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*क्या है वेनेजुएला पर अमेरिकी आक्रमण का मकसद*

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जयप्रकाश नारायण

शांति दूत की खाल ओढ़े हुए साम्राज्यवादी भेड़िया अंततोगत्वा अपने असली रूप में सामने आ गया है। तथाकथित सभ्य पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया की रहनुमाई करने वाला यूएसए खूंखार वित्तीय पूंजी की कोख में पाला पोसा गया भेड़िया ट्रम्प ने एक देश का और शिकार कर लिया। आश्चर्य तो तब होता है जब दुनिया के लगभग 200 राष्ट्र एक आजाद मुल्क की हत्या होते हुए देख रहे हैं। अमेरिका फर्स्ट की उन्मादी नीति को आगे बढ़ते हुए डोनाल्ड ट्रंप के हत्यारे दस्तों ने रात के अंधेरे में वेनेजुएला की राजधानी काराकस पर आक्रमण कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेंस का अपहरण कर लिया और उन्हें खूंखार मुजरिम की तरह जंजीरों से बांध अमेरिका ले जाया गया है।

उन्हें न्यूयार्क के फेडरल कोर्ट में पेश किया गया। जहां उन पर ड्रग टेररिज्म के आरोप में जेल में डाल दिया गया है। अमेरिका अपनी इस कार्रवाई को जायज ठहराने के लिए तीन मुख्य कारण बता रहा है। एक -मादुरो के नेतृत्व में वेनेजुएला नारकोटिक्स की सप्लाई यूएसए में कर रहा है। दो- 2024 के चुनाव में मादुरो ने चुनावी धांधली करके अमेरिकी एजेंट मारिया को हरा दिया था। इसे आधार बना कर मादुरो को तानाशाह कहा जा रहा है। तीसरा आरोप है कि वे मशीन गन जैसे हथियार अपने पास रखते हैं। अपने वर्ग विरोधियों पर ऐसे हास्यास्पद आरोप लगाना अमेरिका की  विश्व रणनीति का पुराना मॉडल है। आइए साम्राज्यवादी यूएसए द्वारा विश्व जनगण के ऊपर किए गए अपराधों पर एक नजर डालते हैं।

ये सभी आरोप उस उद्दंड और हत्यारी सुपर पावर यूएसए के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हैं जिसके गुंडों ने 2021 में ट्रंप के चुनाव हारने के बाद वॉशिंगटन डीसी पर कब्जा कर लिए था। और‌ वे सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं थे। आज वही ट्रंप वैश्विक दरोगा बनने की कोशिश कर रहा है। जिस देश का इतिहास ही आग, खून, मांस, बारूद और गोलियों से लिखा गया है। जिस देश की आधारशिला ही श्वेत यूरोपियनों ने अमेरिकी महाद्वीप के करोड़ों मूलनिवासियों को उनके मूल स्थान से नरसंहारों की अनंत श्रृंखला द्वारा विनाश और विस्थापन पर रखी गई हो।

