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बीमारी में Positive होना नकारात्मक होता है

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शशिकांत गुप्ते

एक बात तो माननी पड़ेगी। सन 2014 के पूर्व किसी भी सरकार के पास दुरदृष्टिता नहीं थी। सन 2022/23 का बजट इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
वर्तमान वित्तमंत्री ने सन 2047 तक की योजनाओं को कार्यरूप देकर समस्याओं के विष को अमृत में बदलने की घोषणा की है।
इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर मै, गम्भीरता से चिंतन मनन कर रहा था। संयोग से मेरे मित्र सीतारामजी का आगमन हो गया।
सभी जानतें हैं सीतारामजी व्यंगकार हैं।
मै ने सीतारामजी से निवेदन किया कि उक्त गम्भीर मुद्दे पर आप अपने अंदर के व्यंग्यकार को एक ओर रख कर अपने विचार प्रकट कीजिए।
सीतारामजी ने मुस्कुराते हुए संत कबीरसाहब का यह दोहा सुना दिया।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।।

मै समझ गया सीतारामजी का उक्त दोहा सुनाने के पीछे आशय क्या है?
मै कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करता इसके पूर्व ही सीतारामजी ने कहा,
भूखे पेट भजन न होय गोपाला
मैने भी जवाब में कबीरसाहब का दोहा पढा
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।।
यह दोहा सुनते ही सीताराम क्रोधित ही गए।

कहने लगे आज अपने स्वार्थ के लिए कबीरसाहब याद आ रहें हैं?
भूल गए स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास,असंख्य देशभक्तों की कुर्बानियां,असंख्य देशभक्तों का साहसिक संघर्ष।
स्वतंत्रता संग्राम में शिरकत करने वालें पुरखो के खून पसीने से सींचने पर ही यह विविधता वाला भारत देश रूपी गुलशन हमें प्राप्त हुआ है।
जिसे आप दुरदृष्टिता कह रहे हो यह दुरदृष्टिता नहीं है,यह तो सिर्फ बनावटी औपचारिकता है।
गांधीजी के अनुयायी आदिवासियों के मसीहा स्वतंत्रता सैनानी स्व.मामा बालेश्वरजी का स्मरण होता है। मामाजी हमेशा कहतें थे,उसी नीति पर विश्वास करों,जो अच्छी नीयत से प्रस्तुत की जाती है।
सिर्फ और सिर्फ सत्ता प्राप्त करने और एनकेनप्रकारेण सत्ता को बचाए रखने की गरज से प्रस्तुत की जा रही नीति के पीछे स्वार्थ पूर्ण मानसिकता विद्यमान होती है।ऐसे नीति में सिर्फ आश्वासन होतें हैं।
देश की जनता को सिर्फ और सिर्फ आश्वासनों पर निर्भर नहीं रखा जा सकता है।
सीतारामजी ने मुझसे कहा, आप कैसे साहित्यकार हो। साहित्य तो समाज का दर्पण होता है।
आप तो स्वयं ही आश्वासनों की भूलभुलैया में भटक गए हो?
अच्छेदिनों के आश्वासनों के भ्रम में नहीं रहना चाहिए नहीं तो निम्न दोहे में जो सबक समाहित है,वैसी स्थिति बन सकती है।
आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत।
अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गयी खेत।।

एक बात ध्यान रखना कभी भी अहंकार के मद में दूसरों को अपने छोटा नहीं समझना चाहिए।यह ओछी मानसिकता होती है।
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय।
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।।

संत कबीरसाहबजी कहते हैं कि, पैरों के नीचे पड़े हुए तिनके को भी कभी कम मत समझो, जब वही तिनका उड़ कर आँखों में चला जाता है तब वह बहुत पीड़ा देता है। इसी प्रकार हमें कभी किसी गरीब और कमजोर व्यक्ति को भी कम नहीं समझना चाहिए।
मैने कहा दुरदृष्टिता से मेरा तात्पर्य है सकारात्मक सोच रखना
सीतारामजी ने तुनक कर जवाब दिया ऐसी दुरदृष्टिता पर सकारात्मक सोच रखना मतलब कोरोना महामारी में Positive होने जैसा पीड़ा दायक है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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