लेखक -जंग हिन्दुस्तानी
भोर 4 बजे हमारी ट्रेन मिर्जापुर स्टेशन पहुंची थी। बाहर अभी गहरा अंधियाला छाया हुआ था। हम चाहते थे कि अभी हमारे पास काफी समय है और जब मिर्जापुर आ ही गए हैं तो यहां से विंध्याचल जाकर माता विंध्यवासिनी देवी मंदिर जाकर दर्शन ही कर लें। गूगल मैप स्टेशन से मंदिर तक 8 किलोमीटर की दूरी बता रहा था। बाहर निकलने पर देखा कि कोई ऑटो मिल जाए लेकिन कोई भी ऑटो दिखाई नहीं पड़ा। एक नौजवान रिक्शा वाला खड़ा था। मैंने उसे विंध्याचल मंदिर चलने के बारे में पूछा तो उसने कहा कि साहब, चलो हम आपको मंदिर घुमा लाते हैं जो आपको उचित लगेगा वह किराया दे देना।
हम रिक्शे पर बैठ गए और मिर्जापुर की तंग गलियों से होकर मुख्य मार्ग पर आ गए। समय काटने के लिए हमने बातचीत शुरू कि तो पता चला कि रिक्शा चालक आदिवासी परिवार से है । मेरे द्वारा उसके रिक्शा चलाने के कारणों बारे में पूछने उसने अपने जीवन के बारे में जो बताया वह मैं कभी नहीं भूल सकता।
साहब, मेरा नाम सिया लाल कोल है। यहां से 40 किलोमीटर दूर विंध्याचल की पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में बसा हमारा सोनपुरा गांव कोई साधारण गांव नहीं था। वह सदियों से प्रकृति और मनुष्य के बीच के उस अटूट रिश्ते का गवाह था, जिसे आधुनिक सभ्यता अक्सर भूल चुकी है। गाँव के उत्तर में खड़ी ‘काली देवी पहाड़ी’ केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि हम ग्रामीणों के लिए एक जीवित देवी थी। उस पहाड़ी की ढलानों पर उगने वाले महुए के फूलों की गंध हवाओं में तैरती थी, और झरनों का संगीत हम आदिवासियो में घुला था।
परंतु, विनाश की पटकथा शहर के बंद कमरों में, एयर-कंडीशन्ड दफ्तरों के भीतर बहुत पहले ही लिखी जा चुकी थी।
आज से 7 साल पहले एक मनहूस सोमवार की भोर, जब पक्षियों का कलरव अभी शुरू ही हुआ था, सोनपुरा गांव की शांति भारी मशीनों की गड़गड़ाहट से भंग हो गई। हम गांव वालों ने देखा कि दर्जनों पोकलैंड मशीनें और डंपर ‘काली देवी पहाड़ी’ को घेर चुके थे।
यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि एक पूंजीपति खनन विभाग और वन विभाग का एक गहरा गठजोड़ था। तीन बड़े खलनायक हमारी जिंदगी को घेर कर खड़े थे।
पहला पूंजीपति महेश बाबू जिसने विकास के नाम पर ग्रेनाइट की इस खदान को सोने की खान समझ लिया था।
दूसरा खनन विभाग, जिसने बिना किसी जमीनी सर्वे के, कागजों पर इस उपजाऊ और पूजनीय भूमि को ‘बंजर’ घोषित कर दिया।
तीसरा वन विभाग,जिसकी जिम्मेदारी जंगलों की रक्षा करना था, लेकिन उनके आला अधिकारियों ने भारी रिश्वत के बदले “नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट” पर हस्ताक्षर कर दिए थे।
हमारे दादा रामदीन, जिनके चेहरे की झुर्रियां विंध्य के रास्तों जैसी गहरी थीं, अपनी लाठी लेकर हुए पहाड़ी की ओर दौड़े। पीछे-पीछे पूरा गांव उमड़ पड़ा। वहां वन विभाग के रेंजर और पुलिस बल के साथ एक मूंछों वाला ठेकेदार खड़ा था।
“साहब, यह हमारी माई है! इसे मत तोड़ो, यहाँ हमारे पुरखों की रूह बसती है,” दादा रामदीन गिड़गिड़ाए।
रेंजर ने कड़े स्वर में कहा, “रामदीन, कानून से ऊपर कोई रूह नहीं होती। यह जमीन अब सरकार की है और खनन का पट्टा सेठजी के पास। तुम लोग अवैध तरीके से यहाँ बसे हो, खाली करो इसे।”
जब आदिवासियों ने पहाड़ी के सामने मानव श्रृंखला बनाई, तो ‘विकास’ का असली चेहरा सामने आया। ठेकेदार के गुंडों ने, जो वर्दीधारियों की आड़ में खड़े थे, लाठियों और लोहे की रॉड से हमला कर दिया। चीख-पुकार मच गई। हमारी पत्नी वेफई देवी,जो अपनी छोटी बच्ची को पीठ पर बांधे विरोध कर रही थी, उसे बेरहमी से घसीटा गया। विरोध के सुरों को खून से चुप कराने की कोशिश की गई।
सूर्यास्त तक, जिसे पहाड़ी ने हजारों साल से ओझल होने से बचाया था, वह पहाड़ी अब क्षत-विक्षत हो चुकी थी। डायनामाइट के धमाकों ने विंध्य की छाती चीर दी। धूल का ऐसा गुबार उठा कि गांव की सांसें भारी हो गईं।
उसी रात, प्रशासन की मदद से हम आदिवासियों की झोपड़ियों पर बुलडोजर चला दिए गए। उनके अनाज के बर्तनों को फेंक दिया गया और पीढ़ियों से संजोए गए पट्टों को ‘फर्जी’ बताकर फाड़ दिया गया। अपनी ही जमीन पर हम शरणार्थी बन गए। वन विभाग ने उन रास्तों पर गडढे खोद दिए जहाँ से हम कभी लकड़ी और फल लाते थे।
आज सोनपुरा के उत्तर में हमारी वह गरिमामय पहाड़ी नहीं है। वहाँ बस एक विशाल, काला गड्ढा है—मानवीय लालच का एक गहरा घाव। हवा अब महुए की खुशबू नहीं, बल्कि क्रशर की बारीक और जानलेवा धूल ढोती है।
हमारे गांव से विस्थापित हुए कोल आदिवासी अब मिर्जापुर और सोनभद्र के चौराहों पर दिहाड़ी मजदूरी के लिए खड़े होते हैं। लेकिन हमारे दादा रामदीन की आंखों में अभी भी एक चमक बाकी थी। वे अक्सर अपनी सूजी हुई आंखों से उस खाली मैदान को देखते थे और कहते थे “उन्होंने पहाड़ गिराया है, हमारा हौसला नहीं। जंगल की जड़ें ज़मीन के बहुत नीचे होती हैं, वे फिर पनपेंगी।”
सोनपुरा का संघर्ष अब केवल जमीन की लड़ाई नहीं रह गया था, वह वजूद की जंग बन चुका था। जब सरकारी तंत्र और पूंजी का गठजोड़ अटूट दिखने लगा, तब हम आदिवासियों ने अपनी बिखरी हुई शक्ति को समेटना शुरू किया।
दादा रामदीन घायल होने के 3 महीने के बाद स्वर्ग सिधार गए और गांव के उजड़ने के बाद, हमारे पिता रघुवर कोल ने कमान संभाली। उसने शहर जाकर कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों से संपर्क किया। उन्हें पता चला कि ‘काली देवी पहाड़ी’ पर खनन की अनुमति देते समय ‘पेसा कानून’ और ‘वनाधिकार अधिनियम 2006’ की सरेआम धज्जियां उड़ाई गई थीं।
ग्राम सभा की फर्जी सहमति दस्तावेजों में दिखाया गया था कि ग्राम सभा ने खनन के लिए रजामंदी दी है, जबकि उस दिन गांव में कोई बैठक ही नहीं हुई थी।
रेंजर और खनन माफिया ने अनपढ़ आदिवासियों के नाम पर फर्जी अंगूठों के निशान लगाकर फाइलें तैयार की थीं।
हमारे पिता ने रात के अंधेरे में मशालें जलाकर बैठक शुरू की, जहाँ वह सबको उनके कानूनी अधिकारों के बारे में बताते।
जब मशीनों ने पहाड़ी के अंतिम हिस्से को ढहाना शुरू किया, तो सोनपुरा के स्त्री-पुरुष और बच्चे मशीनों के सामने लेट गए। पुलिस की लाठियां चलीं, आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लेकिन इस बार कोई पीछे नहीं हटा। “गोली मारो या जेल भेजो, लेकिन यह मिट्टी हमारी मां है और हम इसे नीलाम नहीं होने देंगे!” पिता जी की यह गर्जना पूरे मिर्जापुर के जंगलों में गूंज उठी।
पिता जी और वकीलों की टीम ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण और उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की। उन्होंने साक्ष्य प्रस्तुत किए कि पहाड़ी को काटने से स्थानीय जल स्रोत सूख गए हैं। लुप्तप्राय प्रजातियों के पेड़ों को वन विभाग ने चुपचाप कटवा दिया है।खनन से उड़ने वाली धूल से आदिवासियों के फेफड़े की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।
जैसे-जैसे मामला मीडिया में उछला, ‘पूंजीपति-प्रशासन’ के गठजोड़ में दरारें पड़ने लगीं। जब उच्च न्यायालय ने वन विभाग के रेंजर और खनन अधिकारी को निजी तौर पर तलब किया, तो वे एक-दूसरे पर दोष मढ़ने लगे। रेंजर ने कबूला कि ऊपर से दबाव था, जबकि खनन अधिकारी ने कहा कि उन्होंने केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी की थीं।
न्यायालय ने खनन पर स्टे लगा दिया है। प्रशासन को आदेश दिया गया है कि बेदखल किए गए परिवारों को वैकल्पिक जमीन और मुआवजा दिया जाए। |
उन अधिकारियों के खिलाफ जांच बैठाई गई है जिन्होंने फर्जी ग्राम सभा के कागजात बनाए थे।
एक दिन जब हमारे पिताजी मिर्जापुर से वापस लौट रहे थे तो खनन माफियाओं ने उनकी साइकिल में ठोकर मार कर उनकी हत्या कर दी और हम अनाथ हो गए। पुलिस ने इसे सड़क दुर्घटना बताया।
सोनपुरा के लोग आज भी मिर्जापुर में बस अड्डे के पास तिरपाल के नीचे रह रहे हैं, लेकिन हमने हार नहीं मानी है। काली देवी पहाड़ी का आधा हिस्सा अब भी खड़ा है, जो इस बात का प्रतीक है कि जब तक हम लोग अपनी जड़ों से जुड़े हैं, कोई भी पूंजीपति उन्हें पूरी तरह उखाड़ नहीं सकता।
न्यायालय के स्टे ऑर्डर के बावजूद, खनन माफिया ने हार नहीं मानी थी। हमारे गांव से शहर चले आने के बाद पूंजीपति के गुंडों ने एक अंतिम चाल चली। उन्होंने भारी ट्रकों और जेसीबी मशीनों के साथ ‘काली देवी पहाड़ी’ के बचे हुए हिस्से को रातों-रात ढहाने की कोशिश की, ताकि मामला ‘तथ्य’ के बजाय ‘मलबे’ का बन जाए।
लेकिन इस बार सोनपुरा अकेला नहीं था।
जैसे ही पहली मशीन की गड़गड़ाहट हुई, देखते ही देखते, आसपास के दस गांवों के आदिवासी कोल हाथों में मशालें लिए काली पहाड़ी की ओर उमड़ पड़े। यह एक जन-सैलाब था जिसे न पुलिस की लाठियां रोक सकती थीं, न रेंजर की धमकियां।
वह लोग तो भाग गए लेकिन फिर आएंगे।
साहब, मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं लेकिन जिंदगी में इतनी ठोकर मिली है कि मैं बहुत कुछ सीख गया हूं । अब मैं रिक्शा चलाता हूं और इससे जो पैसा मिलता है उसी से पिताजी के द्वारा शुरू किए गए मुकदमे को लड़ता हूं। भले ही मेरी जान चली जाए लेकिन मैं लड़ूंगा। कानून से लडूंगा। कई बार नक्सलवादी विचारधारा के लोग हमारे गांव में आए और उन्होंने कहा कि आप कानून से नहीं जीत सकते, हथियार उठाना पड़ेगा लेकिन हमने और हमारे साथियों ने संविधान पर विश्वास किया, हथियारों पर नहीं।
“साहब, हम आदिवासी हैं लेकिन हमें इस मिर्जापुर में आदिवासी का दर्जा नहीं मिला है ,इसी नाते हमारे साथ अन्याय हो रहा है। यह जो पहाड़ और जंगल हैं,केवल ‘संसाधन’ नहीं हैं, वे हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। सोनपुरा के आदिवासियों को उनकी जमीन वापस मिलनी चाहिए और खनन से हुए नुकसान की भरपाई उसी पूंजीपति की संपत्ति कुर्क करके होनी चाहिए।”
बातचीत करते-करते कब विंध्यवासिनी मंदिर आ गया पता नहीं चला। उसके संघर्ष गाथा के सामने मेरी संघर्ष कथा बौनी लग रही थी।मैंने मन ही मन उसे आदिवासी युवा को प्रणाम किया और मां विंध्यवासिनी के दरबार में अपने लिए कुछ भी न मांग कर उस आदिवासी युवा की जीत के लिए प्रार्थना की।
(कहानी काल्पनिक है)






Add comment