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‘कॉन्ट्राडिक्शन’ ही बिहार चुनाव नतीजे तय करेगा

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राजेश कुमार

कल प्रेस क्लब गया था, वही जो संसद भवन के सामने है। यूट्यूब के कम-से-कम दो पत्रकार मिले और उनमें से एक ने तो बताया कि वह रविवार को ही बिहार जा रहे हैं। शायद चले भी गये हों। 9 नवम्बर को लौटेंगे। उन्होंने महत्वपूर्ण सवाल यह पूछा कि मेरे तई चुनाव—नतीजा क्या हो सकता है? मैंने उत्तर वही दिया जो मैं इन दिनों हर किसी को देता हूं।

कि नतीजा न तो एसआईआर से तय होगा, न केचुआ के 60-62 लाख वोटरों को वोटर लिस्ट से बाहर करने से, न 20-24 लाख वोटर जोड़ देने से और न ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ पूरे इंडिया गठबंधन के सभी नेताओं के लगभग 1300 किलोमीटर की वोट चोरी के खिलाफ यात्रा से, यद्यपि नतीजों में इन सबका कुछ न कुछ तो असर होगा। गो केचुआ केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के लिए अपनी जिम्मेदारी पूरी कर चुका है और जिम्मेदारी तो केचुआ की केवल उसी के लिए है।

बहरहाल, नतीजा तो इसी से तय होगा कि भाजपा और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल—यू के बीच ‘कॉन्ट्राडिक्शन’ कैसा और कितना है। केचुआ कुछ भी कर ले, विपक्ष के नेता कुछ भी, यह ‘कॉन्ट्राडिक्शन’ ही चुनाव—नतीजे तय करेगा।

मुझे साथी यूट्यूबर के सवाल से फेसबुक पर अभी दो—तीन दिन पहले, अपनी ही एक टिप्पणी याद आ गई। तो पहले वह, पेश है, कुछ संशोधन के साथ ..   

इत्तफाक कि चुनाव लूटने के आरोपों पर भाजपा के आईटी.सेल, उसके प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न समर्थक और उसके अंतिम या कहें प्रथम और अंतिम और मात्र—दो कमानों तक का मत तो यही है कि अगर भाजपा चुनाव लूट रही है तो कई प्रदेशों में कांग्रेस और विपक्ष की क्षेत्रीय पार्टियां जीत कैसे जाती हैं, जैसे राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ,  हरियाणा जैसे राज्यों में कांग्रेस, पश्चिम बंगाल, उडीसा, दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल, आम आदमी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल?

दक्षिण भारत की तो बात ही छोड़ दें। प्रथम और अंतिम और मात्र—दो कमान खुद यह सवाल नहीं उठाते, उनके सवाल आई.टी. सेल और प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न समर्थक उठाते हैं। वैसे भी, भाजपा के मात्र दो कमानों के अलावा किसी का, आईटी सेल, गोदी मीडिया से लेकर नौकरशाही, न्यायपालिका और आम लोगों तक में उनके प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न समर्थक की अपनी कोई आवाज होती नहीं।

कमाल यह कि उन्हें इसका पता भी नहीं होता कि उनकी अपनी कोई बात ही नहीं है, वे किसी और की बात कह रहे हैं, जैसे एक समय वाजपेयी-आडवाणी की बात कह रहे थे।

तब भाजपा अलग जरुर थी और तब की और अब की भाजपा में फर्क यह था कि तब वाजपेयी-आडवाणी मात्र दो नहीं थे, तब मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली थे, गोविंदाचार्य थे, उमा भारती थीं, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और ढेर सारे थे और सबकी अपनी-अपनी बातें थीं, यद्यपि नेताओं ही नहीं, समर्थकों तक में पार्टी का एक अनुशासन भी था। तब वह एक पार्टी थी, मात्र दो लोगों की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं।

तो एतराज खासकर यूट्यूबर्स द्वारा वोटर्स की पसंद-नापसंद को 14 नवंबर 2025 को संभावित चुनाव नतीजे का आधार बनाये जाने पर है।

लेकिन बात को आगे बढ़ाएं, तो क्या यह सच नहीं है कि जैसे गोदी पत्रकारों के लिए ‘एम्बेडेड’ होना और सत्तारूढ पार्टी के दानों कमानों का प्रचार मजबूरी है और यह मजबूरी लोभ और बाजार के साथ-साथ केंद्र के अधीन सीबीआई, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और सत्ता के कारकूनों ने पैदा की है, वैसे ही धीरे-धीरे गोदी का विकल्प बन बैठे यूट्यूब आधारित पत्रकारिता का भी मूल, दोनों कमानों की आलोचना, उनके बस अभी सत्ता से बाहर हो जाने की संभावना जताना है और उनके लिए यह मजबूरी एक हद तक तो बाजार ने पैदा की ही है।

गोदी के प्रचारों, उनके तरीफों से बेजार पाठक-दर्शक-श्रोताओं के लिए दोनों कमानों पर हमले इस मीडिया की दृश्यता और श्रव्यता बढ़ाते हैं और आप जानते हैं कि जो दिखता है, वह बिकता है। तो इससे वैकल्पिक माने जानेवाले पत्रकारों की कमाई बढ़ती है या कम-से-कम इसकी संभावना तो बढ़ती ही है।

तो ये वोट चोरी की, विपक्ष के नेता की, विपक्षी नेताओं की खूब कवरेज करते हैं, लेकिन जहां ऐसी घटना हुई, जिससे दोनों कमानों की हेठी होती हो, या हेठी की गुंजाइश, वे वोट चोरी भी भूल जायेंगे। जाहिर है, उसका पूरा तर्क भी।

वे वोटर्स की पसंद-नापसंद को, सत्ता की पार्टियों के आलाकमानों की रैलियों में उपस्थिति, उनके नेताओं-विधायकों-प्रत्याशियों को अपने इलाकों में नहीं घुसने देने, उन्हें खदेड़े जाने को खबर बनाने लग जायेंगे और इन्हीं खबरों के आधार पर चुनाव नतीजों की संभावना भी जताने लगेंगे। वह सब भूलकर कि अभी तो उन्होंने लोकसभा में विपक्ष के नेता की प्रेस कांफ्रेंसों को, एसआईआर और उसकी गड़बड़ियों को, वोट चोरी पर बिहार में विपक्षी नेताओं की यात्राओं आदि को भारी कवरेज दी थी।

फेसबुक पोस्ट में मैंने आगे लिखा था, ”उनकी पसंद-नापसंद, उनका वोट तो चुनाव नतीजों का आधार कतई नहीं होगा। गोदी अखबार-चैनल और उनके ‘एम्बेडेड’ कारकून तो केंद्र में सत्तारूढ भाजपा की चुनावी हार की कल्पना करने को भी आजाद नहीं हैं और वैकल्पिक मीडिया के रूप में विकसित हो रही मोटे तौर पर यूट्यूब आधारित पत्रकारिता कम से कम राहुल गांधी की दो प्रेस कांफ्रेंस, उनकी और साथी नेताओं की वोटचोरी यात्रा, बिहार में एसआईआर आदि के बाद तो चुनाव नतीजों को वोटर्स के चयन-विवेक से जोड़ नहीं सकती।

नतीजे, अलबत्ता, इस बात पर निर्भर कर सकते हैं कि नीतीश, भाजपा द्वारा उनके शिंदेकरण के प्रयासों को लेकर उनके नेतृत्व वाली राज्य सरकार से लेकर खुद उनकी राजनीतिक चालों तक में कितने दमदार या बेध्य (वलनरेब)’ हैं। कि उनकी जनता दलयू, उनकी पार्टी रही भी है या नहीं और रही है तो किस हद तक।”

चुनाव कवरेज के लिए आज पटना पहुंच रहे साथी यूट्यूबर ने बताया कि ‘अब बिहार में एक जदयू (भाजपा) और जदयू (समता पार्टी) बन गयी है। कमाल यह है कि राज्य के विधानसभा चुनावों में पार्टी के टिकटों का फैसला जदयू (समता पार्टी) ने किया है। राज्य में पार्टी संगठन पर इसी गुट का दबदबा है और कार्यकर्ता भी आम तौर पर इसी गुट के हैं, सो भाजपा और चिराग पासवान की लोजपा को तो प्रदेश में जदयू का वोट का अधिकांश मिलने से रहा।

अलबत्ता पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, एक समय मुख्यमंत्री नीतीश के करीब रहे ललन सिंह और जदयू (भाजपा) के अन्य सदस्य पार्टी के खासकर लोकसभा सदस्यों पर तो अपने रसूख का इस्तेमाल कर सकेंगे और इसपर भी चुनाव के नतीजों का तो असर होगा ही, पर यह सब तो चुनाव नतीजों के बाद होगा। चुनाव नतीजों पर तो इसका शायद ही कोई असर हो।

Ramswaroop Mantri

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