तेजपाल सिंह ‘तेज’
भारत जैसे विविधतापूर्ण और लोकतांत्रिक देश में शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता की आधारशिला है। संविधान ने शिक्षा को मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21-ए) के रूप में मान्यता देकर स्पष्ट किया है कि हर नागरिक को समान शैक्षिक अवसर मिलना चाहिए। परंतु सामाजिक और आर्थिक विषमताओं के कारण समाज के सभी वर्ग शिक्षा की मुख्यधारा से समान रूप से लाभान्वित नहीं हो पाए। यही कारण है कि संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की।
संसदीय समितियाँ समय-समय पर यह सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा करती हैं कि यह न केवल गुणवत्तापूर्ण हो, बल्कि समान अवसर के सिद्धांत पर भी आधारित रहे। इस संदर्भ में निजी शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आज उच्च शिक्षा का बड़ा हिस्सा निजी संस्थानों द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा है।
भारतीय लोकतंत्र की नींव समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित है। संविधान निर्माताओं ने यह भलीभाँति समझा था कि जब तक समाज के हर वर्ग को शिक्षा में समान अवसर नहीं मिलेगा, तब तक लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा साकार नहीं हो पाएगी। यही कारण है कि संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4) तथा अनुच्छेद 46 में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए शिक्षा और रोजगार में विशेष प्रावधान किए गए।
आज भारत में उच्च शिक्षा का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। सरकारी संस्थानों की तुलना में निजी शैक्षणिक संस्थानों की संख्या और योगदान अधिक बढ़ा है। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2020-21 के अनुसार भारत में लगभग 78% उच्च शैक्षणिक संस्थान निजी क्षेत्र में हैं और इनमें 65% से अधिक छात्र अध्ययनरत हैं। इस स्थिति में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या निजी संस्थानों को भी आरक्षण व्यवस्था का हिस्सा बनाना चाहिए?
यही वह विषय है जिस पर संसदीय समितियां समय-समय पर विमर्श करती रही हैं। उनकी दृष्टि यह है कि शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं बल्कि समाज में समानता और न्याय का उपकरण है।
भारत में शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समानता और राष्ट्र निर्माण का प्रमुख आधार भी मानी जाती है। संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 15(5) तथा अनुच्छेद 46 सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के कल्याण के लिए विशेष प्रावधानों को सुनिश्चित करते हैं। इन्हीं प्रावधानों के अंतर्गत संसदीय समितियां समय-समय पर शिक्षा व्यवस्था और आरक्षण नीतियों की समीक्षा करती हैं और यह देखती हैं कि क्या निजी शैक्षणिक संस्थानों को भी आरक्षण की व्यवस्था में सम्मिलित किया जाना चाहिए।
1. संसदीय समिति की भूमिका
भारतीय संसद में स्थायी और प्रवर समितियां शिक्षा संबंधी नीतियों, योजनाओं और सुधारों की समीक्षा करती हैं। इन समितियों का प्रमुख कार्य है:
· शिक्षा व्यवस्था को समावेशी और न्यायसंगत बनाना।
· आरक्षण नीति की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करना।
· यह देखना कि निजी संस्थान केवल व्यावसायिक उद्देश्य न साधें, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी निभाएँ।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 जैसे सुधारों पर भी संसदीय समितियों ने सुझाव दिए हैं कि शिक्षा केवल उच्च वर्ग तक सीमित न रहे, बल्कि पिछड़े और वंचित वर्गों तक भी पहुँचे।
2. संसदीय समिति और शिक्षा व्यवस्था:
संसद में स्थायी समितियां (Standing Committees) और प्रवर समितियाँ (Ad-hoc Committees) शिक्षा व्यवस्था पर अपनी रिपोर्ट देती हैं।
· इनका मुख्य उद्देश्य यह होता है कि शिक्षा न केवल गुणवत्ता-पूर्ण हो बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित भी हो।
· समिति यह भी देखती है कि सरकारी और निजी संस्थानों में समान अवसर (Equal Opportunity) उपलब्ध हो सके।
· राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और उच्च शिक्षा आयोग (HECI) जैसे सुधारों पर भी समिति अनुशंसा देती है ताकि शिक्षा केवल चुनिंदा वर्ग तक सीमित न रहे।
निजी संस्थानों में आरक्षण का प्रश्न:
भारत में अधिकांश सरकारी संस्थानों में आरक्षण लागू है, परंतु जब बात निजी शैक्षणिक संस्थानों की आती है तो स्थिति जटिल हो जाती है।
3. निजी संस्थानों में आरक्षण का संवैधानिक आधार
1) संवैधानिक आधार:
· अनुच्छेद 15(4) व 15(5): राज्य को अधिकार है कि वह सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करे।
· अनुच्छेद 46: राज्य को यह दायित्व दिया गया है कि वह कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की विशेष रक्षा करे।
· 93वें संविधान संशोधन (2005) के तहत अनुच्छेद 15(5) जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत राज्य को अधिकार दिया गया कि वह निजी शैक्षणिक संस्थानों (चाहे सरकारी अनुदान प्राप्त हों या न हों) में भी सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए प्रवेश में आरक्षण का प्रावधान कर सके।
· हालाँकि इसमें अल्पसंख्यक संस्थानों (Minority Institutions) को छूट दी गई है।
यह संशोधन निजी संस्थानों की स्वायत्तता को कुछ हद तक सीमित करता है, लेकिन सामाजिक न्याय की दृष्टि से इसे आवश्यक माना गया।
2) न्यायपालिका का दृष्टिकोण:
· टी.एम.ए. पाई बनाम कर्नाटक राज्य (2002): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजी संस्थानों को शैक्षणिक और प्रशासनिक स्वायत्तता है।
· पै. इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2005): न्यायालय ने माना कि राज्य निजी संस्थानों पर जबरन आरक्षण लागू नहीं कर सकता।
· 93वाँ संशोधन (2005): इस निर्णय की पृष्ठभूमि में आया और राज्य को निजी संस्थानों में भी आरक्षण लागू करने का संवैधानिक अधिकार मिला।
· अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ (2008): सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, बशर्ते कि क्रीमी लेयर (Creamy Layer) को बाहर रखा जाए।
4. व्यावहारिक चुनौतियाँ:
· निजी संस्थान यह तर्क देते हैं कि आरक्षण उनकी गुणवत्ता और स्वायत्तता को प्रभावित करता है।
· वहीं दूसरी ओर समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह जरूरी है कि शिक्षा पर केवल आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग का एकाधिकार न हो।
· संसदीय समितियाँ बार-बार इस पर बल देती रही हैं कि निजी क्षेत्र भी समाज का हिस्सा है और उसे सामाजिक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए।
· कई बार योग्य छात्रों को आर्थिक रूप से सब्सिडी देनी पड़ती है, जिससे निजी संस्थान लागत और गुणवत्ता के बीच संतुलन नहीं बना पाते।
· आरक्षण की सीमा (50% से अधिक न जाने का नियम) पर भी विवाद उत्पन्न होता है।
5. शिक्षा व्यवस्था पर प्रभाव:
निजी संस्थानों में आरक्षण लागू करने से:
1) स्वायत्तता बनाम सामाजिक उत्तरदायित्व: निजी संस्थान अपनी गुणवत्ता और स्वतंत्रता के हनन की बात करते हैं, जबकि संसदीय समिति का तर्क है कि उन्हें सामाजिक न्याय में योगदान देना ही होगा।
2) आर्थिक भार: वंचित वर्गों को प्रवेश देने के साथ-साथ शुल्क में रियायत देनी पड़ती है, जिससे संस्थानों पर वित्तीय दबाव बढ़ता है।
3) आरक्षण की सीमा: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए, जिससे विभिन्न वर्गों की माँगों के बीच संतुलन बनाना कठिन हो जाता है।
4) पारदर्शिता: निजी संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया और सीटों के आवंटन में निष्पक्षता सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती है।
