अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

भारत का एआई सम्मेलन और कल्ट, झूठ, भगदड़ और चोरी के किस्सों के शर्मनाक उदाहरण

Share

अंजनी कुमार

जितनी भव्य तैयारी का दावा किया गया उतने ही भगदड़ के किस्से मीडिया में खबर बनकर आये। जितनी ही चाक-चैबंद तैयारी की बात की गई चोरी जैसी खबर सामने आई। जितने ही भारत की तकनीक की तैयारी और आगे छलांग लगा लेने के दावे किये गये उसके साथ ही झूठ के किस्सों के शर्मनाक उदाहरण सामने आए। जितने मेहमानों को बुलाया गया और उनकी खातिरदारी की तैयारी की गई उन सभी पर एक नेता कल्ट बनकर भारी बन गया।

यह सबकुछ भारत के उस सम्मेलन में हुआ जो दुनिया की सबसे अधिक उन्नत तकनीक को आगे ले जाने के उद्देश्य से बुलाया गया था।

सम्मेलन के पहले ही दिन बदइंतजामी की वे खबरें सामने आईं जो सीधे तकनीक से जुड़ी हुई थीं। मसलन, नेटवर्क की उपलब्धता, भुगतान, सम्मेलन स्थल पर पहुंचने-प्रवेश करने की प्रक्रिया आदि। ये सभी वे तकनीकी मसले हैं जो एआई की आरम्भिक तकनीक पर आधारित हैं। रही सही कसर उस समय बिगड़ती दिखी जब प्रधानमंत्री मोदी सम्मेलन का उद्घाटन करने पहुंचे। इस दौरान हाॅल खाली कराया गया जिसमें एक स्टाॅल से सामान चोरी हो जाने का मामला सामने आया।

इसके अलावा वहां जो भगदड़ की स्थिति बनी रही, वह अलग ही कहानी है जो मीडिया की खबरों में खूब लिखा गया गया है।

इन्हीं खबरों में एक खबर वह भी आई जब गलगोटिया विश्वविद्यालय ने चीन के एक रोबोट को अपनी खोज बताकर पेश किया। अब इस बात से मुकर रहा है। इसे खबर बनाकर न सिर्फ प्रसारित कर दिया गया, इसे मीडिया में पोस्ट भी किया गया। चीन ने जब इस दावे पर सवाल उठाया तब यह झूठ भारत के लिए एक राष्ट्रीय शर्म में बदल गया।

दुनिया तकनीकी विकास की होड़ में उस ओर बढ़ रही है जिसमें तकनीकी विकास की गति तीव्र से तीव्रतर होती दिख रही है। तकनीक और इंसान के बीच के रिश्तों पर चलने वाले अंतहीन बहस में एक बात साफ है कि इसमें राज्य एक निर्णायक भूमिका निभाता है। राज्य कुछ और नहीं, एक प्रभुत्वशाली वर्ग की एक संस्था है। इसकी सारी प्रभुसत्ता इस पर काबिज वर्ग के पास है। जितनी विकसित तकनीक है उतनी ही प्रभुत्वशाली यह संस्था है जिसे प्रभुत्वशाली वर्ग आगे की ओर ठेलकर ले जाना चाहता है।

आधुनिक दौर में तकनीक का अर्थ पूंजी है जिसमें इस पर काम करने वाला इंसान इसका अनिवार्य और चालक हिस्सा होता है।

भारत में राज्य है और इसे चलाने वाला एक प्रभुत्वशाली वर्ग है, लेकिन इसके पास तकनीक नहीं है। जो है वह बहुत पिछड़ी हुई है। 1960-70 के दशक में यहां की तकनीक में एक विकास होते हुए देखा जा रहा था और खेती में सुधार की उम्मीद की जा रही थी। ऐसे में यहां की अर्थव्यवस्था और राज्य को एक विकासशील राज्य अर्थव्यवस्था की तरह देखा गया। इस प्रक्रिया में 1980 के दशक में एक आर्थिक उछाल की बात की गई और विकसित भारत की अवधारणा को ‘इक्कीसवीं सदी का भारत’ की तरह पेश किया गया।

पिछले 40 साल से भारत इक्कसवीं सदी में प्रवेश करने का दावा कर रहा है। इसकी शुरूआत राजीव गांधी ने की थी। लेकिन, आज भी हालात नहीं बदले। तकनीक के मामलों में भारत दुनिया के सबसे पिछड़े देशों की कतार में जाकर खड़ा हो गया है। भारत ने तकनीक के दिशा में पहला कदम रखने के साथ ही राम मंदिर का शिलन्यास किया था और टेलीविजन के प्रसारण के साथ ही रामायण और महाभारत का प्रसारण किया था।

