जगदीश शुक्ला
– पुरूष्कार और जश्न के माहौल मंे मेरी इस फरियाद को अनसुना ना कीजिये मैं बाअदव आपसे अपनी तकलीफ बयां करना चाहता हूं। ए सुनो जरा मेरा दम घुट रहा है। मुझे आपने कहां और किस जलील हाथों में थमा दिया कि मैं शर्मसार होकर अपने दुर्भाग्य को कोसने को मजबूर हो रहा हूं। मुझे एसे हाथों में थमाकर तुमने मेरे साथ तो अन्याय किया ही है साथ ही अपनी काबिलियत पर भी गहरा प्रश्न चिन्ह अंकित कर दिया है।
जी हां पुरूष्कार देने और पाने की प्रक्रिया और उसके जश्न के क्षणों में आप चाहे मेरी दम घुटने की आबाज नहीं सुन पा रहे हो लेकिन बा मुलाहिजा दरख्वास्त करना चाहता हूं कि इससे जलील पल मैंरे अपने 67 साल के जीवन काल में पहले कभी नहीं आये जब मुझे अपने हाथों में थामने के फखत कुछ लम्हों बाद ही मुझे हासिल करने बाले ने अपनी नाकाबिलियत साबित कर दी हो। वक्त आपसे इसका हिसाब अवश्य मांगेगा। वक्त आपसे जरूर पूछेेगा कि देश के पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित पुरूष्कार का आपने एसा हश्र क्यों किया। वक्त आपसे अवश्य जानना चाहेगा कि देश के एक गौरवपूर्ण प्रतिष्ठित सम्मान को आपने नादान या सच कहूं तो एसे मूर्खता पूर्ण हाथों में क्यों थमा दिया जिसे अपने आका को खुश करने के लिये चाटुकारिता की हदें पार करते हुआ ना तो लज्जा आती है और नां ही उसे अपने देश एवं उसकी आजादी के लिये अपनी जान गंवाने बाले शहीदों का अपमान करने से ही कोई गुरेज है। यद्यपि सत्ताधीशों के रहमोकरम पर पुरूष्कार दिये जाने की परंपरा नई नहीं है। सत्ता की चाटुकारिता की कीमत में आपने मुझे इससे पहले कई अपात्र हाथों को थमाया लेकिन मैंने उफ तक नहीं की। शायद इतनी घुटन और तकलीफ मुझे इससे पहले कभी हुई भी नहीं।
एक कमशिन मामूली पढ़ी लिखी बदगुमान लड़की से मुझे ज्यादा अपेक्षा भी नहीं। पुरूष्कार मिलने के बाद टाईम्स नाउ नामक चैनल को दिये इंटरव्यू में भक्तिभाव के मद में डूबी ज्ञानवान होने का अभिनय करने बाली नासमझ अभिनेत्री का कहासुना तो खारिज भी किया जा सकता है,लेकिन बात-बात पर देश भक्ति और राष्ट्रप्रेम के तमगे बांटने बालों के मौन ने मुझे गहरे सदमें में डाल दिया है। राष्ट्र भक्ति पर अक्सर ज्ञान बघारने बाले ज्यादातर भक्तगण अपने भगवान की नाराजी के खौफ से या तो मौन हैं अथवा देश की आजादी के लिये अपना सब कुछ दांब पर लगाने बाले शहीदों की शहादत को खारिज करने बाले कंगनाओं की खनक मंे मस्त होकर उसकी पैरबी कर रहे हैं। मेरी आत्मा इन हाथों में आकर मुझे कचोट रही है। मेरे लिये वे क्षण जब मैं महामहिम के हाथों इस मूर्ख लड़की के हाथों हस्तांतरित हो रहा था शायद सबसे अधिक शर्म और डूब मरने बाले क्षण थे। मैंने शायद कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे पाने के कुछ देर बाद ही कोई मुझे चाटुकारिता की हदों को पार करते हुए इतना जलील करेगा कि मुझे इस हद तक शर्मिन्दगी उठानी पड़ेगी।