5) संस्थानों में निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है।
6. सकारात्मक प्रभाव:
· वंचित वर्गों को उच्च शिक्षा में अधिक अवसर मिलते हैं।
· राष्ट्र की मानव संसाधन क्षमता अधिक संतुलित बनती है।
· सामाजिक समानता: आरक्षण से वंचित वर्गों को शिक्षा में अवसर मिलते हैं, जिससे समाज में असमानता घटती है।
· राष्ट्रीय मानव संसाधन का विकास: जब अधिक लोग शिक्षा से जुड़ेंगे तो राष्ट्र की उत्पादकता और क्षमता बढ़ेगी।
· समावेशी विकास: शिक्षा व्यवस्था का लाभ केवल अमीर वर्ग तक सीमित न रहकर सभी तक पहुँचेगा।
7. आँकड़े और तथ्य
· AISHE 2020-21 रिपोर्ट: भारत में उच्च शिक्षा में कुल 4.13 करोड़ छात्र नामांकित हैं, जिनमें 65% से अधिक छात्र निजी संस्थानों में पढ़ते हैं।
· SC/ST/OBC प्रतिनिधित्व (2020-21):
· SC छात्रों की संख्या लगभग 14.7%,
· ST लगभग 5.6%,
· OBC लगभग 37% है।
· निजी विश्वविद्यालयों में आरक्षण का अनुपालन सरकारी संस्थानों की तुलना में अपेक्षाकृत कम देखा गया है।
ये आँकड़े दर्शाते हैं कि यदि निजी संस्थानों में आरक्षण प्रभावी रूप से लागू नहीं होगा, तो उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय अधूरा रह जाएगा।
निष्कर्षत: संसदीय समिति की दृष्टि से शिक्षा केवल व्यक्तिगत सफलता की कुंजी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय की आधारशिला है। निजी संस्थान भी समाज के संसाधनों का उपयोग करते हैं—भूमि, कर-छूट, मान्यता आदि। ऐसे में उनका यह दायित्व है कि वे वंचित वर्गों को पर्याप्त अवसर दें। आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य किसी को विशेषाधिकार देना नहीं बल्कि ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक असमानता को कम करना है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में संसदीय समिति की भूमिका यह सुनिश्चित करने की है कि आरक्षण की नीति निजी संस्थानों तक पहुँच कर वास्तव में “सर्व शिक्षा” और “समान अवसर” के संवैधानिक आदर्श को साकार करे।
संसदीय समिति की दृष्टि में शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य केवल ज्ञान और कौशल देना नहीं, बल्कि समानता और न्याय सुनिश्चित करना है। निजी संस्थान भी समाज के संसाधनों और सुविधाओं का लाभ उठाते हैं, इसलिए उनका सामाजिक दायित्व बनता है कि वे पिछड़े और वंचित वर्गों को पर्याप्त अवसर दें। आरक्षण का उद्देश्य किसी वर्ग को विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक-आर्थिक अन्याय को संतुलित करना है। निजी संस्थानों में आरक्षण लागू करने से प्रारंभिक स्तर पर कुछ चुनौतियाँ अवश्य सामने आती हैं, परंतु दीर्घकाल में यह नीति एक सशक्त, समावेशी और न्यायपूर्ण शिक्षा व्यवस्था की ओर ले जाती है।
भारतीय समाज में शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं बल्कि समानता और न्याय का साधन है। संसदीय समिति की दृष्टि में शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य यही है कि हर वर्ग को उच्च शिक्षा तक पहुँच का अवसर मिले। निजी संस्थान भी समाज का ही अंग हैं और वे कर-छूट, भूमि, सरकारी मान्यता आदि जैसी सुविधाओं का लाभ उठाते हैं। अतः यह नका सामाजिक दायित्व बनता है कि वे वंचित वर्गों को शिक्षा में अवसर प्रदान करें। निस्संदेह, निजी संस्थानों में आरक्षण लागू करने से प्रारंभिक स्तर पर वित्तीय और प्रशासनिक चुनौतियां सामने आती हैं। किंतु दीर्घकाल में यह नीति भारत को एक समावेशी, न्यायपूर्ण और संतुलित शिक्षा व्यवस्था की ओर ले जाएगी। अतः कहा जा सकता है कि संसदीय समितियों द्वारा सुझाए गए सुधार और निजी संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था भारतीय लोकतंत्र के उस मूल आदर्श को साकार करते हैं, जिसमें हर नागरिक को समान अवसर, सामाजिक न्याय और शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने का वादा किया गया है।
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