अग्नि आलोक
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हो सके तो , हमें पामाल करके आगे बढ़

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कलबुर्गी , दाभोलकर और कामरेड पान्सरे को याद

*सुसंस्कृति परिहार

  डॉ नरेन्द्र दाभोलकर,  कामरेड गोविंद पानसरे एवं प्रो एम एम  कलबुर्गी की हत्या की खबरों के बाद से हम निरंतर सुलग रहे थे | पीड़ा लगातार सुलगती गीली लकड़ियों  की मानिंद हमें व्यथित  कर रही थी | हमारी फि़क्रों में  पूरा देश  था | लेखकीय प्रतिबद्धतायें और  हमारे जनतांत्रिक जीवन की आस्थाओं को नष्ट करने वाली ताकतों के हौसले  निरंतर जब बढ़ रहे  हों ऐसे कठिन वक्त  में जब मुझे यात्रा में शामिल होने कहा गया तो  मैं ने  तमाम खतरों  को नज़र अंदाज़ करते हुये, उन परिजनों से  मिलना बेहतर समझा जिन्होंने खतरे उठाकर लेखकीय आज़ादी, अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता  और साहस को ज़िंदा  रखा था |हम सब उन्हें  गर्व और  श्रद्धा  से भरे सलाम  करने जा रहे  थे| जा रहे  थे  उन्हें  यह जतलाने आप अकेले नहीं  हैं | हज़ारों  हज़ार लोग  अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता  के पक्ष  में आपके साथ हैं | अब्दुल सत्तार का यह शेर हमारे दिल दिमाग  को मज़बूती  दे रहा था  --
Ali Sohrab: September 2015

हयात ले के चलो कायनात ले के चलो
चलो तो अपने जनाजे को साथ ले के चलो
दिलों में जख़्म और दिमाग़ में जनाजे को लिए हमारा कारवां सतारा के तारांगण में पहुंचा है जो अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति का मुख्यालय है जिसे डॉ नरेन्द्र दाभोलकर ने स्थापित किया | मिलने वाली धमकियों से वे डरे नहीं जीवन पर्यन्त अंधश्रद्धा के खिलाफ़ डटे रहे |प्रात:कालीन सैर के दौरान उन्हें तर्क विरोधी कुंद अक्ल लोगों ने नज़दीक से सिर पर गोली का प्रहार कर उनके विचारों को ख़त्म करने की कोशिश की ,वे तो दुनियां को अलविदा कह गये पर वे इस घिनौने प्रयास में विफल रहे | महाराष्ट्र सरकार ने दाभोलकर जी की मृत्यु के चंद रोज़ बाद अंधश्रद्धा कानून पास कर दिया जिसके लिए वे संघर्षरत थे | दूसरी ओर उनके इस काम को और तीव्रतर किया उनकी पत्नी डॉ शैला दाभोलकर ने अपने पुत्र डॉ हमीद दाभोलकर और अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के सदस्यों के साथ |वर्तमान में तकरीबन 5000 केन्द्र दृढ़ इरादे के साथ कार्यरत हैं जो दाभोलकर की जीवंतता को दर्शाते हैं | देश के विभिन्न भागों में तारांगण से कार्यकर्ता जाते रहते हैं |मौत के बाद उनके विचारों की जीवन्तता से हम सब प्रभावित होते हुये, नतमस्तक होकर शैला जी और उनके वृहद परिवार को सलाम करते हैं |शैला जी के चेहरे पर कोई मायूसी कहीं नज़र नहीं आती है वे हम लोगों से संवाद करते हुये विश्वास पूर्वक कहती हैं एक दिन हम सब मिलकर समाज को अंधश्रद्धा से मुक्त कर देंगे |न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति पर वे ज़रूर क्षोभ प्रकट करती हैं |इसी विश्वास के साथ हमीद तथा अन्य अपनी सुरक्षा से बेपरवाह जिस तरह सजगता ला रहे हैं वह क़ाबिले गौर है और अनुकरणीय भी |इस परिवार का सानिध्य हमें नई ऊर्जा से तरोताज़ा कर देता है |नई उमंग के साथ विदा लेते हैं | बरबर राव बरबस याद हो आते हैं —
यही वक्त है कुछ करो नौजवान
और उस औरत के जीवन में पैठ जाओ
यही मौत के ख़िलाफ
अपनी मौत के ख़िलाफ
एक काम हो ,जो कर सकते हो

सोचती हूं ,जिस देश में एक तर्क की परम्परा रही हो अपने धर्म, पंथ को मनाने के लिए शस्त्र नहीं शास्त्रार्थ हुआ करता था |आदि शंकराचार्य की कथा से हम सब वाकिफ हैं उसी देश में अब तर्कवादियों को योजनाबद्ध तरीके से मारा जा रहा है यह तर्कवादियों के खिलाफ एक जेहाद है |यह देश की प्रतिभाओं को नष्ट कर देश के विनाश का पूँजीवादी षडयंत्र है |
अगला पड़ाव है धारवाड़ |जहां उमादेवी जी कलबुर्गी जी से मिलने हम पहुंचते हैं |अतिथि कक्ष में प्रवेश करते ही सामने सोफे पर कलबुर्गी जी का फोटो रखा है जहां वे बैठकर बात करते करते, लिखते पड़ते थे यहीं उनसे मिलने आये तंगदिमाग लोगों ने सिर पर गोली दाग कर मार दिया था |उमा जी ने आदर पूर्वक उन हत्यायें को बैठाया |चाय लाने का कहकर अंदर गईं और इधर ये हादसा कहर बन के उन पर टूट पड़ा | कैसी हो गी वह सुबह सोचकर सभी की आंखें नम हो जाती हैं हम सब को ग़मग़ीन देख वे भी सुबक उठती हैं | सोफे के सामने टेबल पर करीने से सजी 121 पुस्तकें और अल्मारी से झांकते अनगिनत पुरस्कार सदा देते हैं कि कलबुर्गी जी हमारे बीच यहीं मौजूद हैं | यकीनन वे जि़दा हैं और सदैव हमारे साथ रहेंगे |बहरहाल तब तक उमा जी भी उस असामयिक दंश से उभर जाती हैं हम सबका परिचय होता है वे खुश नज़र आती हैं यह जानकर कि मध्यप्रदेश से आये हैं और उनकी लड़ाई में साथ हैं |विदित हो उमा जी हिन्दी समझ लेती हैं लेकिन अपना संदेश कन्नड़ में देती हैं जिसे अनुदित करती हैं ख़यात गुजराती लेखक गणेशदेवी की पत्नी सुलेखा देवी जी |यह दम्पत्ति कुछ वर्षों से धारवाड़ में बस गये हैं |गणेश देवी ने कलबुर्गी जी की हत्या के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हेतु दक्षिणायन नामक संस्था बनाई जो दक्षिण में निरंतर संघर्षरत है |सम्पूर्ण भारत के लिए प्रयास जारी हैं |सुरेखा जी बताती हैं उमा जी कह रही हैं कि वे कलबुर्गी जी के पथ की राही हैं मौत से पीछे हटने वाली नहीं आप सबका साथ हमें मिलेगा यही कामना है |वे उन लेखकों के प्रति कृतग्यता भी वक्त करती हैं जिन्होंने सम्मान वापसी का कदम उठाया था |.यहां यह भी बताना जरुरी है कि कलबुर्गी जी जब कुलपति पद से सेवानिवृत्त हुये उन्होंने सुरक्षा नहीं ली |मृत्युपरांत फिर सुरक्षा की बात आई जिसे उमा जी ने ठुकरा दिया |
एक लेखक की पत्नी से हुई मुलाकात कोे मदन कश्यप की इन पंक्तियों ने साकार कर दिया —
जब तुम्हें देखा
तुम खूबसूरत लगीं
जब तुम्हें सुना तुम और खूबसूरत लगीं
जब हवा में तनी तुम्हारी मुट्ठी
तुम सबसे खूबसूरत लगीं

आत्मविश्वास का दामन थाने उमा कलबुर्गी जी लेखकीय स्वतंत्रता के प्रति कटिबद्ध हैं वे आगे बढ़कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का परचम फहराती मुट्ठियों ताने संघर्षरत हैं हम सबने भी मुट्ठियों को तानकर उन्हें आश्वस्त किया तथा अपने को अधिक मज़बूत पाया |
कदम दर कदम बढ़ाते हुये लगता है लेखक बतौर कलबुर्गी जी की जीवन शैली का सच्चा मार्ग कदाचित यही था जिस पर उमा जी सतत चल रही हैं —सहना पराई पीड़ाओं को बार बार
जीते रहने का अकेला उपाय है
प्रजातांत्रिक देश में क्या वैचारिक असहमति के आधार पर हत्या की अनुमति दी जा सकती है शायद यह मुमकिन ही नहीं |विचारों को मारने का ये कुत्सित तरीका निंदनीय है जबकि हम भलीभांति जानते हैं कि वे हत्या के बाद सहस्त्र फनों में तबदील हो जाते हैं बापू इसके उदाहरण हैं वे देश ही नहीं बल्कि विदेशों में अपने विचारों के साथ आज भी जिन्दा हैं किसी लेखक या विचारक का मारा जाना वह भी लोकतांत्रिक गणराज्य में एक गंभीर और चुनौतीपूर्ण घटना है |लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है |
इसी क्रम में अपने बेबाक लेखन और सेवा भावना के साथ भ्रमित होते समाज को मार्गदर्शन देने वाले जुझारू कामरेड गोविंद पानसरे और उनकी पत्नी उमा पानसरे को प्रात:भ्रमण के दौरान गोलियों से सदा के लिए मौन करने की दर्दनाक घटना कोल्हापुर में हुई | पानसरे जी घटनास्थल पर ही शांत हो गये पर उमा जी सिर में गोली का वार सहकर भी आज उनके विचारों की वाहक बनी हुई हैं |हालांकि दिमाग की किसी नस पर गहरी चोट की वजह से उनका दाहिना हाथ कमजोर है तथा काम के काबिल नहीं है लेकिन लालझंडे के परचम को थामे वे संघर्षरत हैं |इस परिवार पर एक वज्रपात इकलौते पुत्र की असामयिक मृत्यु का भी गिरा पर वह उनके इरादे से डिगा नहीं पाया उनकी पुत्रवधू डॉ मेघा जो शिवाजी विद्यापीठ में रशियन विभागाध्यक्ष हैं उनके साथ संघर्ष में शामिल हैं |मेधा की बदौलत ही सतारा, धारवाड़ की घटनाओं को कोल्हापुर से जोड़कर विस्तार दिया गया |पानसरे जी के साथ कलबुर्गी और दाभोलकर के संयुक्त स्मरण कार्यक्रम जो कोल्हापुर के शाहू जी भवन में 20 फरवरी 2017 में आयोजित हुआ हज़ारों की उपस्थिति में मेघा की गर्जना को सुन एेसे लगा मानों तीनों साथी जीवंत रूप में सामने हों |सुबह पानसरे जी के घर से “निर्भय वाक” में उमा और मेघा के साथ दो सो साथियों में हम सब भी शामिल थे |उसी रास्ते चले जिस पर वे शहीद हुए थे “आमी सारे पानसरे कलबुर्गी दाभोलकर “उद्घोष के साथ |श्रद्धांजलि सभा में हमने एकजुटता की शपथ ली | जोश खरोश के साथ सीखाकठिनाईयों से डरना कैसा? संघर्ष करो संघर्ष करो |
इन तीन परिवारों की सक्रियता और समझ के आगे हम नतमस्तक हुये | सोचतीे हूं जिस देश में वैदिक काल से विश्व शांति, अंतरिक्ष शांति का मंत्र गुंजायमान हो रहा हो, जहाँ सत्य और अहिंसा के हथियारों से आजादी मिली हो |उसी देश में राष्ट्रपिता की हत्या एेसे शख़्स द्वारा हुई जिसका आज़ादी के संग्राम में दूर तक नामोनिशान नहीं था,यह सिलसिला आज भी जारी है अब तो इन हत्यारों को सरकारी संरक्षण भी प्राप्त है| ये भी ऐसे ही लोग हैं जिनका इस देश, धर्म और संस्कृति से दूर का लेना देना नहीं है | वे संगठित होकर देश, धर्म और संस्कृति के नाम पर हत्यायें कर रहे हैं |बकौल कैलाश वनवासी—-
वह चेहरा
जो शांति के कबूतर उड़ाया करता था
हमें याद नहीं रहा

हम भारतीयों का अब एक चेहरा नहीं है | याद आते हैं हर्षमंदर आई ए एस अधिकारी जो 2002के गुजरात दंगे के बाद 10दिन वहां रहे और लौटकर कहा था –“वे अब कभी अपना प्रिय गाना सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा नहीं गा पायेंगे ” इस खतरनाक समय में भी मज़बूत बनाते हैं ,यात्रा के वे सुखद क्षण| वे हमें उम्मीद जताते हैं हम होंगे कामयाब एक दिन | याद आते हैं वे लम्हे भी ,जब सफदर हाशमी को गाजि़याबाद में नुक्कड़ नाटक करते वक्त हत्यारे मार गये थे लेकिन उनकी पत्नी मलय हाशमी ने पति की शहादत को ऐसे मनाया कि वे अगले दिन घटनास्थल पर पहुंचकर और रंगकर्मियों के साथ उस अधूरे नाटक को पूरा किया . उमा पानसरे जी की बात याद आती है दाभोलकर जी को घर से काफी दूर मारा, पानसरे जी को घर के बाहर कुछ फासले पर और अंत में कलबुर्गी जी को घर में घुसकर | यह इस बात की तकसीद करती है कि हत्यारे कितने करीब आ चुके हैं |अब तो वे अपने विचार खोपड़ी के अंदर प्रविष्ट कराने सिलेबस बदल रहे हैं |संघर्ष बढ़ेगा ही |
लेकिन हम लड़ेंगे और जीतेंगे |एक अच्छी दुनिया के लिए | एक बेहतर समाज के लिए |अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए |एक सुकूनतर हवा के लिए |बुलंद हौसले के साथ |शहीदों की पत्नियो के साथ जो कट्टरवादियों, फासिस्टों और समाज के मानसिक कोढ़ियों से साफ साफ कह रहीं हैं ——–
हो सके तो, हमें पामाल करके आगे बढ़
ना हो सके तो हमारा जवाब पैदा कर
हमारी आंख कसौटी है -हमारी जबान सनद है |

उनकी इस बुलंदी को सलाम | उनके जज़्बे को अनगिनत सलाम |

Ramswaroop Mantri

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