सभी धर्म प्रेम, सत्य और भाईचारे की शिक्षा देते हैं…फादर वर्गिस
गाँव में बनी वस्तुओं को अधिकाधिक क्रय कर बेरोजगारी को दूर करें…डॉ. पुष्पेन्द्र दुबे
गाँधीजी का ट्रस्टीशिप का सिद्धांत को आज अरबपति भी अपना रहे…डॉ. अनिल भंडारी
अधिक से अधिक उत्पादन का विकास का मॉडल सही नहीं…पर्यावरणविद डॉ. जोशी
इंदौर। श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति इंदौर के सभागृह में चल रही तीन दिवसीय गाँधी दर्शन कार्यशाला के दूसरे दिन भी मध्यप्रदेश सहित महाराष्ट्र, गुजरात से आये गाँधीवादी विचारकों एवं समाज सुधारक सुबह से लेकर शाम तक गाँधी दर्शन पर खुलकर बातचीत करते रहे। जिसमें कस्तूरबा ट्रस्ट और इंदौर स्कूल ऑफ सोशल वर्क के छात्र-छात्राओं ने भी सहभागिता की। कार्यशाला में मुख्य बात यह निकलकर आई कि हम गाँधी दर्शन को अपनाकर श्रम को प्रतिष्ठा दे, सादगीपूर्ण जीवन जिये, प्रकृति का दोहन करें न कि उसका शोषण।
यह जानकारी यूनिवर्सल पीस एंड सोशल डेवलपमेंट सोसाइटी के प्रमुख आलोक खरे और मीडिया प्रभारी प्रवीण जोशी ने दी। कार्यशाला का पहला सत्र धार्मिक सद्भाव विषय पर केन्द्रित रहा। इस विषय पर फादर वर्गिस आर्लेंगाडन ने कहा कि “साम्प्रदायिक सद्भाव विषय पर सेमिनार रखने की आवश्यकता भारत जैसे देश मे नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह तो भारत की आध्यात्मिक धरोहर है। हम ’वसुधैव कुटुम्बकम’ में विश्वास करते हैं। हज़ारों साल पहले लिखे गये धर्म ग्रंथ, ’अह्म ब्रम्हास्मि’ की बात बताते हैं, यदि मेरे भीतर ईश्वर है तो सामने वाले व्यक्ति में भी ईश्वर है चाहे वह किसी भी जाति और धर्म से सम्बंधित क्यों न हो फिर धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर इतनी हिंसा क्यों? इसके जवाब में हमें धार्मिकता से आध्यात्मिकता की ओर जाना होगा। धार्मिक कर्मकांडो से ऊपर उठकर धर्म मे सिखाये गए नैतिक मूल्यों को दैनिक जीवन में अपनाना होगा क्योंकि प्रत्येक धर्म में रीतिरिवाज, पूजा पद्धति भले ही अलग हैं परंतु नैतिक मूल्य समान हैं। सभी धर्म सत्य, प्रेम करूणा और भाईचारे की शिक्षा देते हैं। यदि हम इन मूल्यों का अभ्यास करते हैं तो समाज में साम्प्रदायिक कटुता स्वयमेव ही समाप्त हो जाएगी।“ अतिथि परिचय एनी पंवार ने दिया। स्वागत सुगन बरंत ने किया। संचालन किया श्याम पांडे ने।

वरिष्ठ चिंतक विजय तांबे (मुंबई) ने औद्योगिक क्रांति और उसके प्रभाव विषय पर कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रभाव जितना बढ़ेगा, समाज में उतनी बेरोजगारी बढ़ेगी। रोजगार के अवसर कम हो जायेंगे, आर्थिक विषमतायें बढ़ेगी। वर्तमान में एक प्रतिशत लोगों के पास 51 प्रतिशत संपत्ति है, 4 प्रतिशत के पास 17 प्रतिशत, 35 प्रतिशत के पास मात्र 27 प्रतिशत और 60 प्रतिशत ऐसे लोग है जिनके पास मात्र 5 प्रतिशत संपत्ति है। देश में 58 प्रतिशत ऐसे लोग है जिनके पास खाने पकाने के लिए ईंधन नहीं है और 45 प्रतिशत लोगों के पास स्वयं का आवास नहीं है। श्री तांबे ने कहा कि इतनी अधिक आर्थिक असमानताओं को मिटाने का एक ही उपाय है कि हम सब गाँधी मार्ग पर चलें। जब तक सब लोग सुखी और प्रसन्न नहीं होगे, शांति और विकास की बातें बेईमानी होगी। हम प्रकृति के साथ संवाद करें, उसका शोषण नहीं, गरीबों को हम उसके रोजगार से वंचित नहीं करें। लेकिन अब तो देश में गन्ना काटने की मशीनें भी आ चुकी है, ऐसे में कृषि मजदूरों का रोजगार जाना तय है।
गाँधीवादी समाजसेवी डॉ. अनिल भंडारी ने कहा कि महात्मा गाँधी ट्रस्टीशिप के सबसे बड़े आदर्श है। उनका मानना था कि हमारे पास कितनी भी संपिŸा हो, उस पर केवल स्वयं का नहीं समाज का भी अधिकार है। गाँधीजी का यह दर्शन आज के हम अरबपति बिल गेट्स, वारेन बफेट के जीवन में भी देख सकते हैं, जो अपनी संपिŸा का अधिक से अधिक दान कर रहे है। सत्कर्म करने से हमारा विश्वास बढ़ता है। गाँधीजी श्रम में अधिक विश्वास करते थे। इससे एक लाभ यह भी है कि व्यक्ति स्वस्थ और दुरुस्त रहता है। गाँधीजी का कहना था कि एक घंटा अपने लिए भी दे और अधिक से अधिक प्राकृतिक चिकित्सा का इस्तेमाल करें।
गाँधीवादी चिंतक हर्षल कुमार (गाँधीनगर) ने कहा कि मेरा पूरा जीवन ही बापू को समर्पित है और मैं बचपन से ही खादी के वस्त्र पहनता हूँ और कम से कम मेरी आवश्यकता है। गाँधीजी ने बुनियादी शिक्षा पर अधिक जोर दिया। यानी ऐसी शिक्षा जिसमें दिमाग, हाथ और हृदय का योग हो। गाँधीजी को सबसे करीब नारायण भाई देसाई ने देखा, जिन्होंने 1800 पृष्ठों में गाँधी पर पुस्तक लिखी, जो सभी को पढ़ना चाहिए।
पर्यावरणविद् डॉ. ओ.पी. जोशी ने कहा कि गाँधीजी का मानना था कि आजादी के बाद हमें साफ हवा, साफ पानी और निरामिष भोजन मिलेगा, लेकिन यह संभव नहीं हुआ। आज जो खाद्यान्न का उत्पादन हो रहा है उसमें तमाम तरह के केमिकल्स हैं, रासायनिक उर्वरकों से हमने भूमि को खराब कर दिया है। देश के 21 शहरों में भूमिगत जल समाप्त हो जाएगा और चेन्नई में तो इसकी आहट भी सुनाई दे रही है। हमें अपना विकास का मॉडल बदलना होगा, जो अधिक उत्पादन की बात कहता है। अधिक उत्पादन का मतलब अधिक प्रदूषण का होना।
वरिष्ठ लेखक उमेशचंद श्रीवास्तव (सानंद) ने कहा कि गाँधी सादगी के प्रतीक थे और समय के बड़े पाबंद थे, वे पुरातनपंथी नहीं थे और कम से कम चीजों में अपना जीवन गुजारते थे। यही कारण है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी उनसे प्रभावित थे।
गाँधीवादी डॉ. पुष्पेन्द्र दुबे ने कहा कि देश के सामने आज तमाम तरह के आर्थिक संकट है, जिसका सामना गाँधीजी के ग्यारह सूत्र को अपनाकर दूर किया जा सकता है। ये सूत्र है-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, असंग्रह, श्रम, अस्वाद, भय, स्वदेशी, स्पर्श, भावना और विनम्रता। समाज जीवन में जब श्रम की प्रतिष्ठा होगी तो हम आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को पूरा कर सकेंगे। स्वयं को नियंत्रित किए बिना समस्याओं से निजात नहीं पाई जा सकती। बेरोजगारी को दूर करने के लिए गाँव में बनने वाली वस्तुओं का अधिक से अधिक इस्तेमाल करना चाहिए ताकि ग्रामीणों को भी रोजगार मिले और गाँव मजबूत हो। सत्र का संचालन प्रोफेसर असद खान ने किया।
