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कभी तो मानवता दिवस मनाया जाएगा?

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शशिकांत गुप्ते

प्रख्यात व्यंग्यकार स्व.शरद जोशीजी के लिखे एक व्यंग्य की इन पंक्तियों का स्मरण हुआ।
शरद जोशीजी ने व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए लिखा है कि, हमारी सरकार पुल इसलिए बनाती है कि, पुलों के नीचें से नदिया निकल सके। यदि सरकार पुल नहीं बनाएगी तो नदिया किसके नीचें से निकलेगी
आज इन व्यंग्य पंक्तियों का स्मरण होने का मुख्य कारण है,आज महिला दिवस है। यदि बारह महीनों में एक दिन, महिला दिवस नहीं मनाया जाता तो महिलाओं का सम्मान कैसे हो पाता?
धन्य है वह युग व्यक्ति जिसने बारह महीनों में कोई ना कोई दिन मुकर्रर किया है।
एक दिन मातृ दिवस मनाकर अपनी जननी को याद कर लेतें हैं। यदि वह अस्तित्व में है तो, अपने कर्तव्य को बगैर भूले,माता को मिलने वृद्धाश्रम जा कर उसका सम्मान करतें हैं।
ऐसे ही हम पिताश्री के लिए जो दिन मुकर्रर होता है,उस दिन ही पिता का सम्मान करतें हैं।
इसी तरह आधुनिक परिवेश में हमने भाई,बहन,बच्चों का भी निर्धारित कर रखा है।
हाल ही में Promise day मतलब वादा करने के दिन का भी प्रचलन शुरू हुआ है। वादा शब्द पिछले आठ वर्षों से प्रत्येक देशवासी के मानस को झकझोर रहा है। कारण यह शब्द तब महत्वहीन हो जाता है, जब इस शब्द को जुमले में परिवर्तित कर आमजन के साथ मज़ाक किया जाता है।
इनदिनों एक दिन Hug दिवस मतलब झप्पी दिवस की भी शुरुआत हो गई है। Hug दिवस को स्पष्टता से समझना हो तो इसे आलिंगन दिवस कहतें हैं।
अपने देश के उदारमना व्यक्तित्व ने पडौसी देश के प्रमुख के साथ गलबहिया कर मित्रता की मिसाल प्रस्तुत की। यह मित्र और झप्पी दिवस को संयुक्त रूप से मनाने का एहतिहासिक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति! अर्थात् एक मैं ही हूं दूसरा सब मिथ्या है। न मेरे जैसा कभी कोई आया न आ सकेगा।
बहरहाल भौतिकवादी युग में इस तरह विभिन्न दिन तय किए गएं हैं।
बाजारवाद के बढ़ते वर्चस्व के कारण मुकर्रर दिनों के लिए संदेश बनाकर व्हाट्सएप पर मुहैया कर रखें हैं, साथ संदेशों को एक दूसरें को हार्डकॉपी के रूप में भेजने के लिए रँगबिरगी आकर्षक कार्ड भी बाजार में उपलब्ध किए गए हैं।
हर उस व्यक्ति का तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिसने इस आपाधापी के युग में खासकर देश के अभिजात्य वर्ग के लिए अपने माता-पिता, भाई-बहन,दादा-दादी, नाना-नानी और मित्रों का स्मरण करने के लिए विशेष दिन मुकर्रर किए हैं।
अन्यथा इस भौतिकवादी युग में समयाभाव के कारण लोग,अपनों के लिए सदभाव प्रस्तुत करने में भी असमर्थ हैं।
इतंजार है एक दिन मानवता दिवस भी मुकर्रर होगा। मानवता दिवस मुकर्रर होंने पर हम एक दिन तो कम से कम अपनी मानवता का फैशनेबल ही सही प्रदर्शन तो कर पाएंगे।
इंतजार है, मानवता दिवस का?
जब लोगों के जहन में मानवता जागृत हो जाएगी तब सद्भावना प्रकट करने के लिए विभिन्न दिनों की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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