-महेश राजपूत
होमबाउन्ड फिल्म नेटफ्लिक्स पर आ चुकी है। फिल्म अकादमी पुरस्कारों के लिए भारत की तरफ से भेजी गई है और बेशक अच्छी फिल्म है। लेकिन फिल्म की समीक्षा करना या फिल्म के बारे में बात करना इस टिप्पणी का विषय नहीं है। जिस बात ने इन पंक्तियों के लेखक का ध्यान खींचा वह फिल्म का डिस्क्लेमर है।
इस फिल्म के डिस्क्लेमर यानि अस्वीकरण में कहा गया है कि फिल्म की विषयवस्तु, कथा, पटकथा, किरदार और उनकी भावनात्मक यात्रा विशुद्ध रूप से काल्पनिक है और एकमात्र उद्देश्य मनोरंजन है। किन्हीं वास्तविक घटनाओं, इकाइयों, व्यक्तियों, मृत अथवा जीवित, से इसकी साम्यता महज एक इत्तेफाक और गैर इरादतन है।
अस्वीकरण यहीं पूरा नहीं होता। आगे कहा गया है कि फिल्मकार संवैधानिक मूल्यों में और धार्मिक सहअस्तित्व की भारतीय परंपरा में विश्वास रखता है। फिल्म महामारी (कोविड-19) के संदर्भ में केन्द्रीय और राज्यों की विधायिकाओं और सरकारों के सभी कार्यों, आदेशों और नियमों का सम्मान करती है। हम केन्द्रीय व राज्य सरकारों, उनकी विभिन्न एजेंसियों और सभी कोरोना योद्धाओं के योगदान को पहचानते हैं, जिन्होंने अपना स्वास्थ्य जोखिम में डालकर राष्ट्र की सेवा की और वायरस के फैलाव को नियंत्रित करने में मदद की।
अस्वीकरण फिल्म के निर्माण के दौरान किसी पशु को नुकसान न पहुंचाने के औपचारिक वाक्य के साथ खत्म होता है।
दिखने में किसी को इस डिस्क्लेमर में कुछ असामान्य नहीं लग सकता लेकिन इसे असामान्य दो बातें बनाती हैं। इसके कुछ फ्रेम के बाद ही परदे पर लिखा आता है “एक सच्ची कहानी पर आधारित”।
अब तक यह सबको पता है कि फिल्म न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट (शीर्षक : “अ फ्रेंडशिप, अ पैन्डेमिक एण्ड अ डेथ बिसाइड हाईवे”) पर आधारित है जो दो दोस्तों की कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान पैदल घर लौटने के प्रयास पर आधारित थी। यह रिपोर्ट एक वास्तविक घटना की तस्वीर “टेकिंग अमृत होम” से प्रेरित थी।
यानी, फिल्म के स्टोरी डेवलपमेंट, पटकथा या किरदारों के चरित्र चित्रण व घटनाओं के प्रस्तुतीकरण में किए गए बदलावों और क्रिएटिव लिबर्टी को छोड़ भी दें तो फिल्म का मूल एक सच्ची घटना पर ही आधारित है। ऐसे में अस्वीकरण का पहला हिस्सा तो बेकार ही हो जाता है न? यह बिन्दु भी तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता कि फिल्म का उद्देश्य केवल मनोरंजन है।
यह फिल्म आपका मनोरंजन नहीं करती, आपको परेशान करती है, सोचने पर मजबूर करती है। एक दलित व एक मुस्लिम किशोर की दोस्ती की कहानी गरीबी, बेरोजगारी, पितृसत्ता, जातीय व धार्मिक भेदभाव, शोषणकारी व्यवस्था की चक्की में पिस रहे लोगों की कहानी है जो चार ट्रिलियन की इकोनामी वाले “इंडिया” की नहीं, निराशा, हताशा में गोते लगाने के बावजूद बेहतर कल की उम्मीद में जी रहे “भारत” की कहानी है।
अस्वीकरण के दूसरे हिस्से पर आते ही समझ में आ जाता है कि फ़िल्मकारों ने अपने से यह डिस्क्लेमर नहीं डाला, उन्हें यह अस्वीकरण डालना पड़ा है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि सबको पता है कि फिल्म अकादमी पुरस्कारों के लिए भेजे जाने के बावजूद सेंसर बोर्ड यानि केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड में फंसी थी।
संभवत: फिल्म से मार्टिन स्कोर्सेस जैसी हस्ती का नाम जुड़ा होने, काँस समेत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फिल्म को मिली प्रसिद्धि के कारण सेंसर बोर्ड ने बहुत ज्यादा कैंची नहीं चलाई लेकिन डिस्क्लेमर तो डलवा ही दिया।
यह तो ऐतिहासिक सच है कि कोविड-19 महामारी के दौरान करोड़ों प्रवासी मजदूरों को हजारों किलोमीटर पैदल चलकर घर लौटना पड़ा था क्योंकि लॉकडाउन के कारण महानगरों में उनका रोजगार छिन गया, किराये के मकान से निकाल दिया गया और भुखमरी की नौबत आ गई तो घर लौटने के सिवा कोई चारा नहीं बचा। ट्रेन, बस सेवा ठप्प होने के कारण अधिकांश को निजी ट्रक-टेम्पो में जानवरों की तरह ठुंसकर जाना पड़ा या फिर पैदल जाना पड़ा।
फिर जगह-जगह पुलिस के इन पर लाठी भाँजने से लेकर अस्थायी जेलों में डाल देने की खबरें भी आईं। दुर्घटनाओं में, लगातार चलने की थकावट, भूख समेत विभिन्न कारणों से सैकड़ों लोगों की मौत भी हुई, जो लगभग साल भर चली कोविड-19 महामारी के दौरान बीमारी, ऑक्सीजन की कमी आदि कारणों से मारे गए लाखों लोगों से अलग थीं।
कहीं न कहीं इसके लिए सरकारी बदइंतजामी या कहें कि इंतज़ामों की कमी/अभाव जिम्मेवार थे। तो इस अर्थ में फिल्मकारों के लिए फिल्म में इस तरह का अस्वीकरण देने का क्या मतलब है? सरकार के लिए भले ही अर्थ हो। क्योंकि किसी भी तरह के नकारात्मक प्रचार से बचने के लिए इस सरकार का “पर्सेप्शन मैनेजमेंट” और “हेडलाइन मैनेजमेंट” पुराना ट्रैक रिकार्ड है।
इससे पूर्व, जातीय भेदभाव की पृष्ठभूमि पर बनी प्रेमकथा धड़क-2 में भी काफी बड़ा डिस्क्लेमर देना पड़ा था। उस फिल्म की निर्माता कंपनी भी धर्मा प्रोडक्शन ही थी। उस फिल्म को काफी कांटछांट का सामना भी करना पड़ा था।
उससे पूर्व आमिर खान की सितारे जमीन पर में सेन्सर बोर्ड ने प्रधानमंत्री का एक उद्धरण ही डलवा दिया, जबकि फिल्म के कथानक से उसका कोई लेना-देना नहीं था। हाल ही में फिल्म हक, जो शाह बानो केस पर बनी है में फिल्म के अंत में मोदी सरकार के तीन तलाक खत्म करने के फैसले का जिक्र किया गया।
इस तरह की मिसालें यही बता रही हैं कि यह सरकार, और कुछ हो न हो, अपनी छवि को लेकर, बहुत संवेदनशील है। कथित उपलब्धियों का श्रेय लेना और जरा भी नकारात्मक आलोचना को सेन्सर करने या डिस्क्लेमर दिलवाकर डायल्यूट करने का कोई मौका नहीं छोड़ती।
बेशक, फिल्मकार कभी यह स्वीकार नहीं करेंगे कि उनकी बांह मरोड़कर यह डिस्क्लेमर दिलवाए गए हैं या फिर सरकार को खुश करने के लिए उन्होंने अपनी मर्जी से यह डिस्क्लेमर दिए हैं लेकिन जातीय भेदभाव, सांप्रदायिकता, मानवाधिकारों और नोटबंदी से लेकर कोविड-19 तक किसी भी नीतिगत फैसले की आलोचना के प्रति यह सरकार कितनी सचेत है वह “संतोष” “पंजाब 95” जैसी फिल्मों को सेंसर प्रमाणपत्र न दिए जाने से पता चलता ही है।
यह हर महीने आ रही किसी न किसी प्रोपगेंडा फिल्म से भी दिख जाता है, जिनमें फर्जी इतिहास से लेकर झूठ और नफरत के सहारे सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने, वीभत्स हिंसा से लेकर अंध देशभक्ति और उन्माद को बढ़ावा देने पर न सिर्फ सेन्सर बोर्ड आँखें मूँद लेता है, राज्य टैक्स फ्री जैसी रियायतों से नवाजते हैं और सरकार खुद अपने फिल्मोत्सव में पुरस्कृत करती है।
क्या फर्क पड़ता है कि फिल्मोत्सव में जूरी सदस्य और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्मकार ऐसी फिल्मों को “प्रोपगेंडा फिल्म” करार दे देते हैं।





