हर सत्ता अपने निर्णय को सुरक्षा के नाम पर जायज़ ठहराती है। इतिहास इसका गवाह है। “आपकी भलाई के लिए”, “आपकी सुरक्षा के लिए”, “आपको बचाने के लिए” यह तीन वाक्य सबसे ज़्यादा इस्तेमाल हुए हैं, और इन्हीं के साथ सबसे ज़्यादा नियंत्रण भी आया है। समस्या यह नहीं कि अपराध रोके जाएँ। समस्या यह है कि ऐसा करते हुए क्या हर नागरिक को संभावित अपराधी मान लिया गया है?यह बहस तकनीक बनाम सरकार की नहीं है। यह मनुष्य बनाम आदत की है। सुविधा बनाम स्वतंत्रता की है। और सबसे बढ़कर, प्रश्न पूछने की क्षमता बनाम चुपचाप स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति की है। शायद अब समय है कि हम फिर से अपने जीवन के कुछ हिस्से ऑफ़लाइन रखें। हर संवाद को डेटा न बनने दें। हर सुविधा को अधिकार न समझें। और अपने फ़ोन को सिर्फ़ टूल बनने दें, मालिक नहीं। क्योंकि जिस दिन स्मार्टफोन के बिना जीना असंभव लगने लगे, उस दिन समझना चाहिए कि समस्या फ़ोन में नहीं, हमारी आदत में है।
मनोज अभिज्ञान
सरकार ने एक ओर ओटीटी कम्युनिकेशन ऐप्स को सिम से बाँधने का निर्देश दिया है और दूसरी ओर मोबाइल फ़ोन निर्माताओं को हर नए फ़ोन में संचार साथी ऐप प्री-इंस्टॉल करने का आदेश। उद्देश्य बताया गया है डिजिटल ठगी, फ़र्ज़ी कॉल और साइबर अपराध पर लगाम लगाना। पर जिस तरीक़े से यह किया जा रहा है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
तकनीक उद्योग के लोग इसे नियामक अतिक्रमण कह रहे हैं। निजता को लेकर चिंता जता रहे हैं। उद्योग से बिना बातचीत, बिना स्पष्टता, आदेश जारी कर दिए गए हैं। क्या यह दूरसंचार मंत्रालय का अधिकार क्षेत्र है या सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का? क्या यह ऐप हटाई जा सकेगी? डेटा कहाँ जाएगा? इन सवालों के जवाब अभी हवा में हैं। लेकिन इन सबके बीच जो सबसे बड़ा प्रश्न है, वह तकनीक का नहीं, बल्कि मनुष्य का है।
हर सत्ता अपने निर्णय को सुरक्षा के नाम पर जायज़ ठहराती है। इतिहास इसका गवाह है। “आपकी भलाई के लिए”, “आपकी सुरक्षा के लिए”, “आपको बचाने के लिए” यह तीन वाक्य सबसे ज़्यादा इस्तेमाल हुए हैं, और इन्हीं के साथ सबसे ज़्यादा नियंत्रण भी आया है। समस्या यह नहीं कि अपराध रोके जाएँ। समस्या यह है कि ऐसा करते हुए क्या हर नागरिक को संभावित अपराधी मान लिया गया है?
जब किसी ऐप को जबरन आपके फ़ोन में डाला जाता है, और किसी प्लेटफॉर्म को मजबूरी में सिम से बाँधा जाता है, तो यह सुविधा का नहीं, निगरानी का संकेत देता है। यह बताता है कि राज्य अब संवाद को भी अपने नियंत्रण में लेना चाहता है। कॉल, मैसेज, अकाउंट, पहचान सब कुछ एक जगह जुड़ता जा रहा है। यह एक तरह की डिजिटल फाइलिंग है। मनुष्य अब सिर्फ़ नागरिक नहीं, बल्कि डेटा-फ़ाइल बनता जा रहा है।
जॉर्ज ऑरवेल ने बिग ब्रदर को भयावह कल्पना की तरह लिखा था। लगा था कि यह अत्याचार की चरम स्थिति होगी, जहाँ कैमरे, माइक्रोफोन और निगरानी हर जगह होगी। आज निगरानी बंदूक से नहीं, सुविधा से आती है। आपको कहा जाता है कि यह आपकी मदद के लिए है। आप ठगे न जाएँ, इसलिए। आप सुरक्षित रहें, इसलिए। और आप सहमत हो जाते हैं। क्योंकि असहमति की कीमत असुविधा है।
धीरे-धीरे यह सामान्य हो जाता है कि फ़ोन बिना सरकारी ऐप के नहीं मिलेगा। अकाउंट बिना नंबर के नहीं चलेगा। बातचीत बिना पहचान के नहीं होगी। और निजता, जो कभी मौलिक अनुभव थी, अब संदिग्ध व्यवहार बनती जा रही है। अगर आप सरकार को दिखाई नहीं देना चाहते, तो आप शक के दायरे में हैं।
स्मार्टफोन कभी सिर्फ एक उपकरण था। आज वह जीवन का विस्तार है। बैंक, पहचान, रिश्ते, तस्वीरें, यादें, काम, मनोरंजन सब कुछ उसी में कैद है। हम दिन की शुरुआत और दिन का अंत उसी स्क्रीन से करते हैं। हमने धीरे-धीरे अपने जीवन की चाबियाँ उसके हवाले कर दी हैं। और अब वही फ़ोन राज्य और पूँजी दोनों के लिए प्रवेश द्वार बन गया है।
जब सरकार कहती है कि फ़ोन में एक विशेष ऐप अनिवार्य होगी, तो वह सिर्फ़ ऐप की बात नहीं कर रही। वह उस डिवाइस पर अधिकार की बात कर रही है, जिसे हम गलती से अपना समझते हैं।
लेकिन क्या हमारा फ़ोन सच में हमारा है?