गाँधीवादी कार्यकर्ता दयाराम नामदेव (भोपाल) ने कहा कि हमने गाँवों की तरफ ध्यान देना बंद कर दिया। इसलिए देश की यह स्थिति बनी। गाँव बहुत कमजोर और लाचार हो गये। गाँव से लक्ष्मी और सरस्वती दोनों का पलायन हो गया, जिसे रोकना जरुरी है। गाँधीजी का मानना था कि जब तक गाँव मजबूत नहीं होंगे, देश मजबूत नहीं होगा, क्योंकि भारत गाँव में बसता है और हमने उस भारत की आज उपेक्षा कर दी। वरिष्ठ लेखिका डॉ. पुष्पा चौरसिया ने कहा कि विकास के नाम पर हमने पर्यावरण का जो सत्यानाश किया है उसे हमारी नई पीढ़ी को भोगना पड़ रहा है। हमने इतने जंगल काट दिये है कि पक्षियां को घोंसले बनाने के लिए जगह नहीं मिल रही है। अतः हम अपने घरों के आंगन में कम से कम दो पौधे अवश्य लगाये। राजू सैनी ने कहा कि मैंने गाँधीजी से प्रभावित होकर ऐसे गरीब और वंचित बच्चों को पढ़ाया, जिनके पास न पहनने के कपड़े थे और न पढ़ने के लिए किताबें। मैं स्वयं भी गरीब परिवार से हूँ। लेकिन आज खुशी है कि मैं सरकारी सेवाआेंं में हूँ।
अंतिम सत्र समूह चर्चा का रहा जिसमें छात्रों से बातचीत अरविन्द पोरवाल, विवेक मेहता ने की। श्री पोरवाल ने कहा कि सकारात्मक शांति से हम समाज में शांति और सामाजिक सुधार ला सकते है। प्रत्यक्ष हिंसा की घटना को रोकने के लिए अन्यायपूर्ण व्यवस्था, सामाजिक संरचनाओं और सामाजिक मानदंडों को ठीक किया जाता है। दरअसल हमारा समाज कानून और व्यवहार दोनों के भय से मुक्त सुरक्षित वातावरण में रहने में सक्षम हैं। समाज में सबकी भागीदारी से वास्तविक शांति प्राप्त होती है। समूह चर्चा में डॉ. कीर्ति यादव, प्रदीप सिंह मुदातिया आदि ने सहभागिता की। डॉ. पोरवाल ने अपनी बात पावरपाइंट के माध्यम से कही। इस अवसर पर विवेक मेहता ने कहा कि आज सबसे अधिक पैसा लड़ाई और हथियार खरीदने में खर्च हो रहे है, ताकि शांति की स्थापना की जा सके, जबकि यह संभव नहीं है। विकसित देश गरीब देशों पर हिंसा थोप रहे है और वे कमजोर देशों को युद्ध भूमि बना रहे है जिससे समाज में और अशांति फैल रही है।
अतिथि स्वागत मुकुन्द कुलकर्णी, रामेश्वर गुप्ता, रविन्द्र रूकमणी, डॉ. रमेश मंगल, शफी शेख, ओ.पी. कानूनगो, अशोक मित्तल ने किया। कार्यक्रम में कीर्ति यादव, सुमति कुमार जैन, फरहीन शेख, अतुल कर्णिक, विनोद पगारे, प्रीति जोशी, वनीता राठौर, नीतू जोशी, कुमार सिद्धार्थ, डॉ. अभय भरकतिया, डॉ. पुष्पा चौरसिया, मोहनलाल तिरोदिया सहित कस्तूरबा ट्रस्ट, स्कूल ऑफ सोशल वर्क के छात्र-छात्राएँ उपस्थित थी।
शफी शेख ने बताया कि कार्यशाला के अंतिम दिन 12 दिसंबर को कार्यशाला की शुरुआत सुबह 10ः30 बजे गाँधीजी की प्रार्थना से होगी। इस कार्यक्रम में अरविंद पोरवाल, कुमार सिद्धार्थ, डॉ. सुगन बरंत संबोधित करेंगे।





