फ़िल्मकारों, जिनमें पायल कपाड़िया और नंदिता दास जैसी फिल्मकार शामिल थीं, के बयान में कहा गया था कि वह अपनी फिल्मों के जरिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीतते हैं, इसके बावजूद उनकी फिल्मों को प्रदर्शित करने में दिक्कतें आती हैं, एग्ज़िबिटर से लेकर ओटीटी प्लेटफॉर्म भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते या मदद नहीं करते। फिल्मकारों के लिए यह जरूरी हो गया है कि सरकार से सवाल करें। सरकार जब फिल्मों पर सेन्सरशिप का कोड़ा चलाती है तो सवाल करना चाहिए। सरकार जब प्रापगैन्डा फिल्मों को पुरस्कृत करती है तो सवाल करना चाहिए। सरकार जब फिल्म संस्थानों को बर्बाद करती है, सवाल करना चाहिए और मिलकर करना चाहिए। लगातार करना चाहिए।
महेश राजपूत
पिछले दिनों कानू बहल की फिल्म ‘आगरा’ को लेकर इंडी फ़िल्मकारों ने एक साझा बयान जारी किया, जिसमें इंडी फिल्मों के लिए सिनेमाघरों, खासकर मल्टीप्लेक्स चेन और ओटीटी प्लाटफ़ॉर्मों से समुचित समर्थन मांगा गया था। यह बयान कानू बहल की फिल्म को पर्याप्त शो न मिलने और प्राइम स्लॉट न मिलने की सोशल मीडिया में शिकायत के बाद आया था।
फ़िल्मकारों, जिनमें पायल कपाड़िया और नंदिता दास जैसी फिल्मकार शामिल थीं, के बयान में कहा गया था कि वह अपनी फिल्मों के जरिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीतते हैं, इसके बावजूद उनकी फिल्मों को प्रदर्शित करने में दिक्कतें आती हैं, एग्ज़िबिटर से लेकर ओटीटी प्लेटफॉर्म भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते या मदद नहीं करते।
सिनेमा जैसे माध्यम के लिए कला बनाम वाणिज्यिक का द्वन्द्व कोई नया नहीं है। इंडियन एक्स्प्रेस में 2 दिसंबर को “आइडियास पेज” पर “इन आर्ट वर्सेस कॉमर्स, सिनेमा इज़ द लूज़र” शीर्षक से लिखे एक लेख में चेन्नई के फिल्मकार राजेश राजामणि इस मुद्दे को दूसरे नजरिए से उठाते हैं।
वह पी एस विनोथराज का उदाहरण देते हैं, जिनकी फिल्म “पेब्ल्स’ रोटर्डम फिल्मोत्सव में 2018 में टाइगर पुरस्कार जीतने के बावजूद सिनेमाघरों में प्रदर्शित नहीं हो पाई थी और सीधे ओटीटी पर आ गई थी।
हालांकि, उनकी दूसरी फिल्म कोट्टुक्कली, फिल्म में कुछ जाने पहचाने तमिल व मलयालम सितारे होने के कारण, सिनेमाघरों में प्रदर्शित तो हो गई लेकिन तमिल फिल्मोद्योग व दर्शकों ने इसे “प्रयोगात्मक” करार दिया और कइयों ने तर्क दिया कि सिनेमाघरों में इसे प्रदर्शित करना एक गलती थी। दर्शक फिल्म की धीमी गति और खुले अंत के कारण कथित रूप से नाखुश थे।
राजामणि के अनुसार फिल्मकार फिल्म पर इस प्रतिक्रिया से निराश हो गए और अब वह तमिल मार्केट को संतुष्ट करने के लिए फिल्म बनाने पर मजबूर हैं।
राजामणि लिखते हैं कि भारतीय फिल्मोद्योग की यह “नरभक्षी प्रकृति” है जो किसी भी प्रतिभा को अपने बाहर सार्थक रूप से सर्वाइव नहीं करने देती। इसका एकमात्र उपाय पायल कपाड़िया का रास्ता लेना है जहां भारतीय मुख्यधारा से दूर धीरे-धीरे अपनी रचनात्मक और पेशेवर दुनिया खुद बनाई जाए।
यहाँ एक समस्या है। पायल कपाड़िया की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म “ऑल वी इमैजिन ऐज़ लाइट” जो काँस में ग्रांड प्रिक्स जीती थी, को भी यहाँ वैसी थिएट्रिकल रिलीज कहाँ मिल पाई। फिल्म जैसे-तैसे रिलीज हो गई लेकिन ज्यादातर दर्शकों ने इसे ओटीटी पर ही देखा।
