विजयलक्ष्मी पंडित देश की पहली महिला कैबिनेट मंत्री और संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष थीं. 1 दिसंबर को उनकी पुण्यतिथि है. जवाहरलाल नेहरू की बहन होने से इतर, उन्होंने अपनी कूटनीति से दुनिया में लोहा मनवाया. उन्होंने कोरियाई युद्ध के दौरान परमाणु आपदा टालने में अहम भूमिका निभाई थी. आजादी की लड़ाई में जेल जाने वाली विजयलक्ष्मी ने इमरजेंसी का भी विरोध किया था. वे सही मायनों में भारत की पहली ‘आयरन लेडी’ थीं.
भारतीय इतिहास में जब भी ताकतवर महिलाओं का जिक्र होता है, तो अक्सर इंदिरा गांधी का नाम सबसे पहले आता है. लेकिन इंदिरा से भी पहले, नेहरू खानदान की एक और ‘शेरनी’ थी जिसने पूरी दुनिया में भारत का डंका बजाया था. वो नाम है- विजयलक्ष्मी पंडित. उनके सामने अमेरिका और रूस जैसी महाशक्तियां भी नतमस्तक होती थीं. आज ही के दिन यानी 1 दिसंबर 1990 को पंडित ने दुनिया को अलविदा कहा था. विजयलक्ष्मी पंडित सिर्फ देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन नहीं थीं. उनका कद इससे कहीं बड़ा था. वे आजाद भारत की वो आवाज थीं, जिसे सुनने के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) में सन्नाटा छा जाता था. उन्होंने उस दौर में परमाणु युद्ध (Nuclear War) के खतरे को टाला था, जब पूरी दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी थी. आइए जानते हैं भारत की उस बेटी की कहानी, जिसने दुनिया को कूटनीति का असली पाठ पढ़ाया.
विजयलक्ष्मी पंडित का जन्म कब हुआ? किनी पढ़ी-लिखी थीं?
18 अगस्त 1900 को प्रयागराज (तब का इलाहाबाद) के रईस वकील मोतीलाल नेहरू के घर ‘स्वरूप कुमारी’ का जन्म हुआ. यही स्वरूप कुमारी आगे चलकर विजयलक्ष्मी पंडित बनीं. घर में दौलत की कोई कमी नहीं थी. भाई जवाहरलाल नेहरू की वे बेहद लाड़ली थीं. हैरानी की बात यह है कि विजयलक्ष्मी ने किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी से डिग्री नहीं ली थी. उनकी पढ़ाई घर पर ही हुई और वे सिर्फ 12वीं पास थीं. लेकिन उनकी अंग्रेजी, उनका जनरल नॉलेज और कूटनीति की समझ ऐसी थी कि बड़े-बड़े पीएचडी होल्डर्स उनके सामने पानी भरते थे.
विजयलक्ष्मी पंडित के पति कौन थे?
विजयलक्ष्मी की शादी 1921 में रंजीत सीताराम पंडित से हुई. रंजीत एक बैरिस्टर थे और काठियावाड़ के एक विद्वान परिवार से थे. देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी. गांधीजी के एक आह्वान पर विजयलक्ष्मी ने रेशमी कपड़े त्याग दिए और खादी अपना ली. वे महलों का सुख छोड़कर सड़कों पर उतर आईं. 1932 में उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया और जेल गईं. यह सिलसिला लंबा चला.
विजयलक्ष्मी पंडित: नेहरू की वो ‘शेरनी’ बहन जिसने दुनिया को झुकाया
उनकी जिंदगी में सबसे बड़ा तूफान तब आया जब उनके पति रंजीत पंडित को ब्रिटिश सरकार ने जेल में डाल दिया. जेल की बदतर स्थितियों के कारण रंजीत बीमार पड़ गए और 1944 में उनका निधन हो गया. विजयलक्ष्मी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. उस समय के हिंदू कानून के मुताबिक, पति की संपत्ति में विधवा को हक नहीं मिलता था. वे आर्थिक तंगी से गुजरीं, लेकिन उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया. उन्होंने अपने दर्द को ताकत बनाया और आजादी की लड़ाई में खुद को झोंक दिया.
विजयलक्ष्मी पंडित: देश की पहली महिला कैबिनेट मिनिस्टर
आजादी मिलने से पहले ही विजयलक्ष्मी ने अपनी काबिलियत साबित कर दी थी. 1937 में जब ब्रिटिश राज के तहत चुनाव हुए, तो वे संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) की विधानसभा के लिए चुनी गईं. उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया. यह एक ऐतिहासिक पल था. वह भारत की पहली महिला थीं जो कैबिनेट मिनिस्टर बनी थीं. उन्होंने उस दौर में साबित कर दिया था कि महिलाएं सिर्फ घर चलाने के लिए नहीं, बल्कि सरकार चलाने के लिए भी बनी हैं.
विजयलक्ष्मी पंडित का डिप्लोमेटिक करियर कब शुरू हुआ?
आजादी के बाद भारत को एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो वैश्विक मंच पर देश का पक्ष मजबूती से रख सके. भाई जवाहरलाल नेहरू ने अपनी बहन की काबिलियत पर भरोसा किया. विजयलक्ष्मी को सोवियत संघ (अब रूस) में भारत का पहला राजदूत बनाया गया.
यह वो दौर था जब कोल्ड वॉर शुरू हो चुका था. रूस और अमेरिका एक-दूसरे के खून के प्यासे थे. ऐसे में एक महिला का मास्को में जाकर काम करना आसान नहीं था. लेकिन विजयलक्ष्मी ने अपनी कूटनीति से स्टालिन जैसे सख्त नेता को भी प्रभावित किया.
इसके बाद वे अमेरिका में भारत की राजदूत बनीं. वाशिंगटन में उनकी सुंदरता, वाकपटुता और साड़ी पहनने के अंदाज ने सबको दीवाना बना दिया. वे जहां भी जाती थीं, लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए जमा हो जाते थे. उन्होंने अमेरिका को भारत की गुटनिरपेक्ष (Non-aligned) नीति का मतलब समझाया. उन्होंने साफ कर दिया कि भारत किसी गुट का पिछलग्गू नहीं बनेगा.

जवाहरलाल नेहरू और विजयलक्ष्मी पंडित, अमेरिकी राष्ट्रपति हेनरी एस. ट्रूमैन के साथ.
विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र में कब पहुंचीं?
1953 का साल भारत के लिए गर्व का साल था. विजयलक्ष्मी पंडित को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) का अध्यक्ष चुना गया. वे इस पद पर बैठने वाली दुनिया की पहली महिला थीं. यह एक ऐसा रिकॉर्ड था जिसने पश्चिमी देशों की सोच बदल दी. उस समय तक पश्चिम के लोग एशियाई महिलाओं को कमजोर समझते थे. लेकिन विजयलक्ष्मी ने उस कुर्सी पर बैठकर दुनिया के बड़े-बड़े नेताओं को नियम-कायदे सिखाए.
परमाणु युद्ध रोकने वाली ‘आयरन लेडी’
विजयलक्ष्मी पंडित का सबसे बड़ा योगदान कोरियाई युद्ध के दौरान देखने को मिला. 1950 के दशक में उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच भीषण युद्ध चल रहा था. अमेरिका और चीन आमने-सामने थे. दुनिया को डर था कि अमेरिका परमाणु बम (Nuclear Bomb) का इस्तेमाल कर सकता है. अगर ऐसा होता तो पृथ्वी पर महाविनाश तय था.
उस समय विजयलक्ष्मी पंडित ने शांतिदूत की भूमिका निभाई. उन्होंने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ से दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाया. उन्होंने रॉबर्ट ओपेनहाइमर (परमाणु बम के जनक) और बर्ट्रेंड रसेल जैसे वैज्ञानिकों और विचारकों के साथ मिलकर परमाणु हथियारों के खिलाफ माहौल बनाया.
उन्होंने दुनिया को चेताया कि परमाणु युद्ध में कोई नहीं जीतेगा, सिर्फ इंसानियत हारेगी. उनकी कोशिशों का नतीजा था कि कोरियाई युद्ध में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं हुआ और लाखों जानें बच गईं.
अक्सर आलोचक कहते थे कि विजयलक्ष्मी को सब कुछ इसलिए मिला क्योंकि वे नेहरू की बहन थीं. लेकिन यह सच नहीं है. नेहरू ने उन्हें मौका जरूर दिया, लेकिन उस मौके को सोने में बदलने का काम विजयलक्ष्मी ने खुद किया. वे एक निडर महिला थीं. यहां तक कि अपनी भतीजी इंदिरा गांधी से भी उनके मतभेद हुए.
जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई, तो विजयलक्ष्मी पंडित ने उसका खुलकर विरोध किया. उन्होंने अपने भाई की बेटी के खिलाफ प्रचार किया और लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ी. यह दिखाता है कि उनके लिए देश और सिद्धांत परिवार से ऊपर थे.

UNGA की पहली महिला अध्यक्ष थीं विजयलक्ष्मी पंडित
अकेलेपन में गुजरा आखिरी वक्त
इतनी चकाचौंध और शोहरत देखने वाली विजयलक्ष्मी का आखिरी समय सादगी में गुजरा. वे राजनीति से संन्यास लेकर देहरादून में रहने लगी थीं. उनके पास न कोई बड़ा पद था और न ही कोई सत्ता. लेकिन उनका रूतबा तब भी कम नहीं हुआ था. 1 दिसंबर 1990 को 90 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली.
विजयलक्ष्मी पंडित आज की पीढ़ी के लिए एक मिसाल हैं. उन्होंने उस दौर में लिंग भेद (Gender Bias) को कुचला जब महिलाओं को घर से निकलने की इजाजत नहीं थी. उन्होंने विधवा होने के सामाजिक दंश को झेला लेकिन कभी बेचारी नहीं बनीं. उन्होंने दुनिया को दिखाया कि भारत की महिलाएं साड़ी पहनकर भी दुनिया चला सकती हैं.