जिन श्वेत आक्रमणकारियों ने अमेरिकी महाद्वीप के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध के भूभागों पर कब्जा कर लिया हो। वही आज वेनेजुएला के नागरिकों को शांति और लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहे हैं। श्वेत नस्लवादियों द्वारा मूल अमेरिका वासियों के नरसंहार की मिसाल मानव सभ्यता के किसी भी काल खंड में आप को नहीं मिलेगी। आज युद्ध पिपासु अमेरिकी साम्राज्यवाद अपने खूनी इतिहास को नए सिरे से दोहराने की कोशिश कर रहा है। जबकि 21वीं सदी में मानव सभ्यता ने नई छलांग लगा दी है। इसलिए लोकशाही, आजादी, बराबरी और देश की संप्रभुता एकता अखंडता के झंडे तले आगे बढ़ रही मानव सभ्यता के रथ के पहिए को दुनिया का कोई भी क्रूर शासक पीछे नहीं घुमा सकता।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूके की बादशाहत खत्म होने से साम्राज्यवादी विश्व का नेतृत्व अमेरिका के हाथ में आया। इस दौर में दुनिया भाप की ऊर्जा को पीछे छोड़ते हुए पेट्रो केमिकल के युग में प्रवेश कर गई थी। तभी से यूएसए ने पेट्रोलियम भंडारों पर कब्जा बनाए रखने के लिए दुनिया में मानवता के खिलाफ इतने अपराध किए हैं। जिसकी अगर फेहरिस्त बनाई जाए तो हजारों पन्नों की पोथी लिखनी होगी। मोटे आंकड़ों के अनुसार अब तक 57 से ज्यादा देशों में अमेरिका ने बलपूर्वक सत्ता परिवर्तन कराए हैं। चुनी हुई सरकारों को अपदस्थ किया है और उनकी जगह खूंखार सैन्य तानाशाहों या कट्टरपंथी मजहबी ताकतों को सत्ता में बैठाया है।

और विशाल सैन्य शक्ति के बल पर इन अमेरिकी कठपुतलियों की रक्षा करता रहा है। जिसकी कीमत धूर्त व्यापारी की तरह उन देशों के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने का लाइसेंस अपने हाथ में सुरक्षित रखकर वसूलता रहानहै। जो अमेरिकी जनतंत्र के पाखंडी रिकॉर्ड को समझने के लिए काफी है। 

इसकी लैटिन अमेरिका में अनेकों मिसालें हैं। चिली, पनामा, होंडूरास, ग्वाटेमाला, एलसाल्वाडोर, ग्रेनेडा से होते हुए अब यह लुटेरा गिरोह वेनेजुएला में भी वही इतिहास दोहराने जा रहा है। लेकिन अमेरिकी कंपनियों के मुनाफा कूटने की छिपी लिप्सा लिए हुए आधुनिक उद्दंड तानाशाह ट्रंप शायद इतिहास की गति को समझने में अक्षम है। पिछले 70 वर्षों के दौरान अमेजन में न जाने कितने करोड़ क्यूबिक बैरल पानी बह चुका होगा। हम जानते हैं कि इतिहास का हर लुटेरा तानाशाह अपने अंत की कथा खुद अपने हाथों से ही लिखता रहा है। संभवतः वेनेजुएला की पहाड़ियों खदानों खेतों और मैदानों में महान प्रतिरोध का इतिहास लिखा जाने वाला है।

लैटिन अमेरिका के लगभग दो दर्जन देशों के करोड़ों जनगण के दिलों दिमाग पर यूनाइटेड स्टेट द्वारा छोड़े गए दर्द और घाव के निशान अभी भी देखे जा सकते हैं। यही कारण है कि अमेरिका से लेकर पनामा अर्जेंटीना ब्राजील बोलबिया कोलंबिया पेरू उरुग्वे पराग्वे जैसे देशों से लेकर यूरोप एशिया और अफ्रीका में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इस समय धरती वेनेजुएला के पक्ष में लाखों पदचापों की आवाजों से गूंज रही है। कौन नहीं जानता है कि 1973 में चिली में चुनी हुई अलेंदे की वामपंथी सरकार का सैनिक तानाशाह पिनोटे द्वारा तख्ता पलट कराया गया था।

जिसमें राष्ट्रपति अल साल्वाडोर अलेंदे सहित उनके मंत्रिमंडल के अधिकांश मंत्री सांसद और हजारों कम्युनिस्ट कार्यकर्ता मारे गए थे। आल्पस पर्वत माला के प्रत्येक शिला पर अमेरिकी कठपुतली सरकारों की क्रूरता के निशान  आज भी मौजूद हैं। मुनाफा खोर यूएसए के पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित तांबे की दो कम्पनियों का अलेंदे सरकार ने राष्ट्रीकरण करके अपने राष्ट्र की संपदा की रक्षा करने का निर्णय लिया था। इसके साथ ही वामपंथी सरकार ने भूमि सुधारों द्वारा चिली के बुनियादी आर्थिक विकास की दिशा बदलने का प्रयास किया था। उस समय चिली सहित लैटिन अमेरिका के अधिकांश देशों में हजारों एकड़ में फैली हुई अमेरिकी फार्मरों की जागीरें थीं।        