एक और चौंकाने वाला उदाहरण काँस समेत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त “होमबाउन्ड” का है। यह फिल्म अकादमी पुरस्कारों के लिए भेजी गई है, फिल्म का निर्माण धर्मा प्रोडक्शंस जैसी बड़ी फिल्म निर्माण कंपनी ने किया है, जो कमर्शियल और मुख्यधारा की फिल्में बनाने के लिए जानी जाती है। इस फिल्म को भी न सही थिएट्रिकल रिलीज मिली और न दर्शक। ओटीटी पर हालांकि (संभवत: वर्ड ऑफ माउथ के कारण) दर्शक मिल रहे हैं।
ओटीटी का भी हाथ इधर तंग ही है और वह भी फिल्में लेने से पहले सिनेमाघरों में उसका “परफॉरमेंस’ (टिकट खिड़की पर व्यवसाय) देखने लगे हैं। आखिरकार, वह भी तो धंधा ही कर रहे हैं और उन्हें भी “प्रॉफिट” ही देखना, सोचना है। इसीलिए, ओटीटी या मल्टीप्लेक्स, जिनकी शुरुआत में ऐसी बातें उछाली गई थीं कि छोटी/इंडिपेंडेंट फिल्मों को सहारा/बढ़ावा मिलेगा, हवाई ही थीं, समय के साथ सिद्ध भी हो रहा है।
नंदिता दास, जो “आगरा” के संदर्भ में जारी बयान पर हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल हैं, की फिल्म “ज्विगैटो” को थिएट्रीकल रिलीज के बाद ओटीटी प्लेटफॉर्म मिलने में महीनों लग गए क्योंकि फिल्म टिकट खिड़की पर अपेक्षित रूप से सफल नहीं रही थी। संक्षेप में, बाजार अपनी शर्तों पर चलता है उसे आपकी अपेक्षाओं, उम्मीदों से उसे कोई लेना-देना नहीं है।
स्पष्ट किया जाए कि यहाँ फ़िल्मकारों को दोष नहीं दिया जा रहा क्योंकि बाजार या बाज़ारीकरण कला का दो तरह से नुकसान करता है, एक दर्शकों का टेस्ट बिगाड़ देता है और दूसरे आम लोगों, कहें तो जनता से इसे काट देता है।
सवाल और मांग बाजार से नहीं, सरकार से होने चाहिए। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) जैसी संस्थाओं, जो कभी उत्कृष्ट समानांतर सिनेमा (हिन्दी हो या क्षेत्रीय) का संबल थी, का हश्र देखिए। भारतीय फिल्म एवं टीवी संस्थान (एफटीआईआई), राष्ट्रीय पुरस्कारों की दुर्दशा देखिए और सिनेमा के क्षेत्र में एक बड़े सरकारी आयोजन, भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव (आईएफएफआई) का हाल देखिए।
आईएफएफआई के हाल में आयोजन पर इंडियन एक्स्प्रेस के एक संपादकीय का लब्बोलुआब है कि यह सेलिब्रिटी तमाशा बंता जा रहा है। संपादकीय में लिखा है कि इस समारोह में जोर सेलिब्रिटी आगंतुकों, पहले से बाजार की ताकत प्राप्त फिल्मों और अधिकारियों व राजनीतिज्ञों के भाषणों पर होता है। इस पैमाने पर आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रम का काम संवेदनाएं ढालना, नई प्रतिभाएं खोजना होना चाहिए।
संपादकीय के अनुसार सेलिब्रिटी का ग्लैमर इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन कम जाने-माने फ़िल्मकारों, स्वतंत्र आवाजों और साहसी प्रोजेक्ट में निवेश करना चाहिए। एक राष्ट्रीय फिल्मोत्सव में मुख्यधारा की, हाशिये की और इन दोनों के बीच की यानि सभी तरह की कहानियों को जगह मिलनी चाहिए।
कुल मिलाकर, फिल्मकारों के लिए यह जरूरी हो गया है कि सरकार से सवाल करें। सरकार जब फिल्मों पर सेन्सरशिप का कोड़ा चलाती है तो सवाल करना चाहिए। सरकार जब प्रापगैन्डा फिल्मों को पुरस्कृत करती है तो सवाल करना चाहिए। सरकार जब फिल्म संस्थानों को बर्बाद करती है, सवाल करना चाहिए और मिलकर करना चाहिए। लगातार करना चाहिए।





