भारत में बचपन मे कम या ज्यादा क्रिकेट सबने खेला होगा, ऐसा कभी न कभी हर किसी के साथ हुआ ही होगा के किसी सार्वजनिक मैदान में क्रिकेट खेलते वक़्त कुछ बदमाश टाइप बड़े लड़के आये भी होंगे ये कहने के यहाँ हम खेलेंगे, तुम हटो यहाँ से और मुझे पूरी उम्मीद है आपकी ही टीम से किसी लड़के ने बड़ी हनक के साथ उनको ये भी कहा होगा के हम क्यूं नहीं खेल सकते ये “#तुम्हारेबापकामैदानथोड़ी_है”।
और वो हनक वाला लड़का आपका हीरो हो गया होगा। और कोई एक लड़का ऐसा भी रहा होगा जिसने ये कहा होगा के चलो दूसरी जगह चलते है। खुद से पूछिए आपको याद कौन सा है ? और क्यूँ ? आपको जवाब मिल जाएगा के ऐसी आवाज क्यों जरूरी है। सच तो ये है इसी हनक से आप और हम रश्क करते है के ये हमारे अंदर क्यों नहीं है। दिक्कत ये है के इस खुद्दार और हनक वाली आवाज के लिए खुद को जिंदा रखना पड़ता है , और आप और हम ठहरे अपनी अपनी नौकरियां और काम धंधे को बचाने के डर में जीने वाले लोग। तो ताकतवर का समर्थक हो जाना सबसे आसान काम है।
” #सभीकाखूनहैशामिलयहाँकीमिट्टीमें
और वो हनक वाला लड़का आपका हीरो हो गया होगा। और कोई एक लड़का ऐसा भी रहा होगा जिसने ये कहा होगा के चलो दूसरी जगह चलते है। खुद से पूछिए आपको याद कौन सा है ? और क्यूँ ? आपको जवाब मिल जाएगा के ऐसी आवाज क्यों जरूरी है। सच तो ये है इसी हनक से आप और हम रश्क करते है के ये हमारे अंदर क्यों नहीं है। दिक्कत ये है के इस खुद्दार और हनक वाली आवाज के लिए खुद को जिंदा रखना पड़ता है , और आप और हम ठहरे अपनी अपनी नौकरियां और काम धंधे को बचाने के डर में जीने वाले लोग। तो ताकतवर का समर्थक हो जाना सबसे आसान काम है।
#किसीकेबापकाहिंदुस्तानथोड़ीहै “
इन्ही पंक्तियों से समस्या हो रही है न, तो आप ये जान लीजिए ये पंक्तियां लिखी गयी थी तब , जब कांग्रेस के इतिहास का काला पन्ना लिखा जा रहा था , यानी इमरजेंसी में इंदिरा गांधी के खिलाफ और वो समय था जब #दिनकर की पंक्तिया ” सिंघासन खाली करो के जनता आती है” और “समय लिखेगा उनके भी अपराध” गूंज रही थी, और दूसरी तरफ #दुष्यंत लिख रहे थे , ” हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही , मेरी कोशिश है सूरत बदलनी चाहिए, और कहाँ तो तय था चरागां हर घर के लिए” तो वो समय उनका था , उस समय के एक नामालूम से शायर #राहतइंदौरी इन दमदार पंक्तियों को लिख रहे थे, बोल रहे थे । उस दौर के बड़े नामों में ये नाम सामने न आ सका और ये पंक्तियां ज्यादा लोगो तक पहुंच न बना सकी , न जन जन की आवाज बन सकी। ये उनको भी सुनाई न दी जो उस समय सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे, जो आज पावर में है।
इन पंक्तियों में क्या दिक्कत है, कुछ नहीं , असल मे इन पंक्तियों में एकता की बात की गई है और बांटने वाली ताकतों का स्पष्ट विरोध दर्ज किया गया है। और आज यही परेशानी है के इन पँक्तियो में बांटने वाली ताकतों का स्पष्ट विरोध दर्ज किया गया है।
क्या उस दौर में किसी ने #दिनकर या #दुष्यंत को ये कहा होगा के तुम ऐसा क्यों लिख रहे हो, तुम देशद्रोही हो, क्यूंके सत्ता विरोध तो वो भी लिख रहे थे, जवाब है नहीं, क्यूंके ये नरेटिव गढ़ने वाले सत्ता में नही थे।
आज भी ऐसे पचीसों कवि है जिनका करियर ही सत्ता के खिलाफ बरसो से चीख चीखकर ही बना है। किसी ने उनको कहा के आपने ऐसा क्यों कहा ? या क्यों लिखा ? आप गद्दार है,और क्या आपको उन चीखने वालों की ऐसी दो पंक्तिया याद है जिन्होंने ये मुकाम पाया हो , नहीं न, क्यूंके वो सत्ता विरोध तो कर रहे थे पर एक भी जुमला जनता की आवाज बनने लायक नही कहा गया, जो जनता के दर्द को बयां कर सके और कहा भी गया तो आप नही याद रखना चाहते क्यों के आप और हम आज भी ताकतवर के समर्थक है, समझ लीजिए इतिहास में वही चीज़े दर्ज होती है जो जनता की आवाज बन सके। राजा के जयकारे लगाने वालों को इतिहास याद नही रखता। क्यूंके हर दौर में वो थोक के भाव मिलते है।
सच्चाई ये है के इन पंक्तियों के मशहूर होने के लिए एक दौर फिर से जिंदा हुआ है और उसे जिंदा किया है अंधसमर्थको ने जो कल भी ऐसे ही थे जिन्हें अपने समर्थन की सत्ता दो पंक्तियों से ही गिरते हुए दिखाई देती थी और है। तो जो उड़ते तीर वाली स्थिति अंधभक्तो ने इन पंक्तियों के साथ की है उसने राहत साहब की शान में चार चांद लगा दिए। लिखा तो राहत साहब ने बहुत कुछ है पर जिन्हें पढ़ना ही नहीं उंन्हे क्या बताया जाए, कोई कुछ भी कहता रहे #राहत_इंदौरी बरसों तक जिंदा रहेंगे और जब जब सत्ता निरकुंश होने की कोशिश करेगी उन्हीं पंक्तियों के साथ #राहतइंदौरी जिंदा हो जाएंगे जैसे #दिनकर और #दुष्यंत हो जाते है।
अभी गनीमत है सब्र मेरा, अभी लबालब भरा नहीं हूं
वो मुझको मुर्दा समझ रहा है,उससे कहो मैं मरा नहीं हूं
दिनेश शर्मा