यही  ऐतिहासिक कदम 1999 में राष्ट्रपति बनने के बाद करिश्माई राष्ट्रवादी नेता ह्यूगो शावेज ने उठाये थे। जब उन्होंने वेनेजुएलाई अमेरिकी पेट्रोल कंपनियों का राष्ट्रीय करण कर लिया था। उस समय भी उनका तख्ता पलट कर यूएस की कठपुतली सरकार बनाने की कोशिश हुई थी ।जिसे वेनेजुएला के लाखों लोगों ने अपने साहसिक एकजुटता और जन गोलबंदी द्वारा विफल कर दिया था। राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज की महान उपलब्धियों को आगे बढ़ाने का काम मजदूरों के नेता से राष्ट्रपति बने निकोलस मॉदुरो कर रहे थे।

इसलिए ट्रम्प की तानाशाही मिटाकर लोकतंत्र की स्थापना तथा ड्रग के खिलाफ युद्ध जैसे झूठे नैरेटिव जिसे कॉर्पोरेट पूंजी नियंत्रित वैश्विक प्रचार तंत्र द्वारा विश्व जनगण के दिमाग में बैठने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। जो लैटिन अमेरिकी देशों की जनता के गले नहीं उतरने वाला है। यह सर्वविदित है कि अमेरिकी भीमकाय तेल कंपनियों ने भारी चंदा देकर डोनाल्ड                                                 ट्रंप को इस बार राष्ट्रपति बनने में मदद की थी। इन कम्पनियों का दबाव था कि वेनेजुएला पर आक्रमण करके रिजीम चेंज कराया जाए। जिससे तेल का कारोबार अमेरिकी कम्पनियों के हाथों में पुनः वापस आ सके। 2018 में में भी मादुरो का तख्ता पलट का प्रयास हो चुका है ।लेकिन अमेरिका उसमें कामयाब नहीं हो सका था।

 2023 के चुनाव में विपक्षी नेता मारिया मचादो ने तो खुलेआम अमेरिका से मदद मांगी थी कि वह मादुरो को हराने में उनको मदद करे। उस समय अमेरिका ने मारिया का खुला समर्थन किया था। चुनाव को प्रभावित करने और निकोलस मादुरो को हराने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च किए गए। उस समय मारिया ने एलान किया था कि जीतने के बाद वह अमेरिकी कंपनियों की पुनर्बहाली करेगी। इसलिए जब मारिया मचादो को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। तभी स्पष्ट हो गया था कि अमेरिकी नेतृत्व वाला विश्व साम्राज्यवादी खेमा आगे कौन सा कदम उठाने जा रहा है। इनके लिए वैश्विक  शांति  एकता और लोकतंत्र के दूत वही होते हैं जो साम्राज्यवादी खेमे की चाकरी करने के लिए तैयार हों।

निकोलस मादुरो का प्रारंभिक जीवन काराकस में बस ड्राइवर के रूप में शुरू हुआ था। धीरे-धीरे प्रगतिशील वामपंथी विचारों से जुड़ गए। उनकी सक्रियता को देखते हुए काराकस बस ड्राइवर एसोसिएशन का उन्हें अध्यक्ष चुना गया। संगठन का अध्यक्ष बनने के बाद ट्रेड यूनियन नेता के रूप में संघर्ष करते हुए वे मजदूरों में लोकप्रिय होते गए। उस समय वेनेजुएला में अमेरिकी दखलंदाजी के खिलाफ राष्ट्रवादी आंदोलन उभार पर था। मादुरो मजदूरों की रहनुमाई करते हुए आंदोलनों मैं सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। धीरे-धीरे वे राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित होते गये।जब  वेनेजुएला में ह्यूगो शावेज सत्ता में आए तो मादुरो ने उनका समर्थन किया और उनके साथ मिलकर काम करना शुरू किया। 2002 में अमेरिकी निर्देशन में शावेज का तख्तापलट किया गया।

उस समय मादुरो ने साहस के साथ काराकस के नागरिकों का नेतृत्व किया। जिससे अमेरिका शावेज को काराकस से बाहर नहीं ले जा सका। व्यापक जनगोलबंदी के दबाव में अमेरिका को पीछे हटना पड़ा और शावेज की सत्ता में वापसी हुई। इस संघर्ष में निकोलस मादुरो का व्यक्तित्व  उभरकर सामने आया। वे धीरे-धीरे यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी में महत्वपूर्ण होते गए। 2011 में वे वेनेजुएला के उपराष्ट्रपति बने राष्ट्रपति शावेज के कैंसर से मृत्यु के बाद उन्हें 2013 में वेनेजुएला का राष्ट्रपति बनाया गया। संघर्षशील व्यक्तित्व और प्रखर साम्राज्यवाद विरोधी विचारों के कारण मादुरो ह्यूगो शावेज के स्वाभाविक उत्तराधिकारी बने। तभी से अमेरिकी सरकार उन्हें सत्ता से हटाने में जुटी रही। इसके लिए सीआईए एफबीआई और लैटिन अमेरिका में मौजूद अमेरिकी एजेंट सभी दिन-रात काम कर रहे थे। जिसमें वे 3 जनवरी, 2026 को कामयाब हुए।

प्रारंभ में सम्पूर्ण अमेरिकी महाद्वीप यूरोप के अधीन था। यूके, फ्रांस, पुर्तगाल और स्पेन का अमेरिका के दोनों भागों पर नियंत्रण था। सबसे पहले आज के संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी स्वतंत्रता हासिल की। जिसे अमेरिकी क्रांति कहते हैं। उत्तरी अमेरिका यूरोप से आए हुए प्रवासियों से मिलकर बना है। अपने भौगोलिक और परिस्थितिकी तंत्र के चलते ही अमेरिका धीरे-धीरे संपन्न होता गया और संपूर्ण अमेरिकी महाद्वीप पर यूनाइटेड स्टेट का दबदबा कायम हो गया। इस वर्चस्व को सैद्धांतिकजामा पहनाने के लिए 1823 में राष्ट्रपति मुनरो ने एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया। जिसे मुनरो डॉक्ट्रिन कहते हैं। इसका केंद्रीय नारा था “अमेरिका अमेरिकियों के लिए”। इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका में कई राज्य शामिल किए गए और आज इसे ही संयुक्त राज्य अमेरिका कहा जाता है। जो समय के साथ अमेरिकी महाद्वीप का सबसे ताकतवर देश बनता गया। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी पूंजीवादी दुनिया का नेतृत्व अमेरिका के हाथ में आया। यहीं से उसकी प्रभुत्ववादी महत्वाकांक्षा परवान चढ़ने लगी।

मोटे तौर पर संपूर्ण अमेरिकी महाद्वीप तीन भागों में विभाजित है। पहला- उत्तरी भाग, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको और ग्रीनलैंड सहित चार देश आते हैं।

दूसरा -मध्य अमेरिका, जिसमें बेलीज ग्वाटेमाला निकारागुआ कोस्टारिका  होंडुरास एल साल्वाडोर पनामा सहित सात देश हैं। इसके बगल में कैरैबियन सागर को अटलांटिक महासागर से अलग करता हुआ कैरेबियन द्वीप समूह है। जिसमें क्यूबा ग्रेनाडा जमैका सहित कई छोटे बड़े द्वीप शामिल हैं। इस सम्पूर्ण क्षेत्र को  मध्य अमेरिका कहा जाता है।

तीसरा- लैटिन या दक्षिणी अमेरिकी प्रायद्वीप। इसमें 13 देश हैं, अर्जेंटीना कोलम्बिया उरुग्वे पराग्वे चिली ब्राज़ील पेरु बोलबिया गुयाना इक्वाडोर वेनेजुएला सुरीनाम टोबैको और त्रिनीनाद।  

दो आश्रित क्षेत्र- 1 -फाकलैंड द्वीप और 2-दक्षिण जार्जिया और दक्षिण सैंडविच। एक अंतरिक्ष आरक्षित क्षेत्र है, जिसे फ्रेंच गुयाना कहते हैं।

मध्य और दक्षिण अमेरिका के अधिकांश देश फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल के उपनिवेश थे। 20वीं सदी के मध्य में उठे राष्ट्रवादी स्वतंत्रता आंदोलन के दबाव पर इन देशों को दक्षिणी अमेरिका छोड़ना पड़ा। चूंकि मध्य और दक्षिणी अमेरिका यूरोप के उपनिवेश थे। इसलिए भाषाओं के आधार पर भी क्षेत्रों को विभाजित किया जाता है। लैटिन, स्पेनी और पुर्तगाली भाषी क्षेत्र हैं। उत्तरी अमेरिका में अंग्रेजी बोली जाती है, जिसे अमेरिकन इंग्लिश कहते हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका अट्ठारहवीं सदी में आजादी हासिल करने के बाद से लैटिन अमेरिका को अपना संरक्षित क्षेत्र मानता है। 1823 में राष्ट्रपति मुनरो द्वारा प्रतिपादित मुनरो सिद्धांत इसी उद्देश्य को हासिल करने का साम्राज्यवादी हथियार है। इसलिए यूएसए मध्य और दक्षिण अमेरिकी देशों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाता रहा है। लैटिन अमेरिका में उठे राष्ट्रवादी आंदोलन ने यूरोप को लैटिन अमेरिका से हटने के लिए मजबूर किया। इस खाली जगह को तेजी से यूएसए ने सैन्य आर्थिक शक्ति द्वारा भरने का प्रयास किया। इसके लिए वह मध्य और दक्षिण अमेरिकी देशों में सीधे सैन्य हस्तक्षेप द्वारा सरकारें गिराने बनाने लगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लैट्रिन अमेरिका में यूएसए के अपराधों की संक्षिप्त सूची नीचे है।

1954 में ग्वाटेमाला में राष्ट्रपति बैंजो गुजरमेन का तख्ता पलट अमेरिकी कंपनी यूनाइटेड फ्रूट के दबाव में किया गया।

दूसरा -बोलिविया में राष्ट्रपति जुवान जोश रोड्स का1971 में तख्ता पलट हुआ।

तीसरा -चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे की चुनी हुई सरकार 1973 में सैनिक जुंता द्वारा अपदस्थ किया गया।

चार- पनामा के राष्ट्रपति का1989 अपहरण किया गया। आरोप नारकोटिक्स।

पांच- ग्रेनाडा की मार्क्सवादी सरकार को 1983‌ में गिराया गया। राष्ट्रपति का अपहरण किया गया।

छह-2002 बोलविया में राष्ट्रपति शावेज का तख्ता पलटने की कोशिश और अब 3 जनवरी 2026 राष्ट्रपति मादुरो का अपहरण। आरोप वही पुराना। नारकोटिक्स का कारोबार।

25 अक्टूबर 2022 कोबरा नाडा में मार्क्सवादी सरकार का तख्ता पलट किया गया। 

विरोधी सरकारों के तख्ता पलट द्वारा यूएसए लैटिन अमेरिका को उपनिवेश बनाए रखना चाहता है। क्योंकि लैटिन अमेरिका में खनिज संपदा जैसे तेल प्राकृतिक गैस आयरन सोना चांदी तांबा ग्रेफाइट एल्यूमीनियम मीठे पानी रेयर अर्थ आदि से भरा हुआ है। इसलिए यूएसए यहां नियंत्रण बनाए रखने के लिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून नियम का पालन नहीं करता। खुलेआम लैटिन अमेरिकी देशों के चुनाव में हस्तक्षेप करता है। बलपूर्वक सरकारों को गिराने बनाने का खेल खेलता रहता है।इसलिए राजनीतिक शब्दावली में “नव उपनिवेशवाद” या “न्यू कॉलोनिज्म” कहा गया है। सच्चाई यही है कि दक्षिणी अमेरिका यूएसए का उपनिवेश है।

उदारीकरण के बाद पश्चिमी पूंजीवादी दुनिया के नियंत्रण से बाहर के  विकासशील देशों में तेजी से आर्थिक प्रगति हुई है। मैन्युफैक्चरिंग से लेकर मानव संपदा तक का बड़े पैमाने पर विकास हुआ है। जिस कारण से वैश्विक जीडीपी में अमेरिकी हिस्सेदारी लगातार घट रही है। साथ ही तीसरी दुनिया के विकासशील देश ब्रिक्स के नाम पर इकट्ठा हो रहे हैं जिसमें दक्षिण अमेरिकी देशों जैसे ब्राज़ील वेनेजुएला आदि की अच्छी खासी भूमिका है। जिससे उस के हुक्मरान और मल्टीनेशनल कंपनी को चुनौती मिल रही है।

20वीं सदी के मध्य लैटिन अमेरिका में उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष शुरू हुआ। जिसके नायक 19वीं सदी के वेनेजुएलाई नेता सीमोन बोलीवर और जोंडी‌ सैन मार्टिन बने। जिनके नेतृत्व में चिली पेरू अर्जेंटिना बोलबिया आदि में उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष चला था। 20वीं सदी के मध्य में लैटिन अमेरिका में कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आंदोलन फैल गया। चारों तरफ क्रांति की लहरें उठने लगीं। औपनिवेशिक देशों के पीछे हटने के बाद आजाद हुए देशों पर यूएसए साम्राज्यवादियों ने कब्जा कर लिया था।

इसलिए यह लहरें सीधे अमेरिकी साम्राज्यवाद से टकराने लगीं। इसके नायक फीडेल कास्त्रो और अर्नेस्टो चेग्वारा थे। महान मार्क्सवादी क्रांतिकारियों के नेतृत्व में क्यूबा में क्रांति विजयी हुई। साम्राज्यवादी अमेरिका इसे कैसे बर्दाश्त कर सकता था। तभी से वह लैटिन अमेरिका में मार्क्सवादी सरकारों और आंदोलन के खिलाफ युद्ध छेड़े हुए है। क्यूबा की क्रांति को असफल करने के लिए यूएसए ने हजारों षड्यंत्र रचे लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके। 

मार्क्सवादियों के साथ-साथ राष्ट्रवादी ताकतों के खिलाफ यूएसए के नेतृत्व में पश्चिमी देश सक्रिय हैं। सिर्फ लेटिन अमेरिका में ही यूएसए के अपराधों की संक्षिप्त कहानी ऊपर लिखी जा चुकी है।

बीसवीं सदी के मध्य में से लेकर 1990 तक लैटिन अमेरिका में वामपंथी क्रांति की लहरें उठती रही हैं। लेकिन उन्हें दबाने में यूएसए कामयाब रहा। 

ऐसे समय में वेनेजुएला में 1999 में ह्यूगो शावेज के नेतृत्व में बोलीवेरियन क्रांति शुरू हुई। जिसने संयुक्त राज्य अमेरिका को कड़ी चुनौती दी।

लैटिन अमेरिका में नव उपनिवेशवाद के खिलाफ कई तरह के आंदोलन चलते रहे हैं। जिसमें 2001 में शुरू हुआ वर्ल्ड सोशल फोरम का अभियान ज्यादा चर्चित रहा है। जो एलपीजी के खिलाफ था। जहां-जहां विश्व इकोनॉमिक फोरम का सम्मेलन आयोजित होता है। वही वर्ल्ड सोशल फोरम के आवाहन कर तरह तरह संगठन एनजीओ पर्यावरण वादी तथा सामाजिक कार्यकर्ता हजारों लोग इकट्ठा होते हैं ।और विश्व इकोनामिक फोरम के समानांतर आयोजन करते हैं। इसका नारा है “एक नई दुनिया संभव है। इस आंदोलन की शुरुआत 2001 में‌ ब्राजील से हुई। इसका मुख्यालय भी ब्राजील में ही है। लूला डी सिल्वा के ब्राजील का राष्ट्रपति बनने के बाद एक नई आर्थिक नीति के नए तरह का माहौल लैटिन अमेरिका में बना था ।जिसकी स्वाभाविक परिणति इस आंदोलन के रूप में दिखाई दी।”लेकिन यह एक बुलबुला ही साबित हुआ। 

सैमुअल बोलिवर के उपनिवेशवाद विरोधी ,आंदोलन से प्रेरणा लेकर शावेज़ के नेतृत्व में शुरू हुई वेनेजुएलाई क्रांति को अमेरिका की सैन्य कार्रवाई से भारी धक्का लगा है। राष्ट्रपति मादुरो अमेरिकी हिरासत में हैं। उनके ऊपर अमेरिकी कानून के तहत मुकदमा चलाया जाएगा। हो सकता है सद्दाम हुसैन, कर्नल गद्दाफी और अन्य साम्राज्यवाद विरोधी नेताओं की तरह अमेरिका मादुरो को भी खत्म करने में कामयाब हो जाए। लेकिन यूएसए द्वारा वेनेजुएला की संप्रभुता पर किए गए हमले के खिलाफ लैटिन अमेरिका में यूएसए और ट्रंप विरोधी तूफान उठ खड़ा हुआ है ।वह शांत नहीं होने जा रहा है ।

लैटिन अमेरिका में उपनिवेशवाद विरोधी  संघर्षों की महान परंपरा है । इस समय वेनेजुएला पेरु कोलंबिया ब्राज़ील सहित दक्षिण अमेरिका के अनेक देशों में साम्राज्यवाद विरोधी और आजाद सम्प्रभु राष्ट्र की आकांक्षा लिए लाखों लोग सड़कों पर हैं। लगता है एक बार फिर लैटिन अमेरिका क्रांतिकारी युद्ध के रास्ते पर आगे बढ़ गया है। महान क्रांतिकारी अर्नेस्टो चेग्वारा की क्रांति कारी परंपरा फिर लैटिन अमेरिका के पहाड़ों जंगलों खदानों में नई ताकत के साथ जी उठी है।  

निकोलस मादुरो की जगह राष्ट्रपति की शपथ लेने वाली डेल्सी रोडी़्गेज ने कहा कि निकोलस मादुरो ही वेनेजुएला के वैधानिक राष्ट्रपति हैं और रहेंगे। उन्होंने बोलवेरियाई क्रांति का हवाला देते हुए कहा की क्रांति अमर है ।उसे दुनिया की कोई ताकत पीछे नहीं धकेल सकती। “वेनेजुएला की जनता अपने देश की स्वतंत्रता संप्रभुता एकता अखंडता और राष्ट्र के आत्मसम्मान की रक्षा करने में सक्षम है। इसे अमेरिकी  साम्राज्यवादी” जो लेटिन अमेरिकी जनता के स्वतंत्रता समानता आजादी और संप्रभुता के दुश्मन हैं। “जितना जल्दी समझ लेंगे उतना ही अच्छा होगा। पूरी दुनिया के लोकतांत्रिक साम्राज्यवाद विरोधी जन गण और राष्ट्र वेनेजुएला के साथ खड़े हैं। अमेरिका के इस अपराध की सजा निश्चय ही मिलेगी। ऐसा वेनेजुएला कीजनता का दृढ़ संकल्प है।”

Ramswaroop Mantri

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