियत और दुनियादारी और रिश्तेदारी और भावुकता और जमीन और संपत्ति के बंटवारे-झगड़े में लिथड़े हुए बचपन से शुरू होता है और विश्व की एक कामयाब, चर्चित और महत्वपूर्ण लेखिका बन जाने तक जाता है। अरुंधति ने विशिष्ट शैली में अपना लेखकीय जादू एक बार फिर पिरोया है और यह एक मेमॉयर न रहकर मां-बेटी और परिजनों के रिश्तों की न जाने कितनी तहों की खोजबीन करता दस्तावेज और समकालीन विसंगतियों और विडंबनाओं और संत्रासों का एक प्रामाणिक विवरण बन जाता है।

अरुंधति का ये संस्मरण एक याददिहानी जैसा भी है, उनकी कृतियों के जन्म लेने की दास्तानों और संघर्ष की पृष्ठभूमि से पाठकों को रूबरू कराता बल्कि पाठकों को भी उनकी हताशा, जीत-हार, द्वंद्व, तकलीफ़ और संघर्ष की स्मृतियों की ओर खींचता। ये एक दोहरी-तिहरी याददिहानी जैसी किताब है।

शिवप्रसाद जोशी

और इस संस्मरण में मानो अलग-अलग विधाएं ऐसे ही बैठ गई हैं आकर जैसे तार पर कुछ चिड़िया। एक आत्मकथा और एक जीवनी और एक उपन्यास और एक संस्मरण- एक दूसरे में गुंथे, लिपटे और उलझे हुए और हम ठीक-ठीक ये नहीं जान सकते कि वे विधाएं एक-दूसरे से अलग होने को छटपटा रही हैं या एक-दूसरे में लिपट जाने को व्याकुल हैं, मां और बेटी के रिश्ते को एक स्वाभाविक दुनियादारी में भिगो देने को तैयार हैं या एक असाधारण से द्वंद्व में अपनी-अपनी कथाओं का सृजन कर रही हैं? दो नदियां, दो सदियां, दो संघर्ष, दो जीवन, दो लालसाएं, दो महत्वाकांक्षाएं, दो ज़िदें, दो अरमान।

और उन दो के बीच उनके लोग, उनके प्रियजन और बनती-बिगड़ती दुनिया। इस तरह ये किताब एक विशुद्ध भारतीय मन को टटोलता-खंगालता वृत्तांत भी है। उपमहाद्वीप के विभिन्न भूगोलों, संस्कृतियों, उप-संस्कृतियों की दास्तानें इसमें मूल कथा को संभालते हुए दर्ज हुई हैं। वहां दिल्ली की दूर तक तनी हुई झुलस भी है और केरल का अनवरत गीलापन भी। इन्हीं के बीच धूल, धुआं, बारिश, नशा, सड़क, कमरा, झोपड़ी, फुटपॉथ, ऊब, आंसू, पसीना है और प्रेम के एक अटूट, कभी न ख़त्म होने वाले धागे पर सारी कथा टंकी हुई है। जैसे एक-एक कर हर घटना, हर किस्से, हर दर्द, हर विपदा, हर उम्मीद, हर उदासी को इस धागे से होकर गुज़रना है और उसी में बंधे रह जाना है। प्रेम का ये धागा, उसकी यातना का धागा भी है। इसीलिए अरुंधति के लिए उनकी मां उनकी पनाह और उनका तूफ़ान- दोनों है। 

नोबेल विजेता अमेरिकी कवि लुईस ग्लिक की एक लंबी कविता का अंश हैः

…वो बेशक जानती है धरती / माँओं से चलती है, ये बात / बिल्कुल तय है। वो ये भी जानती है /कि जिसे कहा जाता है / लड़की वो अब नहीं रही। / क़ैद के बारे में वो मानती है / कि बंदी तभी से है जब से बेटी है…(पर्सिफोन कविता का एक अंश, कविता संग्रहः एवर्नो)

संवाद को तरसती बेटी और असहाय समाज को संभालती माँ 

सीरियाई ईसाई समाज में मिसेज रॉय का एक बड़ा रुतबा था और सम्मान था और लोग उनसे स्वाभाविक कारणों से थरथराते थे और प्यार करते थे। अरुंधति के लिए उनके बारे में लिखना एक मां, उसकी सख्ती, उसकी रुखाई और उसके अनुशासन के लिए लिखने से ज्यादा एक महिला, उसकी उस्तादी, उसके तेवर, उसके साहस और पुरुष प्रधानता और पुरुष लंपटई वाले समाज में निर्भय रवैये के बारे में लिखना था।

यहां एक बेटी ही नहीं एक स्त्री भी अपने से एक पीढ़ी बड़ी स्त्री की गरिमा, बुलंदी और किरदार के बारे में लिख रही है, अपने दुस्साहसपूर्ण लेखन और वैचारिक प्रखरता की बदौलत अरुंधति ने अपने समय से मुठभेड़ में मुब्तिला एक खुद्दार स्त्री का खाका भी खींचा है जो संयोगवश मातृत्व या ममता के लिए नहीं एक निर्भय और स्वतंत्रचेत्ता मनुष्य के तौर पर उन्हें याद है। 

“बच्ची के तौर पर मैंने उन्हें नादान, अतार्किक, बेबस, भयभीत, सम्पूर्ण ढंग से प्रेम किया जैसा कि बच्चे करते हैं। वयस्क के तौर पर मैंने उनसे ठंडे, निर्विकार, तार्किक और सुरक्षित दूरी से प्रेम करने की कोशिश की। मैं अक्सर नाकाम रही। कभी तो बुरी तरह। मैंने अपनी किताबों में उनके संस्करण लिए लेकिन उन्हें उनके मौलिक रूप में कभी दर्ज नहीं किया। उन्हें वे संस्करण अच्छे लगे और द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स में अम्मु के किरदार को उन्होंने गले ही लगा लिया जिसे वो अक्सर मैं कहती थी। वो अम्मु होना चाहती थी क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि वो वैसी नहीं थी।”

दो एटमी शक्तियों (जैसा कि एक टीवी इंटरव्यू में अरुंधति ने मज़ाक में कहा) की पारस्परिक और वैयक्तिक कार्रवाइयों के बारे में किताब बताती चलती है। जब मेरी रॉय तमाम मुश्किलात को लगभग रौंदते हुए अपने सपनों और चुनौतियों के स्कूल की स्थापना और उसे सही दिशा में चलाने के लिए जी-जान एक किए हुए थीं तो इधर दिल्ली में अरुंधति अपने संघर्ष के औजार पैने कर रही थीं।

उनके पास पहली बार रेल से दिल्ली आते हुए बैग में रखा चाकू बेशक नहीं था लेकिन बहुत सारी चीजों से वो लैस थीं- हार न मानने वाली उद्दाम जीवटता, प्रेम में खुद को डुबो देने और निकल आने की ताब और निर्माण और वास्तुकला की बारीकियों को गूंथने का कौशल, एक रचनात्मक छटपटाहट, बेचैनी और दूर की एक कौंध को पकड़ने की ऊर्जा। अरुंधति के पास उनका वही बचपन का, दिल में अटका हुआ पतंगा भी था। 

अरुंधति बताती हैं कि एक बार स्कूल चल निकला तो मिसेज रॉय ने तन-मन-धन उसी को आगे बढ़ाने पर झोंक दिया। स्कूल की बढ़ती लोकप्रियता और प्रतिष्ठा ने उनके भीतर नया जोश भर दिया। उनके पास असहाय स्त्रियों और बच्चों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने का साहस, एक अभियान बन गया। अरुंधति के मुताबिक मां ने अपनी ‘रेडिकल काइंडनेस’ की मुहिम छेड़ दी। वो उनकी एक निजी किस्म की राजनीति थी। किसी दुखियारी और मुसीबत की मारी महिला का पता चलते ही मां निकल पड़ती, मामला समझती और जरूरत के मुताबिक कार्रवाई करती।

मामला अदालती होता तो अदालत जाती और किसी को दवा, उपचार या इलाज की जरूरत होती तो अस्पताल पहुंच जाती। ये उनकी कोई चैरिटी, दानदाता या सामाजिक कार्यकर्ता वाली अभिलाषा या आतुरता नहीं थी, उनके भीतर अत्यधिक रोष या नाराज़गी का बोध था। उन्होंने अनाथ बच्चों को स्कॉलरशिप दी और पतियों की छोड़ी हुई या मार खाई हुई दमित स्त्रियों को रोजगार दिया। उनका स्कूल एक तरह से ऐसे वंचितों, दुखियारों, उत्पीड़ितों और वक्त के मारों का एक छायादार और प्रेम से सराबोर आसरा बन गया था। उन पर अपना प्यार लुटाने वाली मिसेज रॉय थीं। 

अरुंधति जब ये लिखती हैं कि “अक्सर मुझे लगता था कि काश मैं उनकी बेटी न होकर स्टूडेंट होती,” तो उनके भीतर से उठती और वहीं गिर जाती हूक भी आप महसूस कर सकते हैं। 

“मुझे ये समझने में सालों लग गए कि मां के तीन बच्चे थे। मैं बीच की थी। मुझसे बड़ा मेरा भाई था और मुझसे छोटा- स्कूल था। इसमें कभी कोई शक नहीं था कि मां का सबसे पसंदीदा बच्चा कौन है। अपने पूरे दमखम के साथ वो अपने सबसे छोटे बच्चे के लिए लड़ीं और उसे महफ़ूज़ रखे रहीं। उस तरह का कतई केंद्रित, भीषण प्रेम, जो भी उसका पात्र हो, धन्य है। हम जैसे लोगों के लिए, जो ऐसे पात्र नहीं हैं और प्रेम को बस अपने पास से गुज़र जाता हुआ देखते हैं, उनके लिए चुनौती ये है कि वे उससे सबक लें, उससे चकित और मोहित होना सीखें और कड़वाहट न पालें और खुद को प्यार कर पाने में असमर्थ न हो जाएं।”

ये संस्मरण एक तरह से अरुंधति का अपनी मां के साथ संवाद है जिसकी वो उनके जीते जी शिद्दत से प्रतीक्षा करती रहीं लेकिन वो नहीं हो पाया। शब्दों के तीखे बाणों से लेकर क्रूरता के विभिन्न किस्म के प्रदर्शनों तक (अरुंधति की प्यारी कुतिया डिडो की मौत भी)- मेरी रॉय के किरदार की जटिलता को उन्होंने बहुत तटस्थ बारीकी से पाठकों के लिए खोला है। उनकी मां का दमा जानलेवा हो जाया करता था। अरुंधति के मुताबिक किसी नाज़ुक मुद्दे पर बहस की नौबत आते ही दमे का अटैक एक आड़ भी था, एक नैतिक दबाव या साधारण सा प्रतिकार न कर पाने की छूट के विरुद्ध उनका एक प्रकट-प्रछन्न वचन।

अरुंधति ने उस आड़ को अपने शब्दों से या अपने व्यवहार से विस्फोट कर उड़ा नही दिया। वो आड़ बनी रही और उन्होंने रिएक्ट न करने प्रतिक्रिया न करने का फैसला किया, ये तरीका जो आगे चलकर उनके मुताबिक उनके काम ही आया। एक इंटरव्यू में अरुंधति ने बताया कि अपनी रीढ़ में इस्पात उन्हें मां से ही मिला था।

मिसेज रॉय के रौब और ख़ौफ़ के किस्से रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। अरुंधति कातरता या आत्मदया में नहीं बल्कि एक निर्विकार उदासी में ऐसी तमाम घटनाओं का उल्लेख करती हैं जिन्हें पढ़ते हुए दिल दहलता है। न जाने कितने घरों में अनुशासन की ऐसी खुली और छिपी मार बच्चों पर पड़ती है और न जाने कैसी वो हिम्मत है जो उन्हें जिलाए रखती है। मिसेज रॉय की मिट्टी से ही बने थे उनके बच्चे। वे मार खाते और उठ जाते, कोसे जाते, जब-तब उन्हें अपमानित किया जाता और सही बर्ताव का सबक याद दिलाया जाता, वे फिर उठ जाते, अपनी ख़ामोशियों और अपने दर्द के तहख़ानों में जा समाते लेकिन हारते नहीं।

एक अटूट ज़िद। एक ज़िद्दी धुन। मेरी रॉय की शख़्सियत की छानबीन करती उनकी बेटी बताती हैं कि उनके लिए भी वो मां से ज्यादा मिसेज रॉय थीं, वो एक लीडर के तौर पर बनी रहना चाहती थीं, रीतियों, मान्यताओं, रूढ़ियों से उनका इंकार उन्हें मातृत्व का सुख देने वाली छवि में ढलने से रोकता था। उन्हें लगता था कि परवरिश के मान्य स्थापित तरीकों में वे औजार और उपकरण शामिल नहीं थे जो उन्होंने अपने और अपने बच्चों के लिए और अपने स्कूल के लिए गढ़े थे। वो उन मानकों की मां थीं। उन मानकों की गुरू। उन मानकों की संरक्षक-पैट्रन। अरुंधति लिखती हैं:

“ऐसा लगता था मानो कि मां ने अपना (समस्त) प्रकाश अपने विद्यार्थियों के ऊपर उड़ेल दिया था और जो कुछ भी उनके पास था वो उन्हें दे डाला था- हमें- मुझे और भाई को- उसका अंधकार ही जज़्ब करते रहना था।”

“आज हालांकि मैं अंधकार के उस उपहार की आभारी हूं। मैंने उसे अपने करीब रखना, उसका खाका बनाना, उसके शेड्स छानना, उसके रहस्य उजागर करने तक उसे घूरते रहना सीख लिया था। वो मेरे लिए आज़ादी का रास्ता भी बन गया था।” 

हिंदी कवि और बेजोड़ गद्यकार रघुवीर सहाय, अपनी एक छोटी सी कहानी (उमस के बाहर) की आख़िरी पंक्तियों में नैरेटर के हवाले से कहते हैं- “देखो, कितना सुंदर था वह जो मैंने पाया था और मैं चला आया हूं और मैं दुखी नहीं हूं।” 

विधाओं का विलय और प्रेम के प्रतिमान

अमेरिकी लेखक और उपन्यासकार वर्जीनिया वुल्फ ने कहा था, “भविष्य अंधकारमय है, और मुझे लगता है भविष्य के बारे में सबसे अच्छी बात यही है।” वुल्फ के इसी कथन को आधार बनाकर लिखे अपने एक निबंध (वुल्फ्स डार्कनेस) में स्त्री अधिकारों और पर्यावरण समेत तमाम समकालीन चिंताओं पर अपने गहन निबंधों के लिए जानी-मानी अमेरिकी लेखक रेबेका सोलनिट कहती हैं, “लेखकों और अन्वेषकों का ये काम है ज्यादा देखना, पूर्व-धारणा के मामले में केवल ज़रूरी सामान के साथ यात्रा करना, आंखें खुली रखकर अंधकार में दाखिल होना. उनमें से सभी ऐसा नहीं करना चाहते या सफल हो पाते।

हमारे समय में नॉन-फिक्शन, फिक्शन के करीब कुछ ऐसे तरीकों से आ गया है जो उसकी चापलूसी नहीं करते, आंशिक तौर पर इसलिए, क्योंकि बहुत सारे लेखक उन तरीकों के लिए तैयार ही नहीं हो पाते जिनमें भविष्य की तरह, अतीत भी अंधकारमय है. इतनी सारी चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें हम नहीं जानते, और अपने या अपनी मां के या किसी सेलेब्रिटी के जीवन के बारे में, किसी घटना, संकट, दूसरी संस्कृति के बारे में सच्चाई के साथ लिखना, अंधकार के उन टुकड़ों (छापों), इतिहास की उन रातों, अनभिज्ञता की उन जगहों से बार-बार भिड़ना या उनसे उलझना है. वे हमें बताती हैं कि ज्ञान की अपनी सीमाएं हैं, कि कुछ अनिवार्य रहस्य होते हैं, जिसकी शुरुआत इस धारणा से होती है कि हम वही जानते हैं जो सटीक सूचना की अनुपस्थिति में किसी का सोचा हुआ या महसूस किया हुआ होता है. ” 

हमने फिल्म ‘मैसी साब’ (फिल्मकार प्रदीप कृष्ण) की एक मूक सी अभिनेत्री को अपनी आंखों से बोलते हुए देखा, और फिर अपनी कलम और अपनी आंदोलनधर्मिता के जरिए। प्रेम और करुणा ही उसके दो सबसे बड़े उपकरण थे। वो एक संवेदनशील उपन्यासकार, एक साहसी एक्टिविस्ट, एक बुलंद आवाज़ और एक प्रखर अध्येता और पारदर्शी प्रेम को समर्पित मनुष्य बनीं। उनके पास रचनाधर्मिता का खज़ाना भरा था।

आप पाएंगे और जैसा कि ऊपर एक जगह उल्लेख भी किया गया हैः ये कथा के भीतर कथा है, एक आत्मकथात्मक या संस्मरणात्मक उपन्यास है या ये 300 से भी अधिक पृष्ठों वाला एक लंबा औपन्यासिक निबंध है। आप इसे विशुद्ध उपन्यास की तरह भी देखें-पढ़ें जैसा कि अरुंधति ने किताब के पहले अध्याय में अर्ज़ किया है। अपनी बहुपरतीय भाषायी-सांस्कृतिक-साहित्यिक-संवेदनात्मक विशिष्टताओं से घुली-मिली ये किताब, समकालीन विश्व साहित्य में परस्पर विलीन विधाओं की एक छायादार और यादगार जगह है।

अरुंधति ने अपने भाई के साथ एक फटकारा हुआ, लगभग तिरस्कृत सा बचपन बिताया। उनके भाई एक सीफूड कंपनी में एक बड़े कारोबारी हो चुके हैं। अरुंधति ने इस संस्मरण में अपने शराबी पिता, दोस्तों, परिचितों, परिजनों के साथ साथ अपने प्रेम संबंध का बेबाक और संवेदनशील वर्णन किया है। फिल्मकार और पारिस्थितिकीविद् प्रदीप कृष्ण से विवाह, फिर अ-विवाह, डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार संजय काक से अटूट-गहन मित्रता- जिसके बारे में अरुंधति बताती हैं कि प्रदीप और संजय उनके जीवन की धुरी के दो छोर बन गए थे और अपनी इस निराली दोस्ती को याद करते हुए वो लिखती हैं- “सच ये है कि मैं जबसे संजय और प्रदीप से मिली, मैंने दोनों को प्यार किया है।

बिल्कुल अलग-अलग तरीकों से। हमने एक-दूसरे को बहुत बुरी तरह चोट पहुंचाई और फिर से हाथ मिला लिया। हम एक-दूसरे की हिफ़ाज़त करते रहे, एक-दूसरे का साथ देते रहे, एक-दूसरे के साथ काम करते रहे। हम लोग एक-दूसरे के भाई-बहन, माता-पिता, बच्चे, दोस्त, शरण बने रहे- इस पर निर्भर करते हुए कि किसे कब, क्या चाहिए। हम लोग एक-दूसरे में उलझे हुए हैं और कोई भी चीज हमें सुलझा नहीं सकती।” 

अरुंधति की प्यार और समानुभूति और करुणा की दुनिया सिर्फ मनुष्यों तक सीमित नहीं रही- उस निराली, बीहड़, उलझी-लुटी-पिटी, धूल-गुबार-बारिश-कीचड़ से लिथड़ी दुनिया में अन्य जीव-जंतु भी हैं। अमलतास हो या कुत्तुजी, या कोई बिल्ली, गिलहरी, या गली के उनके दोस्त कुत्ते, पेड़, पत्तियां, बेलें, लताएं, फूल, हवा, बारिश, मिट्टी की महक- अरुंधति का संसार जैसे अपनी मां के बनाए सुदूर दक्षिण के संसार का एक विस्तार भी है और एक विलोम संसार भी है, उससे अलग आयामों की तलाश में भी जाता है, नये आयामों का सृजन करता है, बाज़दफ़ा वही उनका बसेरा बन जाता है।

जहां कभी हम उन्हें फटेहाल दुनिया के प्रतिनिधियों, गरीबों, भिखारियों या अपने पुराने या भविष्य के या संभावित किरदारों के साथ बैठी हुई या घूमती-बतियाती देखते हैं, कभी उन्हें अपना दर्द सुनाते, कभी उनसे सहानुभूति और हौसला हासिल करते, इसीलिए अंजुम और उनका कब्रिस्तान का जन्नत गेस्ट हाउस कल्पना का यथार्थ भी है और यथार्थ की कल्पना भी।  

इस संस्मरण में अरुंधति ने अपने दोनों उपन्यासों और अपने अब तक के निबंधों, निबंध पुस्तकों, बीहड़, इंटेंस मुलाकातों को भी याद किया है। अरुंधति रॉय की दोनों उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया, पृष्ठभूमि, तैयारी और उनसे जुड़ी बेचैनियों को समझने के लिए भी ये किताब एक गाइड का काम करती है। ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ की पहली झलक पहला बिंब पहली आकृति कैसे उभर कर आई कैसे उनका अपना गांव और उसकी हरी नदी उनकी स्मृति में तैरती-खदबदाती रहीं।