विकासशील दुनिया में भारत दुनिया के उन देशों में से एक रहा हैं जहां कंप्युटर और टेलीविजन को सबसे पहले प्रयोग में लाया गया। इस सबकी कुल जमा हमारी उपलब्धि क्या रही? हमारे इंजीनियरिंग स्कूल और तकनीकी शिक्षण संस्थान, बड़ी कंपनियां साॅफ्टवेयर बनाने तक पहुंची और सेवा क्षेत्र का विस्तार किया। इस दौरान काॅल सेंटर की भरमार हो गई। इसके बाद सारा कुछ ठप्प पड़ गया। भारत में तकनीकी विकास ने उपयोगिता की इसी सीमा पर आकर आगे जाने से मानो मना कर दिया।

ऐसा नहीं है कि यह कहानी सिर्फ यहीं तक सीमित है। यह भारत के हरेक क्षेत्र की कहानी है जहां आयातित नई तकनीक पुरानी तकनीक को हटाकर काम करती है और यह अमूमन पुरानी कंपनी की जगह पर नये के आगमन के साथ होता है। दुनिया में नई तकनीक के सर्वाधिक उपभोग में मोबाईल का प्रयोग सबसे ऊपर है। इस क्षेत्र में भारत एक एसेम्बली लाइन से अधिक की भूमिका नहीं निभाता। यह भी इतने बड़े पैमाने पर नहीं है, जितना दक्षिण एशियाई देश करते हैं।

कारण, यहां का श्रम तो सस्ता है लेकिन कुशलता कम है। हमारे देश के आर्थिक विकास की कहानी को तकनीकी विकास के साथ जोड़ दिया जाए तब यह कुछ पन्नों में सिमट जाने को मजबूर होगा। हमारे देश की पंचवर्षीय योजनाओं का इतिहास लाखों पेज में फैला हुआ दिखेगा, लेकिन उसकी जमीनी हकीकत जितनी भयावह है उसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। पूंजी जो तकनीक और श्रम का सम्मिलित रूप है, भारत में विकसित होते हुए नहीं दिखती।

पूंजी को विकसित होने के लिए उसे अतिरिक्त पूंजी की उगाही की जो जरूरत है उसमें कृषि से उगाही सूदखोरी से अधिक दिखती है। भारत का श्रमिक और किसान दोनों ही भारत के राजनीतिक अर्थशास्त्र में तबाह दिखते हैं जबकि भारत का प्रभुत्वशाली वर्ग, जिसमें भारत का राज्य भी शामिल है, धनी होते हुए दिखता है। इसे हम आज के भारत के बजट में देख सकते हैं। एक तरफ भारत ट्रिलियन डाॅलर की बात कर रहा है और दूसरी ओर देश के 80 करोड़ लोगों को अनाज बांटने की जरूरत भी दिख रही है।

अडानी और अंबानी तो माॅडल हैं ही, भाजपा का कोष भी एक उदाहरण है। देश के राजनेताओं के पास जिस तेजी से पैसा जमा हो रहा है, वह आर्थिक समीकरणों के हिसाब से भी असामान्य संचयन है और इसमें भ्रष्टाचार की भूमिका को नकार पाना मुश्किल है। कथावाचकों को हम अचानक ही धनी होते हुए देख रहे हैं। बाबाओं का तो कहना ही क्या? वहां तो अब सैन्यअधिकारी और न्यायधीश सिर नवाने पहुंच रहे हैं। उनकी संपदा ‘गाॅड मार्केट’ का एक उदाहरण है जिस ओर कम ध्यान दिया गया है।

आयुर्वेद की दवा बेचकर एक विशाल कारोबार का माॅडल इसी इक्कसवीं सदी में दिखा है जो पसरते हुए अब रीयल स्टेट में चला गया है। कोचिंग नये शिक्षण संस्थान बन चुके हैं जिनका कारोबार शिक्षा क्षेत्र से निकलकर अब अन्य क्षेत्र की ओर बढ़ता दिख रहा है।
उपरोक्त माॅडल भारत के हर राज्य की अर्थव्यवस्था में उभरा। मनमोहन सिंह की सरकार के समय में इसे बल मिला। लेकिन, जिस तरह की निरन्तरता और सहयोग मोदी काल में मिला है, वह अलग से दिखता है।

मोदी ने केंद्र की सत्ता में आने के पहले जिस गुजरात माॅडल को पेश किया था उस माॅडल में सबसे पहले संगठित धार्मिक हिंसा और अंतहीन नफरतों को लाया गया। इसके बाद उन्होंने आर्थिक माॅडल पेश किया। केंद्र में आने के बाद जिस माॅडल को पेश किया गया उसमें ये दोनों मिल गये। उनके लंबे शासन काल का जो कुल जमा परिणाम आज हमारे सामने है उसमें धर्म का कारोबार सबसे तेजी से विकसित हो रहा है।

आज देश में जितनी तेजी से धार्मिक संस्थानों का विकास हुआ है और इससे जुड़ी नफरतों और हिंसा का विस्तार हुआ, उतना किसी अन्य क्षेत्र में नहीं हुआ है। इस दौरान धर्मोइकाॅनामिक्स की बात की जाने लगी और इस आधार पर एक नये नेशन बिल्डिंग का जुमला भी सीमित घेरे में उछाला गया। खुद मोदी धार्मिक पूजापाठ में अगुवा की तरह हिस्सेदारी करते हुए धर्म की आस्था को उस हद तक ले  गये जहां वह खुद के अशरीरी होने की बात करने लग गये।

विकास की इस दिशा में तकनीकी विकास कहीं पीछे छूट गया। भारत की तकनीकी विकास के नाम पर धार्मिक चमत्कारों की कहानियां रस लेकर सुनाई गईं और लोगों ने सुना और तालियां भी बजाईं।धर्म तभी तक धर्म है जब तक उसमें चमत्कार है। एक गरीब, असहाय आदमी जब धर्म में सिर झुकाता है तब उसे उसी चमत्कार की उम्मीद होती है जो उसे उसकी हालत से बाहर लेकर चला जाए या कम से कम अपने हालात को सह लेने की क्षमता आ जाए।

भारत में धर्म सिर्फ इसी रूप में नहीं है। यहां सिर्फ धर्म के चमत्कार की कहानियां ही नहीं हैं, इसमें वह राजनीति भी है जो राज्य को हिंसक बनाने और राजनेता को पूजने की क्षमता भी प्रदान करती है। यह एक मकड़ी की तरह जाले को बुनती है जिसमें उसका शिकार फंस जाए। धर्म अतीत की उन कहानियों को सुनाता है जिसमें तकनीकी विकास के चमत्कार थे। धर्म अतीतग्रस्तता के उस नशे की ओर ले जाता है जिससे वर्तमान की तकलीफें बीत जाएं।

धर्म की कथा जैसे ही समाप्त होती है कथा में उल्लेखित तकनीक भी वहीं थम जाती हैं। लेकिन, यही वह क्षण है जब इस कहानी के अंत में एक राजनेता सामने आता है और अतीत की कहानियों के सारे सुख को वर्तमान बना देने का वादा करता है। धर्म, झूठ, तकनीक और सपनों की एक दुनिया देने का वायदा करने वाला राजनेता खुद को इन सभी के एक साकार अवतरण की तरह पेश करता है।

प्रभुत्वशाली वर्ग इस दिशा में दिनरात काम करता है। उसे भगवान बताने में लग जाता है। सिर्फ उसके नाम का जाप ही नहीं होता, उसके चलने की अदा को संगीत से सजा दिया जाता है।

अपने देश में यही सबकुछ हो रहा है। यह सबकुछ रिसते हुए नीचे आ रहा है। आप इस सब से क्या उम्मीद कर सकते हैं? दुनिया की सबसे उन्नत तकनीक पर होने वाले सम्मेलन में भगदड़, वहां बोला गया झूठ, तकनीकी विकास के दावे आदि जितने भी शर्मनाक लगें, लेकिन यह हमारे देश की राजनीतिक-अर्थशास्त्र की ठोस सच्चाई है। इससे अधिक की हम उम्मीद नहीं कर सकते।

युवाल नोआ हरारी की एक पुस्तक है ‘होमो डेयस’। यह पुस्तक भावी मनुष्य की अवधारणा पर बात करती है। वह विशाल तकनीकी विकास और एआई और जैवप्रौद्योगिकी के संदर्भ में मनुष्य की नई अवधारणा होमो डेयस तक पहुंचते हैं। इसके बरक्स वह दुनिया की उन चुनौतियों को लेकर चिंतित हैं जिसमें इंसानों का विशाल समुदाय इंसान होने की मूल जरूरतों से जूझ रहा है और उन तबाहियों से वह फिक्रमंद हैं जो कभी भी हम पर आ गिरेंगी, जिसमें युद्ध भी एक पक्ष है।

वह अन्य विपदाओं के बारे में भी बात करते हैं। इस पुस्तक के संदर्भ में हमारे देश में ‘होमो डेयस’ की अवधारणा एक त्रासद कथा की तरह है। हमारे देश में पूंजी, तकनीक और राज्य पर काबिज प्रभुत्वशाली वर्ग फिलहाल धर्म के चमत्कार पर उम्मीद बांधे बैठा है। वह धर्म का डमरू बजाकर देश के आम जन, मेहनतकश समुदाय की मेहनत को खा जाने के लिए तैयार है। ऐसे में यह भले ही दुनिया की सबसे उन्नत तकनीक पर सम्मेलन का मंच सजा ले, करेगा तो वही जिसकी उसे जरूरत है।

उसकी सारी नैतिकता इसी दिशा पर निर्भर है। हम भी तो इसे सिर्फ एक नजारे की तरह देख रहे हैं जबकि हमारा सारा भविष्य, जो निश्चित ही गहरे अंधेरों से भरा हुआ है, इन सम्मेलनों की ठोस हकीकतों में साफ दिख रहा है।

(अंजनी कुमार टिप्पणीकार और एक्टिविस्ट हैं।)

Ramswaroop Mantri

Add comment

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें