यह आश्चर्यजनक था – हालांकि होना नहीं चाहिए था – कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को छठे रामनाथ गोयनका व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया जाए, जैसे कि भारत के लोग पत्रकारिता पर उनकी बात सुनने के लिए सांस रोके इंतजार कर रहे हों।
मेरी पहली प्रतिक्रिया थी, अविश्वास। उन्हें भारतीय पत्रकारों को भाषण देने की क्या जरूरत, जब प्रधान मंत्री के रूप में ग्यारह सालों में उन्होंने एक भी प्रेस सम्मेलन को संबोधित नहीं किया? पत्रकारिता के मूल में, आखिरकार, जवाबदेही, सवालों का सामना करना और जवाब देना है, न कि ऊंचे मंचों से एकालाप करना जिसमें किसी के पलट कर पूछने का कोई जोखिम न हो।
लेकिन फिर, मैंने खुद को याद दिलाया, यह पत्रकारिता का मंच नहीं था। यह नरेंद्र मोदी के लिए मंच था जिस पर वह अपनी पसंद के विषय पर कुछ भी बोल सकते थे बिना विरोधाभास के भय के। निमंत्रण स्वीकार करने के लिए उन्हें दोष देना बेकार है, सवाल है कि ऐसा निमंत्रण दिया ही क्यों गया?
रामनाथ गोयनका मामूली मीडिया मालिक नहीं थे। वह अपने आप में एक राजनीतिक ताकत थे। मोदी ने दर्शकों को याद दिलाया कि गोयनका ने 1971 में विदिशा से भारतीय जन संघ के टिकट पर आम चुनाव लड़ा था। जो उन्होंने नहीं बताया वह यह कि उससे पहले के एक चुनाव में गोयनका ने अपनी पूरी ताकत लगा दी कि उत्तरी बॉम्बे से वी के कृष्णा मेनन की हार हो और फिर मेनन के जीतने पर अपमान का घूंट पीकर रह जाना पड़ा। यह ऐतिहासिक चूक कोई दुर्घटना नहीं थी, सुविधाजनक थी।
मोदी ने यह भी बताया कि नानाजी देशमुख ने गोयनका को बताया था कि उनकी विदिशा में जरूरत केवल नामांकन दाखिल करने के लिए और बाद में अपना चुनावी प्रमाणपत्र लेने के लिए थी। जो उन्होंने छोड़ दिया – फिर सुविधा से – ग्वालियर राजमाता विजया राजे सिंधिया की महत्वपूर्ण मदद, जिन्होंने बिना थके उनके लिए प्रचार किया। उन्होंने, सबसे अधिक उनकी मदद जीतने में की, ऐसे समय जब इंदिरा गांधी की देश में लहर थी। यदि प्रधानमंत्री इतिहास की बात करना चाहते थे तो कम से कम ईमानदारी से करते।
आम तौर पर, मैं भाषण सुनने की जहमत नहीं करता। मोदी किसी भी विषय पर उसे बिना अपने महिममंडन की क्रिया में बदले बोल ही नहीं सकते। मैंने उन्हें आमने-सामने केवल एक बार सुना है – श्री नारायण गुरु की महात्मा गांधी से मुलाकात की शताब्दी के अवसर पर।
ऐसे महत्वपूर्ण मौके पर, जब भारत के सबसे बड़े सुधारकों में से एक पर गंभीर चिंतन की अपेक्षा थी, उन्होंने केवल अपनी सरकार की उपलब्धियों, अपनी योजनाओं, अपनी पहलों के बारे में बात की। जाति उत्पीड़न समाप्त करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले एक दार्शनिक संत के बारे में बहुत ही कम बोला।
उस अनुभव के कारण, मेरे पास यूट्यूब पर उनके गोयनका पर भाषण सुनने का भी कोई कारण नहीं था। लेकिन फिर, मैंने “एक्स” पर भाषण की तारीफ करते शशि थरूर को देखा। उससे मुझे झटका लगा।
थरूर कोई राजनीतिक नौसिखिया नहीं हैं। वह चार बार सांसद रह चुके हैं। उन्होंने राष्ट्रवाद, इतिहास, कूटनीति और राजनीति पर काफी कुछ लिखा है। ऐसे व्यक्ति को मोदी का भाषण “सम्मोहक” लगना यही बताता है कि या तो आपकी समझ में फेर है या फिर यह सोच समझकर राजनीतिक पुनर्स्थापन का कार्य है।
इधर, वह भाजपा में काँग्रेस से भी ज्यादा अच्छाइयाँ देखने लगे हैं। उन्हें नरेंद्र मोदी की तारीफ करना राहुल गांधी अथवा प्रियंका को स्वीकार करने से ज्यादा आसान लगने लगा है – वह सुविधाजनक तरीके से भूल जाते हैं कि जिस वंशवाद की वह आलोचना करते हैं, वह खुद उसके लाभार्थी हैं।
वरना इसे कैसे समझा जाए कि यही थरूर वायनाड़ में प्रियंका गांधी के लिए प्रचार करने गए थे, अब वंशवादी राजनीति को अस्वस्थ कह रहे हैं? यदि वह वंशवादी थीं, तो उनका प्रचार क्यों करना? मोदी के लिए जब वह मीठी-मीठी बातें कर रहे थे, काँग्रेस बिहार में एक कठिन लड़ाई लड़ रही थी। क्या यह अनजाने में था या सोच समझकर?
