अग्नि आलोक
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लोकतंत्र की विडंबना

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आज हमलोग सही मायने में जनप्रतिनिधि नहीं बल्कि दलपति चुनते हैं।आज के जनप्रतिनिधि पहले दल की बात या आदेश सुनता है ,उसके बाद वोट देने बाली जनता की समस्या को सुनता है।यही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडंबना है कि हमारे जनप्रतिनिधि जनहित के मुद्दे पर भी सही तथ्य नहीं रख पाते हैं।आज सभी जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की जनसमस्याओं पर भी सत्य को सत्य कहने से परहेज़ करते हैं या दलीय ह्वीप के डंडे के डर से खामोश रहना पसंद करते है।
अब हमें वैसी राजनीतिक तंत्र विकसित करने का पहल करना होगा कि हम उसी उम्मीदवार को वोट देगें जो घोषणा करें  मेरी पहली प्राथमिकता जनता की आवाज को सुनना होगा और निर्वाचित होने पर टीए डीए के अलावा वेतन पेंशन एवं अन्य सरकारी सुविधा या तो नहीं लेंगे या जनता की सेवा आदर करने के लिए यथासंभव कम से कम सरकार राशि वेतन सुविधा लेने बाला हो।  जनप्रतिनिधियों द्वारा निजी पीए रखने के नाम पर भी लूट जारी है।ऐसा कानून बनना चाहिए कि जनप्रतिनिधि दलीय जकरण से मुक्त रहें,अपने जनता के प्रति अभिव्यक्ति को आजादी पूर्वक उठा सके।ह्विप का इस्तेमाल  सरकार बनाने या  गिराने तक ही सीमित रहना चाहिए। जनता की समस्या का समाधान या सीधा तौर पर कहे कि बिना काम किए वेतन भत्ता और अन्य सरकारी सुविधाएं किसी जनप्रतिनिधि को नही मिलना चाहिए ,जैसा कि सरकारी सेवकों के लिए नो वर्क नो पे लागू है। लोकसेवक का पेंशन बंद कर दिया गया है,उसी प्रकार से सांसदों और विधायकों का भी पेंशन बंद होना चाहिए, तभी राजनीतिक व्यवस्था में विशुद्ध रूप से लोकसेवा की भावना वाली  अहमियत बनी रहेगी।जबसे सांसद विधायक को  फंड, वेतन सुविधा एवं पेंशन दिया जाने लगा, राजनीति धंधा कैरियर समझकर समाजसेवी बनने की नाटक रचकर ,दलों के बड़े नेताओं के गणेश परिक्रमा कर जनसेवा किए बगैर टिकट लेने का प्रयास करता है।इसलिए चुनाव जीतने के लिए बेहिसाब धन खर्च किया जा हैं। सांसद-विधायक या जनप्रतिनिधियों के फंड का इस्तेमाल उसी काम में होना चाहिए, जहां सरकारी फंड आवंटित होने का प्रावधान नहीं रहता हो।
अमरीश कुमार,सामाजिक कार्यकर्ता,खगड़िया, बिहार

Ramswaroop Mantri

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