और ‘मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैपीनेस’ स्मृति-रेखाओं की तरह कैसे उनके ज़ेहन में आकार ले रहा था और कैसे जॉन बर्जर से मुलाकात ने सहसा उनके लिए उपन्यास लिखने के दरवाजे खोल दिए। और कैसे 2010 में वो उस संभावित उपन्यास के बिखरे हुए चुनिंदा रेशे अपनी स्मृति में समेटे एक दूसरी बीहड़ यात्रा पर निकल पड़ीं जिसकी बदौलत दुनिया को ‘वॉकिंग विद कॉमरेड्स’ जैसा विलक्षण, थ्रिलिंग गद्य पढ़ने को मिला जो सिर्फ एक रिपोर्ताज या निबंध नहीं था, उपमहाद्वीप और उसके मूल निवासियों की बेचैनियों को प्रस्फुटित करता एक सच्चा गद्य था। 

###

एक सितंबर 2022 को 89 साल के एक खुद्दार, खुरदुरे जीवन का अंत हो गया। लेखिका को अपनी मां के लिए ‘ग्रेव’ नहीं ‘ग्रोव’ चाहिए। कब्र नहीं बाग़ चाहिए। कब्रिस्तान नहीं झुरमुट चाहिए। पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश की एक कविता है- “…मेरे पास बहुत कुछ है/ शाम है बौछारों से भीगी हुई/ ज़िंदगी है नूर में तपती हुई/ और मैं हूं हम के झुरमुट में घिरा हुआ…” मेरी रॉय ने दफनाए जाने से मना किया था। चर्च के परिसरों में उनके लिए जगह थी भी नहीं।

कोट्टायम नगरपालिका के मोबाइल क्रिमेटोरियम की मदद से उनके सपनों के स्कूल के कैंपस में ही उनका शव दाह किया गया। उनकी कुछ राख अयमानम गांव से बहने वाली मीनच्चिल नदी में, कुछ महासागर में और कुछ उनके घर के पीछे लंबे बांसों के झुरमुट की तह में दबा दी गई। जो बाग उनके घर के इर्दगिर्द बड़ी मेहनत और मोहब्बत की बारीकियों के साथ खिला दिया गया उसी जगह रखे एक पत्थर पर “बीलवड” शब्द उकेर दिया गया। बीलवड यानी प्यारी। मेरी रॉय, स्वप्नदर्शी, योद्धा, शिक्षक, 07.11.1933 – 01.09.2022, संस्थापक पल्लिकूडम। आखिरी निशानी, आखिरी याद। 

अरुंधति की कही एक बात के हवाले से कहें तो अरुंधति और ललित की मां, मिसेज रॉय क्या इस संस्मरण को पढ़ रही होंगी? किसी पेड़ की छांव के नीचे? या अपनी उस विख्यात कुर्सी पर बैठे? अगर हां, तो अरुंधति आप इस बात से शायद ही इंकार करेंगी कि किताब पढ़ते हुए अपने परिचित अंदाज़ में कभी उनकी भृकुटियां तन जाती होंगी और कभी ठंडी, ठहरी आँखों से घूरती होंगी, कभी वो बेटी-बेटे पर निहाल हुई जाती होंगी कि वे कितने उदार निकले कि उन्हें मदरहुड की परवाह नहीं होने दी, उनके दमे की भयंकरता की आड़ बन गए, वहीं कहीं कभी समझ में न आ सकने वाली उदासी की एक फांक होगी जैसे आसमान में कभी यहां से वहां खिंची दिख जाती है और मिट जाती है।

किताब के आख़िर में मां को विदाई के शब्द कहती चंद लाइनें फ़िक्शन से उठकर यहां एक बार फिर याद दिलाते हुए चली आती हैं- एनीथिंग कैन हैपन टू एनीवन। (किसी के साथ कुछ भी हो सकता है), इट इज़ बेस्ट टू बी प्रीपेयर्ड। (अच्छा है तैयार रहना)।

###

फिर वह किताब न जाने कैसे मेज़ से नीचे गिर पड़ी, कुछ इस तरह कि दोनों कवर खुल गए! वहां एक पतंगा था, टस से मस न हुआ! 

(शिवप्रसाद जोशी लेखक, कवि और पत्रकार हैं।)

(समयांतर के अक्टूबर अंक में प्रकाशित निंबध का मूल और संवर्धित टेक्स्ट)

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें