अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*मुसहर: मिट्टी से उठती वह आवाज़ जिसे अब भी कोई नहीं सुनता*

Share

-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          भारत की सामाजिक बनावट में एक ऐसा तबका है जिसकी पहचान उसके श्रम से है, लेकिन उसे कभी श्रेय नहीं मिला। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में फैला मुसहर समुदाय — वह नाम है जो अक्सर गरीबी, भूख और भेदभाव के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। पर क्या यह केवल “गरीबों की कहानी” है, या यह हमारे लोकतंत्र के अधूरे वादों की दास्तान भी है?

          भारत की जातीय संरचना में “मुसहर” एक ऐसा नाम है जो सदियों से वंचना, दमन और श्रम का पर्याय बन गया है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों में फैली यह जाति परंपरागत रूप से भूमिहीन मजदूर रही है, जिनका जीवन भूख, निर्धनता और सामाजिक अपमान के बीच बीता है।  मुसहर शब्द की व्युत्पत्ति “मूस” (चूहा) और “हर” (पकड़ने वाला) से हुई है — अर्थात् “चूहा पकड़ने वाला”। यह नाम स्वयं उस आर्थिक और सामाजिक स्थिति का प्रतीक है जिसमें यह समुदाय रहा।

सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन:

          मुसहर समाज अपनी सादगी, श्रमशीलता और सामूहिकता के लिए जाना जाता है।

·        भोजन: पारंपरिक रूप से वे वनस्पति, जंगली कंद-मूल, और कभी-कभी चूहा या मछली खाते थे — जिसे “गरीबी की विवशता” का प्रतीक बना दिया गया। वह इस समुदाय की अत्यन्त कठिन परिस्थिति का प्रतीक-चिन्ह है। कई शोध बताते हैं कि भूख-अभाव और सामाजिक बहिष्कार के कारण मुसहरों को चूहों, कीचड़ भोजन आदि पर निर्भर होना पड़ा था।

·        संस्कृतिभाषा एवं सामाजिक संगठन:  मुसहर अक्सर भोजपुरी, मगही या स्थानीय बोली बोलते हैं; घर-परिवार में मातृभाषा में वार्तालाप और हिंदी को व्यापार/औपचारिक भाषा के रूप में उपयोग करते हैं। गाँव-लेवल पर उनकी बस्तियाँ (“मुसहरी”, “तोला”) बनी होती हैं — अक्सर गाँव के मुख्य हिस्से से अलग। ऐसा सामाजिक बहिष्कार व प्रथा-आधारित विभाजन के कारण है।

·        बाल विवाहलिंग-असमानता:

जैसा आपने वर्णित किया, मुसहर समाज में बाल विवाह, लड़कियों की शिक्षा-उपेक्षा और घरेलू हिंसा जैसी समस्याएँ पाई गई हैं। सामाजिक-आर्थिक कमजोर स्थिति, जातिगत भेदभाव और संसाधन-अभाव ने इन चुनौतियों को बढ़ावा दिया है। शोधों में यह भी दिखाया गया है कि मुसहर समुदाय में महिला-मजदूरी, घरेलू उपेक्षा, काम और समय नियंत्रण जैसी चुनौतियाँ विशेष रूप से जटिल हैं।

·        लोक-परंपराएँदेवी-देवता:

मुँहजोरी-उत्सव, शादी-समारोह, खेती-गीत, श्रम-गीत जैसे सांस्कृतिक तत्व मिलते हैं। उदाहरण के लिए लोकगीतों में उनके संघर्ष, श्रम, उपेक्षा आदि की झलक मिलती है। इनके अपने लोकगीत, नाच-गीत और उत्सव हैं जैसे — “जागर”, “भकुआ नाच” आदि।

·        धर्म: इनका धर्म हिंदू संस्कृति से प्रभावित है, परंतु इनमें लोकदेवता जैसे भुइँयां बाबा, धरती माता, या देवी-देवता की पूजा प्रमुख है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

          इतिहासकार मानते हैं कि मुसहर समुदाय मूलतः आदिवासी या प्राचीन कृषक समुदायों से संबंध रखता था जिन्हें बाद में ब्राह्मणवादी समाज-व्यवस्था ने “अस्पृश्य” श्रेणी में डाल दिया। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश नीतियों ने उनकी भूमि छीन ली, और वे जमींदारों के खेतों में बंधुआ मजदूर बन गए। उनका इतिहास प्रतिरोध से अधिक जीवटता का इतिहास है — जिन्होंने हर युग में न्यूनतम संसाधनों में भी जीवन का संघर्ष जारी रखा।

इतिहास: जब पहचान ही अपमान बन गई:

          “मुसहर” शब्द की जड़ ‘मूस’ (चूहा) और ‘हर’ (पकड़ने वाला) से आती है — यानी चूहे पकड़ने वाला। यह नाम अपने भीतर उस ऐतिहासिक विडंबना को समेटे है जहाँ एक समुदाय को उसकी जीविका के आधार पर अपमानजनक पहचान दी गई। कभी ये लोग कृषि समाज का हिस्सा थे, जमीन से जुड़े हुए श्रमिक। लेकिन सामंती और ब्राह्मणवादी ढाँचे ने इन्हें धीरे-धीरे “अस्पृश्य” बना दिया। ब्रिटिश राज में भूमि हड़पने की नीतियों और जमींदारी प्रथा ने इन्हें खेतों से उजाड़कर बंधुआ मजदूर बना दिया।उनका इतिहास प्रतिरोध से कम, जीवटता और अस्तित्व की लड़ाई का इतिहास है।

जीवन और संस्कृति: मिट्टी की गंध में बसती अस्मिता:

          मुसहर समाज अपनी सादगी और सामूहिक जीवन के लिए जाना जाता है। इनके गीत, नाच और उत्सव — “भकुआ नाच”, “जागर” या “कुदानाच” — सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि अस्तित्व का उत्सव हैं। भोजन में जंगली कंद-मूल, मछली, कभी-कभी चूहा — यह सब गरीबी की विवशता की कहानी कहते हैं, पर यह भी एक सांस्कृतिक अनुकूलन है, जो प्रकृति से गहरे रिश्ते की ओर इशारा करता है। धर्म के स्तर पर वे लोक देवताओं की पूजा करते हैं — भुइंया बाबा, धरती माई, महादेव — और यह उन्हें “स्थानीय आस्था” की गहराई से जोड़ता है, जो मुख्यधारा के धर्म से अलग एक जीवित परंपरा है।

वर्तमान तस्वीर: बदली दुनियावही हकीकत:

          आज भी मुसहर समाज भारत के सबसे वंचित तबकों में से एक है। साक्षरता दर कई इलाकों में 25% से भी कम है, महिलाओं में यह 10–15% तक सीमित है। भूमिहीनता की दर 90% से ऊपर, और रोजगार का मुख्य स्रोत खेतिहर मजदूरी, ईंट-भट्ठे या निर्माण कार्य हैं। कई मुसहर अब भी पलायन के लिए मजबूर हैं — पंजाब, दिल्ली, हरियाणा या मुंबई के निर्माण स्थलों तक। शिक्षा और स्वास्थ्य की योजनाएं उन तक पहुँचती तो हैं, पर अक्सर फॉर्म और फ़ोटो के स्तर पर ही ठहर जाती हैं।

शिक्षा और आर्थिक स्थिति:

आज भी मुसहर समुदाय की साक्षरता दर 20–30% से अधिक नहीं है, महिलाओं में तो यह और भी कम है। रोज़गार के स्तर पर वे आज भी ईंट-भट्ठों, खेतिहर मजदूरी, निर्माण कार्य या प्रवासी श्रमिक के रूप में काम करते हैं। भूमिहीनता अब भी लगभग 90% तक है। शिक्षा के संदर्भ में, मुसहरों में साक्षरता दर बहुत कम है। उदाहरण के लिए बिहार में एक स्रोत में सुझाव है कि मुसहरों की साक्षरता दर लगभग 6% है। (samagraseva.in)

राजनीतिक उपेक्षा: गिनती में हैंगिनती के लायक नहीं:

          राजनीति में मुसहरों की गिनती “महादलित” वर्ग में होती है —यह शब्द नीतीश कुमार ने गढ़ा था ताकि दलित समुदायों में सबसे पीछे रह गए समूहों को विशेष प्राथमिकता दी जा सके। पर सवाल यह है कि क्या इससे कुछ बदला?

          मुसहरों के नाम पर योजनाएं बनीं — मकान, साइकिल, छात्रवृत्ति —लेकिन राजनीतिक दलों ने उन्हें “वोट बैंक” तो माना, नेतृत्व नहीं दिया। दलित राजनीति में भी मुसहरों की जगह हाशिये पर ही रही — चमार, पासी, कोरी जैसे समुदाय नेतृत्व में आए, पर मुसहरों की आवाज़ अब भी “दूसरी पंक्ति” में है। आज भी किसी विधानसभा या संसद में मुसहर नेताओं की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है।

          राजनीति में मुसहर समुदाय हमेशा “संख्या में बड़ा लेकिन प्रभाव में कमजोर” वर्ग रहा है। 1950 के बाद उन्हें अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल किया गया, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व बेहद सीमित रहा। पिछली सदी में जब दलित राजनीति उभरी, तो चमार, पासी, कोरी जैसी जातियाँ तो नेतृत्व में आईं, पर मुसहरों को “नीचे की पंक्ति” में छोड़ दिया गया।

          नीतीश कुमार ने “महादलित आयोग” बनाकर मुसहरों को विशेष श्रेणी में रखा, परंतु योजनाओं का जमीनी असर सीमित रहा। आज भी किसी भी प्रमुख दल की राजनीतिक रणनीति में मुसहर वोट “प्रतीकात्मक” है — विकास का वास्तविक भाग नहीं।

बदलाव की आहट: नई पीढ़ीनया आत्मविश्वास:

          बीते दशक में मुसहर समाज में कुछ सकारात्मक परिवर्तन दिखने लगे हैं। सरकारी स्कूलों और छात्रावासों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ी है, कुछ युवाओं ने प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर सरकारी नौकरियाँ पाई हैं। कुछ सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय एनजीओ, जैसे कृष्ण प्रसाद मुसहर या अनीता देवी, इस बदलाव के प्रतीक हैं। इनके प्रयासों से मुसहर समुदाय अब सिर्फ “पीड़ित” नहीं, बल्कि “संघर्षशील” के रूप में अपनी पहचान गढ़ रहा है। शिक्षा और जागरूकता की यह धीमी परंतु गहरी लहर भविष्य के पुनर्जागरण की नींव बन सकती है।

सामुदायिक जागरूकता व पहचान:

          मुसहरों ने अपने “जाति-आत्म-पहचान” (caste identity) को पुनर्स्थापित करने की कोशिश की है — उदाहरण के लिए पदयात्राओं, मंदिर निर्माण, लोकगीतों के माध्यम से अपनी सामाजिक स्थिति को सामने लाना।

historymatters.sites.sheffield.ac.uk

आशा की किरणें :

          यदि समर्थन-संसाधन, सामाजिक समावेशन, शिक्षा-प्रवेश व आर्थिक अवसर मुहैया हों, तो मुसहर-समुदाय की दशा में परिवर्तन संभव है। आकलन बताते हैं कि “जब हम महिलाओं को समझाते हैं … वे कहती हैं ‘हम अपनी बिटियों को पढ़ायेंगे’” जैसे विचार सामने आने लगे हैं (आपके द्वारा उद्धृत वीडियो-विवरण में भी) — यह स्वयं-मोर्चे की दिशा में बुलंद आवाज है।

राजनीतिक व सामाजिक दबाव-निर्माण से योजनाओं की पहुँच बेहतर हो सकती है — जैसे कि भूमि वितरण, शिक्षा-अनुदान, रोजगार योजनाएं आदि।

सामाजिक परिवर्तन और नई पीढ़ी:

          हाल के वर्षों में मुसहर समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है। कुछ युवा अब सरकारी नौकरियों, खेल, और सामाजिक संगठनों में आगे बढ़ रहे हैं। एनजीओ, मिशनरी संस्थाएँ और सामाजिक कार्यकर्ता — जैसे कृष्ण प्रसाद मुसहर, अनीता देवी आदि — इस बदलाव के प्रतीक हैं। यह परिवर्तन धीमा है, लेकिन आत्मसम्मान के पुनर्जागरण की शुरुआत कर चुका है।

भविष्य की संभावनाएं:

मुसहर समाज का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि:

·        शिक्षा और भूमि सुधार को कितनी प्राथमिकता दी जाती है।

·        सरकार और समाज मिलकर “अंतिम पंक्ति के व्यक्ति” को मुख्यधारा में लाने का ईमानदार प्रयास करते हैं या नहीं।

·        मुसहरों की राजनीतिक आत्मनिर्भरता — अर्थात अपने नेताओं का निर्माण — किस हद तक होती है।

यदि इन तीन मोर्चों पर काम हुआ, तो मुसहर समाज “करुणा और तिरस्कार” की जगह “सम्मान और अधिकार” की भाषा में बोला जाएगा।

भविष्य: प्रतिनिधित्व नहींसहभागिता चाहिए:

          मुसहरों के भविष्य की कुंजी तीन बातों में छिपी है —शिक्षा और भूमि सुधार: जब तक वे जमीन से और ज्ञान से नहीं जुड़ेंगे, बदलाव अधूरा रहेगा। राजनीतिक स्वायत्तता: उन्हें अपने नेताओं, अपने संगठनों की ज़रूरत है, जो उनके मुद्दे उठाएँ।

सम्मानजनक संवाद:                                                                                       समाज को उन्हें “दयनीय” नहीं, “समान” दृष्टि से देखना होगा। मुसहर समुदाय के उत्थान की बात केवल योजनाओं से नहीं होगी — उसे संविधान की आत्मा और समाज की चेतना से जोड़ना होगा।

निष्कर्ष: सभ्यता का आईना:

          मुसहरों की कहानी भारत की सभ्यता का आईना है —जहाँ एक ओर श्रम का महिमामंडन है, वहीं श्रमिक के प्रति तिरस्कार। यह समुदाय याद दिलाता है कि असली प्रगति तब होगी जब “अंतिम पंक्ति का व्यक्ति” सिर्फ नीति का विषय नहीं, सम्मान की भाषा का हिस्सा बने।  वे आज भी मिट्टी में हैं — पर अब यह मिट्टी दमन की नहीं, जागरण की गंध दे रही है।

          मुसहर जाति की कहानी केवल एक जाति की नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के अपूर्ण वादों की कहानी है। उनकी गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक उपेक्षा के बीच जो जीवटता है, वही इस देश की सच्ची ताकत है। आज जब “समावेशन” की बातें होती हैं, तो मुसहर समुदाय को केंद्र में रखे बिना वह चर्चा अधूरी है।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें