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*क्या आस्था सिर्फ़ डर है?”*

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(शोपेनहावर की कृति Religion – A Dialogue पर आधारित )

–        तेजपाल सिंह तेज

–         सभ्यता के इतिहास में धर्म ने मनुष्य को कभी अत्यंत दयालु बनाया है, तो कभी भय और आक्रोश से भर दिया है। यही सबसे विचित्र बात है—एक ही पवित्र ग्रंथ को पढ़कर कोई मन से शांत और करुणामय हो जाता है, जबकि वही ग्रंथ किसी अन्य को क्रूर, असहिष्णु और उग्र बना देता है।

आख़िर ऐसा क्यों?

          धर्म एक ही, शब्द वही, परन्तु मनुष्य दो बिलकुल विपरीत रूपों में क्यों ढल जाते हैं? इसी रहस्य को समझने के लिए दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर ने अपनी प्रसिद्ध कृति “Religion: A Dialogue” में धर्म, आस्था, भय, अनुष्ठान और सत्ता–इन पाँचों के बीच छिपे जटिल संबंधों को प्रश्नों के माध्यम से उद्घाटित किया है। यह पुस्तक धर्म की निंदा नहीं करती, बल्कि यह दिखाती है कि धर्म को हम कैसे समझेंक्यों मानेंऔर किस रूप में उसका प्रभाव मानव मन को निर्देशित करता है।

अध्याय 1: आस्था का प्रश्न — क्या हम विश्वास करते हैं या हमें सिखाया जाता है?

आस्था की शुरुआत मंदिर की घंटी या किसी प्रार्थना से नहीं होती। उसकी शुरुआत उस क्षण से होती है, जब किसी बच्चे से कहा जाता है— डरो मत… वरना भगवान नाराज़ हो जाएगा।” धीरे-धीरे यह डर ही भक्ति बन जाता है। जैसे अँधेरे में एक बच्चा ‘अदृश्य परछाई’ के डर से सो जाता है—नींद आती है, पर शांति नहीं। कई परंपराएँ इसी डर का रूप ले लेती हैं।
किसी मंदिर में एक लड़की को इसलिए रोक दिया जाता है क्योंकि “आज उसका अंदर जाना अशुभ माना जायेगा।” कोई तर्क नहीं—सिर्फ़ “ऐसे ही होता आया है”। लेकिन क्या धर्म सच में संवेदनशील होता, तो क्या वह किसी को द्वार पर ही रोक देता? आस्था और डर के बीच यह भ्रम तभी टूटता है जब मनुष्य एक दिन अकेले में स्वयं से पूछता है— यदि मैं यह नियम न मानूँतो क्या सच में कुछ बुरा होगा?” यहीं से धर्म का पहला पर्दा उठता है।

अध्याय 2 : संवाद की दुनियाजब दो आवाज़ें धर्म पर मिलती हैं:

          शोपेनहावर संवाद के माध्यम से दिखाते हैं कि धर्म पर चर्चा तब सार्थक होती है जब दो मनुष्य ‘सही’ साबित होने के बजाय ‘समझने’ बैठते हैं। एक पक्ष कहता है—“धर्म हमें दिशा देता है।” दूसरा पक्ष पूछता है— “दिशा… या बचपन से थोपे गए रास्ते?” एक मानता है कि धर्म अनुशासन सिखाता है। दूसरा कहता है—“यदि कोई व्यक्ति सिर्फ़ डर से अच्छा बनता है, तो यह अच्छाई नहीं, मजबूरी है।” यह संवाद विवाद नहीं, स्वयं से टकराव है। यही कारण है कि दोनों आवाज़ें एक-दूसरे को नहीं बल्कि धर्म के भीतर छिपे प्रश्नों को चुनौती देती हैं। धर्म के इस द्वैत को समझे बिना आगे बढ़ना असंभव है।

अध्याय 3 : विश्वासअधिकार और नियंत्रण — अदृश्य सत्ता का खेल:

          धर्म अक्सर लोगों को जोड़ता है, लेकिन कई बार सत्ता इसे नियंत्रण के साधन के रूप में प्रयोग करती है। जब किसी आदेश को “ऊपर से आया हुआ” कह दिया जाए, तो लोग बिना पूछे मान लेते हैं— कौन-सा “ऊपर”? किसने निर्णय लिया?  किस तर्क पर? कोई नहीं जानता। उदाहरण— एक शहर में वृद्ध महिला को कहा गया कि वह मंदिर की सीढ़ियां न चढ़े, क्योंकि उसकी उम्र ‘अशुभ’ हो चुकी है। उम्र कैसे अशुभ हो सकती है? लेकिन धर्म के नाम पर यही नियम सत्ता बन जाते हैं। अक्सर लोगों को यह भी सिखा दिया जाता है— सवाल करना पाप है।” यही वह जगह है जहाँ आस्था धीरे-धीरे नियंत्रण में बदल जाती है।

अध्याय 4 : तर्क बनाम अनुष्ठान — प्रश्न पूछना इतना कठिन क्यों?

          धार्मिक समारोहों में यदि कोई युवा पूछ बैठे—“यह अनुष्ठान किस समस्या का समाधान करेगा?” —तो माहौल जम जाता है। क्यों? क्योंकि बहुत-सी रीतियाँ तर्क से नहीं, आदत और भय से चलती हैं। डर और परंपरा मिलकर ऐसे विश्वास पैदा करते हैं जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं। जैसे किसी बीमारी का कारण “देवता का क्रोध” समझकर उपचार को छोड़ देना— तर्क मर जाता है, अंधविश्वास जीत जाता है। यहाँ प्रश्न उठता है— यदि तर्क इतना खतरनाक हैतो क्या धर्म इतना कमजोर हैया फिर तर्क वास्तव में उन परतों को हटाता है जिन्हें सदियों से “पवित्र” कहकर छूने से मना किया गया।

अध्याय 5 :

भयशक्ति और गढ़ी हुई पवित्रता:

धर्म का सबसे खतरनाक रूप तब उभरता है जब “पवित्रता” को भय के हथियार के रूप में प्रयोग किया जाने लगे। जब एक समुदाय में कहा गया—“बीमारी ठीक करने वाली पवित्र राख”—तो लोग चिकित्सक को छोड़कर उसी के पीछे भागे। किसी के ठीक होने पर कहा गया—
“यह चमत्कार है।” किसी के बिगड़ने पर— “भाग्य खराब था।” नतीजतन, भय को भाग्य’ और भक्ति’ का नाम देकर उसे स्थायी कर दिया जाता है।

भय + पवित्रता = आज्ञाकारिता
यही सूत्र सदियों से चलता रहा है।

अध्याय 6 : जब आस्था मुखौटे में बदल जाती है :

          समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो धर्म को नैतिकता नहींबल्कि प्रतिष्ठा का मुखौटा बना लेते हैं।धार्मिक किताबें हाथ में, मीठे शब्द, चंदे के बड़े-बड़े भाषण—और पीछे वही व्यक्ति इसी पैसे से निजी संपत्ति खरीदता है।जब उसके छल का पर्दाफाश हुआ, तो उसने कहा—
“यह ईश्वरीय योजना का हिस्सा था।”और आश्चर्य यह कि लोग फिर भी उस पर विश्वास करते रहे।क्योंकि मुखौटे की चमक इतनी तेज होती है किलोग असली चेहरा देख ही नहीं पाते।

अध्याय 7 : आस्था के पीछे की छिपी हुई मशीनरी:

          धर्म की सतह पर भक्ति दिखाई देती है, परन्तु उसके पीछे एक सामाजिक–मनोवैज्ञानिक मशीनरी चलती रहती है—जिसे आम लोग समझ नहीं पाते। उदाहरण— एक विशाल धार्मिक आयोजन में मंच पर भक्ति का माहौल था, लेकिन पर्दे के पीछे आयोजकों में इस बात पर झगड़ा चल रहा था कि दान का कौन-सा हिस्सा किसके पास जाएगा। यही वह machinery है जो धर्म को सतही रूप में चमकदार रखती है, लेकिन भीतर से उसका असली खेल संचालित करती है।

उपसंहार : धर्मडरनियंत्रण या आत्मबोध?

          धर्म तीन रूपों में उभर सकता है:

1. आत्मा का मार्ग — जब वह करुणा, सत्य और स्वतंत्र विचार को पोषित करे।

2. समाज का अनुशासन — जब वह मात्र नियम और परंपराओं तक सीमित हो जाए।

3. सत्ता का औज़ार — जब भय, आज्ञाकारिता और दिखावे के रूप में इस्तेमाल किया जाए। शोपेनहावर का संदेश स्पष्ट है—धर्म की पवित्रता प्रश्नों से नहीं टूटती। बल्कि प्रश्न ही उसे सत्य के करीब ले जाते हैं। भय पर खड़ी आस्था कभी स्थायी नहीं होती। परन्तु समझ, करुणा और स्वतंत्र चिंतन पर आधारित आस्था मनुष्य को बेहतर बनाती है—स्वयं से भी, संसार से भी। आस्था और तर्क दो शत्रु नहीं, बल्कि मनुष्य-मन के दो पंख हैं। केवल एक पंख से उड़ान संभव नहीं।

Ramswaroop Mantri

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