थरूर की तारीफ ने मुझे पूरा भाषण सुनने पर मजबूर किया। भाषण उम्मीदों पर खरा उतरा – बयानबाजी से भरा सारहीन और पूरी तरह खुद पर केंद्रित। तारीफ करने जैसा कुछ नहीं, कतई कुछ नहीं। (यह दो वाक्यों में मेरी समीक्षा है।)
मोदी ने बिहार में एनडीए की जीत का श्रेय लिया, यह कहते हुए कि महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा संख्या में मतदान किया। उन्होंने कहा कि नौ फीसदी महिलाओं ने ज्यादा वोट किया और उन्होंने इसे “विकास” का प्रमाण बताया। वह किस तरह के विकास की बात कर रहे थे? जुलाई 2024 में सत्रह दिनों की अवधि में बारह – छोटे और बड़े – पुल बिहार में गिरे थे। यदि यह विकास है तो नाश कैसा होता होगा यह सोचने से भी डर लगता है।
मैं आपको बताता हूँ कि वह क्या था जिसने बिहार को भाजपा-नीत गठजोड़ की झोली में डाला। ऐसा करने के लिए भारतीय इतिहास के एक जाने-माने किस्से – प्लासी का युद्ध – को याद करना होगा। छात्र जानते हैं कि अंग्रेजों ने यह युद्ध केवल बेहतर हथियारों के बल पर नहीं जीता। वह जीते क्योंकि मीर जाफ़र को रिश्वत दी गई और गद्दार बनाया गया। बारूद नहीं, रिश्वत से उन्हें जीत और अपना साम्राज्य जीत में मिला।
क्लाइव अपने समय के सबसे बड़े अमीर बनकर इंग्लैंड लौटे। जो भारत से अमीर होकर लौटते थे, उन्हें “नबोब” कहा जाता था, जो हमारे अपने शब्द “नवाब” से निकला है। भारतीय चुनाव आज उस समय का प्रतिबिंब लगते हैं। बिहार का हालिया चुनाव इसका एक संकेत है।
पहलगाम आतंकी हत्याओं के तुरंत बाद मोदी जब बिहार गए, वह पीड़ितों से नहीं मिले। इसके बदले उन्होंने मतदाताओं से कहा कि उनके वोट “पाकिस्तान को जवाब” होंगे। लेकिन केवल भावुकता 243 सीटों में से 202 सीटें नहीं जिता सकती।
असल नाटक मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण से शुरू हुआ। 2024 की सूची को आधार बनाकर इस्तेमाल करने के बजाय चुनाव आयोग ने 2003 की सूचियों को आधार बनाया। सत्तर लाख नाम गायब हो गए। चार लाख नए नाम सामने आए। इसने कई परेशान करने वाले सवालों को जन्म दिया जिनका जवाब देने में आयोग ने कोई रुचि नहीं दिखाई।
इस बीच, आदर्श आचार संहिता लागू करने से पहले आयोग ने सब्र से तब तक इंतजार किया जब तक कि सारी योजनाएं घोषित नहीं कर दी गईं। और मास्टर स्ट्रोक आया 26 सितंबर को जब मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना लॉन्च की गई।
इस योजना के तहत 1.1 करोड़ महिलाओं को 10,000 रुपये से 2 लाख रुपये तक लघु व्यवसाय करने के लिए मदद का वादा किया गया। इसके कुछ दिनों – हफ्तों नहीं – के भीतर 21 लाख महिलाओं के खातों में 10,000 रुपये ट्रांसफर किए गए। यह पहली किश्त थी।
याद रहे, बिहार में, जहां भारत में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय 32227 रुपये – है, वहाँ 10,000 रुपये कोई छोटी रकम नहीं है। लाखों महिलाओं के लिए यह अप्रत्याशित लाभ था और हर अप्रतियाशित लाभ के पीछे एक डर लगा राहत है, क्या होगा अगर सरकार बदल जाएगी? क्या यह लाभ भी गायब हो जाएगा?
ऐसे में क्या यह आश्चर्यजनक है कि महिलाओं ने इतनी संख्या में वोट किया? कि लगभग 80 फीसदी मतदान दर्ज हुआ? कि सत्तारूढ़ गठजोड़ चुनाव जीत गया?