एक आम तर्क दिया जाता है कि “जिसे करने को कुछ गलत नहीं, उसे डर क्यों?” यह तर्क सुनने में सरल है, पर बेहद खतरनाक। निजता अपराध छिपाने का औज़ार नहीं, बल्कि गरिमा बचाने का अधिकार है। घर का दरवाज़ा इसलिए बंद नहीं किया जाता कि अंदर कुछ गैरकानूनी है। बल्कि इसलिए कि वह अपना निजी स्थान है। उसी तरह संवाद, पहचान और गतिविधियाँ भी निजी हो सकती हैं, भले ही वे पूरी तरह वैध हों।
जब हर बातचीत किसी न किसी डेटाबेस से जुड़ जाती है, तब डर पैदा नहीं होता, आदत पैदा होती है। और सबसे खतरनाक वह समाज होता है, जिसे निगरानी की आदत हो जाती है।
यह भी विचारणीय है कि इतने बड़े फैसले बिना व्यापक सार्वजनिक बहस के लिए क्यों गए? तकनीक से जुड़े ऐसे निर्णय, जो करोड़ों लोगों को प्रभावित करें, उन्हें महज़ कार्यकारी आदेश से लागू करना लोकतांत्रिक भावना के विपरीत लगता है। यदि उद्देश्य सचमुच जनहित होता, तो पहले संवाद होता।
उद्योग से, नागरिक समूहों से, तकनीकी विशेषज्ञों से, और सबसे ज़रूरी, आम लोगों से। लेकिन जब आदेश पहले आते हैं और स्पष्टीकरण बाद में, तो शक होना स्वाभाविक है।
एक समय था जब मनुष्य बिना स्मार्टफोन के जीता था। बिना लोकेशन ट्रैक के, बिना ओटीपी के, बिना हमेशा ऑनलाइन स्थिति के। रिश्ते समय पर कॉल न लगने से नहीं टूटते थे। पहचान नेटवर्क पर नहीं टिकी थी। अब ऐसा लगता है कि स्मार्टफोन ने हमें जितना जोड़ा, उतना ही बाँध भी दिया है।
यहीं हमें फिर से सोचना होगा। क्या हमें हर पल जुड़े रहना है? क्या हमें हर सुविधा स्वीकार करनी है, चाहे उसके बदले हमारी स्वतंत्रता थोड़ी-थोड़ी कटती जाए? शायद अब हमें स्मार्टफोन के बिना जीना सीखना होगा। पूरी तरह नहीं, पर निर्भरता से बाहर निकलकर।
जैसे उपवास शरीर को याद दिलाता है कि वह भोजन से बड़ा है, वैसे ही कभी-कभी तकनीक से दूरी मन को याद दिलाती है कि वह स्क्रीन से बड़ा है। बच्चों के साथ बिना फ़ोन के खेलना। विचारों को नोटबुक में लिखना। रिश्तों को कॉल से नहीं, मुलाकात से जीना। ख़बरें जानने से पहले उन्हें समझना। ये आदर्शवादी बातें नहीं, बल्कि मानसिक स्वराज के छोटे-छोटे प्रयोग हैं। क्योंकि जब तकनीक और सत्ता एक हो जाती हैं, तब व्यक्ति को अपना संतुलन खुद बनाना पड़ता है।
सबसे बड़ा जोखिम यह नहीं कि सरकार ऐप प्री-इंस्टॉल कराए। सबसे बड़ा जोखिम यह है कि समाज इस पर सोचने की ज़हमत भी न करे। अगर हर नया नियंत्रण हमें थका हुआ और उदासीन पाए, तो फिर उसे बढ़ाने में किसी को भी डर नहीं लगेगा। निजता के सवाल धीरे-धीरे हास्यास्पद बना दिए जाते हैं। “इतना कौन सोचता है?” कहकर। लेकिन जो समाज सोचता नहीं, वही समाज सबसे आसानी से सत्ता द्वारा संचालित होता है।
यह बहस तकनीक बनाम सरकार की नहीं है। यह मनुष्य बनाम आदत की है। सुविधा बनाम स्वतंत्रता की है। और सबसे बढ़कर, प्रश्न पूछने की क्षमता बनाम चुपचाप स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति की है। शायद अब समय है कि हम फिर से अपने जीवन के कुछ हिस्से ऑफ़लाइन रखें। हर संवाद को डेटा न बनने दें। हर सुविधा को अधिकार न समझें। और अपने फ़ोन को सिर्फ़ टूल बनने दें, मालिक नहीं। क्योंकि जिस दिन स्मार्टफोन के बिना जीना असंभव लगने लगे, उस दिन समझना चाहिए कि समस्या फ़ोन में नहीं, हमारी आदत में है।





