बचपन में ही राष्ट्र सेवा दलके शाखा तथा शिबीरो मे पन्नालाल भाऊ को देखा था. लेकिन मेरा सही परिचय 1969 मे अमरावती मे कॉलेज की पढ़ाई के लिए पहुचने के बाद कुछ दिनों के भीतर ही एक पोस्ट कार्ड पन्नालाल सुराणा महाराष्ट्र संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सचिव का आया, “कि तुम्हें समय मिले तो अमरावती बसस्टेंड पर इतने – इतने बजे आना.” उसके अनुसार मै पहुँचा, तो वह पहले से ही बेंचपर कोई किताब पढते हूऐ बैठे थे.
और मेरे पहुचने के बाद उन्होंने अपने गोद में रखी हुई ब्रिफकेस को खोल कर एक सिगरेट का पैकेट निकाला, और उसे खोलकर एक सिगारेट खुद के लिए निकालकर पैकेट मेरे तरफ करते हूऐ मुझे भी लेने के लिए आफर किऐ, तो मैने कहा कि “मै सिगरेट नहीं पिता ” तो बोले की संकोच नहीं करना मै भी कभी कभार ही लेता हूँ. तो मैने कहा कि मुझे सिगरेट अच्छि नहीं लगती है. इस लिए मै नही पिता . हालांकि मेरे कॉलेज में काफी दोस्त है जो पिते है. लेकिन मै नही पिता . इस तरह भाऊ जो मुझ से 21 साल सिनियर के साथ मुलाकात की शुरुआत हुई . जो पचपन वर्ष से अधिक समय तक जारी रही. आपातकाल में कई जगहों पर दोनों साथ ही अंडरग्राउंड रहे.तथा कुछ यात्रा भी की है. वह उस समय बहुत ही फॅशनेबल कपडे पहनकर घुमते थे. मैने कहा भी कि आप अपने कपड़ों का शौक आपातकाल में पूरा कर ले रहे हैं. सिर्फ एक मुस्कान भर दे कर चुप रहते थे।
.सेंसरशिप की वजह से कुछ बुलेटीन सायक्लोस्टाइल करने से लेकर बाटना तथा 1942 के जैसे ही 1975 – 76 के आपातकाल के दौरान कुछ तोडफ़ोड़ करना, जो बाद में बडोदा डायनामाइट के नाम से जाना जाता है. को अंजाम देने के लिए मुंबई तथा विदर्भ मे गोपनीय बैठको से लेकर, महाराष्ट्र आंध्र सीमा के माणिकगड परिसर में मराठवाडा से आये विस्थापित मजदूरो के लिए चल रहे आंदोलन में शामिल होने से लेकर, नर्मदा बचाओ आंदोलन,तथा जनता पार्टी का अल्प समय का प्रयोग फसने के बाद फिर से राष्ट्र सेवा दल तक के मेरे वरिष्ठ सहयोगियों मे से एक थे, ‘भाऊ पन्नालाल सुराणा ‘के साथ की खट्टी – मीठी यादों को कल रात को ही उनके मृत्यू की खबर पता चलने के बाद से मेरे मन में उमडघुमड रही है.भाऊ की स्मृति को विनम्र अभिवादन.
सुरेश खैरवार, नागपुर