और यह केवल अकेली योजना नहीं थी। 125 यूनिट से कम खपत वाले दो करोड़ घरों के बिजली बिल माफ किए गए। सामाजिक सुरक्षा पेंशन बढ़ाकर 1100 रुपये की गई। बेरोजगार युवाओं को दो साल से प्रति माह 1000 रुपये बेरोजगारी भत्ता दिया गया। बिहार में घर का हर सदस्य लाभार्थी बन गया।
भाजपा इसे विकास के लिए वोट कहती है। लेकिन एनडीए ने बिहार में पिछले बीस सालों से शासन किया है। उन सालों में, बिहार हर सूचकांक में सबसे नीचे रहा है – नवजात मृत्यु दर, मातृ स्वास्थ्य, साक्षरता, महिला शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर। अगर यह विकास है तो विकल्प क्या होगा।
जन सुराज पार्टी ने आरोप लगाया है कि विश्व बैंक के 14,000 करोड़ रुपये की राशि इन भुगतानों के लिए लगाई गई। यदि यह आरोप आंशिक तौर पर भी सही है तो इसका मतलब है कि भारत ने विश्व का पहला ऐसा चुनाव देखा है जिसकी फन्डिंग अंतर्राष्ट्रीय पैसे से की गई है। यदि चुनाव नीलामी बनने लगेंगे तो लोकतंत्र वस्तु बनने लगेगा।
शेखसपियर ने जूलियस सीज़र में लिखा था, “दोष, प्यारे ब्रूटस, हमारे सितारों में नहीं है, हममें है।” बिहार के चुनाव हमें खुद से असुविधाजनक सवाल पूछने पर मजबूर कर रहे हैं। यदि वोटिंग प्रक्रिया ही अपने आप में भ्रष्ट कर दी जाए – प्रलोभनों से, मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों से, सोची-समझी देरी से – लोकतंत्र का क्या बचेगा? यदि वोट खरीदे जा सकते हैं, तो लोकतंत्र ही कब तक बिकने से बचा रहेगा?
इस परेशान करने वाली पृष्ठभूमि में, मोदी के गोयनका व्याख्यान एक और जानी पहचानी प्रवृत्ति दर्शाई : लाभ के लिए इतिहास से छेड़छाड़ करने की। वह थॉमस बैबिंगटन मैकाले पर हमला करने के लिए 200 साल पीछे चले गए और एक ऐसा फर्जी उद्धरण पेश किया जो फैलाया तो काफी गया है लेकिन उसका कोई ठोस आधार नहीं है।
फर्जी उद्धरण दावा करता है कि मैकाले ने भारत भर में घूमने पर कोई भिखारी या चोर नहीं देखा और भारत की समृद्धि व नैतिकता की तारीफ की और निष्कर्ष निकाला कि ब्रितान को भारत की सांस्कृतिक रीढ़ तोड़नी होगी। इसका कोई प्रमाण नहीं है कि मैकाले ने ऐसा कोई बयान दिया या लिखा। विद्वानों ने इसका लगातार खंडन किया है। यह उनके लेखन में नहीं दिखता। वह तब भारत में थे जब कथित रूप से ब्रिटिश संसद में उन्होंने यह बयान दिया। इसके अलावा, इस्तेमाल भाषा आधुनिक है, वह भाषा नहीं जो किंग जेम्स के बाइबल संस्करण में मिलती है।
यह सच है कि भारतीय शिक्षा पर मैकाले के मिनट में यूरोपीय श्रेष्ठता में उनका विश्वास झलकता है। वह एक औपनिवेशिक प्रशासक थे, भारतीय संस्कृति के पैरोकार नहीं। उनके पिता मिशनरी थे, जिन्होंने उनमें ऐसे मूल्य डाले थे, जो मोदी समझ नहीं सकते। लेकिन तथ्यों का महत्व है। उद्धरणों का महत्व है। इतिहास का महत्व है। भारत के प्रधानमंत्री को एक महान अखबारनवीस को समर्पित स्मृति व्याख्यान में फर्जी इतिहास उद्धृत करने का अधिकार नहीं है।
मोदी, लगता है यह भी नहीं जानते थे – या मानने को तैयार नहीं हैं – कि भारत में शिक्षा का ब्रिटिश से पहले क्या हाल था। शिक्षा कुछ विशेषअधिकार प्राप्त जातियों तक सीमित थी। निचली जातियों और महिलाओं के लिए संस्कृत श्लोक पढ़ने की मनाही थी। सार्वभौमिक स्कूलिंग का विचार हिंदू सामाजिक व्यवस्था से नहीं आया था। मिशीनरी, सुधारक और औपनिवेशिक प्रशासकों ने शिक्षा के विस्तार में प्रमुख भूमिका निभाई। दुनिया ने वेदों के बारे में जाना जब मैक्स मूलर को ब्रिटिश पूर्वी इंडिया ने 1847 में ऋग्वेद का अनुवाद करने को कहा, एक परियोजना जिसने पूरा होने में 27 साल लिए। उनके इरादों की आलोचना हो सकती है लेकिन उनके योगदान को मिटाया नहीं जा सकता।
मैकाले ने भारत को भारतीय दंड संहिता दी, जो देश में सबसे कम संशोधित कानूनों में से है। अमित शाह ने इसे देसी सुनने में आने वाले विकल्प से बदला है, लेकिन जैसा कि जाने माने वकील कपिल सिब्बल ने कहा था, यह पुराने आईपीसी का गूगल ट्रांसलेट किया हुआ अनुवाद लगता है – जिसमें बस नंबर ताश के पत्तों की तरह बदले गए हैं।
थरूर की तारीफ इसलिए ज्यादा चौंकाती है कि वह खुद मोदी के तीखे आलोचक रहे हैं। उनकी किताब पैराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व, प्रशासनिक शैली और विचारधारात्मक परियोजना का विस्तृत विश्लेषण है। इन पन्नों में मोदी की कोई तारीफ नहीं मिलती। कुछ है तो, किताब भारत को अंध नायक पूजा के खतरों के बारे में चेतावनी देती है।
और इसके बावजूद – वह ऐसे भाषण की तारीफ कर रहे थे जो तथ्यात्मक रूप से गलत थी, ऐतिहासिक रूप से संदिग्ध थी, राजनीतिक रूप से पक्षपाती थी और भाषणबाज़ी के नजरिए से अपेक्षित ही थी।
मोदी ने रामनाथ गोयनका मंच को पत्रकारिता पर बात करने के लिए नहीं, काँग्रेस पर हमले – यहाँ तक कि यूपीए मंत्रियों, जिनमें थरूर खुद भी थे – पर हमले के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने उन सरकारों को पिछड़े जिलों की उपेक्षा करने का आरोप लगाया। उन्होंने तथ्यों की अनदेखी की। उदाहरण के लिए, गोयनका ने अपना अखबार अंग्रेजी में शुरू किया, तमिल या हिन्दी में नहीं। और थरूर ने उनकी सराहना की, क्यों?
महत्वकांक्षा? बदलाव? राजनीतिक रूप से प्रासंगिक रहने की कोशिश? थरूर के आंतरिक सर्कल के बाहर कोई नहीं जानता। लेकिन यह प्रतीकात्मकता महत्वपूर्ण है। जब बुद्धिजीवी ताकतवरों से सवाल पूछने के बजाय उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगें तो लोकतंत्र अंकुश खो देता है।
बिहार चुनावों ने भारतीय राजनीति में एक खतरनाक मिसाल पेश की है। वोट खरीदी छिपी हुई नहीं रह गई, राज्य मशीनरी के जरिए इसे संस्थानिक बनाया गया है। चुनाव आयोग संविधान की तरफ से इसे दी भूमिका निभाने से झिझकता दिखाई दे रहा है। कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा, इन पर अमल, और इनका शस्त्रीकरण सांस रोक देने वाली रफ्तार से किया जा रहा है, राजनीतिक प्रचार बहस से नहीं वित्तीय हस्तांतरण से चलने लगा है।
बिहार नतीजे विकास के लिए वोट नहीं थे। यह वोट डर, लालच, जोड़तोड़, नकदी की बाढ़ से बना वोट था। मोदी के रामनाथ गोयनका व्याख्यान में इन मुद्दों पर प्रकाश डालने के बजाय चुनिंदा इतिहास और पक्षपाती छाती ठोंकने की एक और प्रक्रिया थी। इसके बावजूद, थरूर ने इसकी तारीफ की – एक कार्य जो जितना चौंकाता है उतना ही निराश करता है। शायद इसलिए आखरी शब्द शेख्सपियर के ही होने चाहिए, जिनकी समझ सदियों बाद आज भी गूँजती है – “जो बीत चुका है वो प्रस्तावना है।”
जब तक कि भारत अपनी चुनावी प्रक्रियाएं सुधारता नहीं है, अपने संस्थानों की स्वतंत्रता फिर से हासिल नहीं करता और राजनीतिक बहस की गरिमा नहीं लौटाता, भविष्य अतीत की तरह ही दिखेगा – जहां सत्ता खरीदी जाती है, जीती नहीं जाती और जहां सच जरूरी नहीं वैकल्पिक है। फिलहाल, मैं इतना ही कह सकता हूँ, गुस्से से ज्यादा दुख की भावना से : थरूर, आप भी?
(एजे फिलिप का लेख इंडियन करंट्स से साभार। अनुवाद : महेश राजपूत। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)





