अशफाक अहमद
सबसे पहले बात इस पर कि चुनाव सपा भाजपा के बीच हुआ है, बसपा वाले कितने भी दावे करें.. वे फ्रेम में कहीं नहीं है। अलबत्ता अपना आधारभूत वोट वे जरूर बरकरार रखेंगे और छठे सातवें चरण की कई सीटों पर बसपा ने त्रिकोणीय लड़ाई भी बनाई है। एक सच आपको बताता हूं.. यूपी में करीब 3.8 करोड़ आबादी मुसलमानों की कही जाती है जिसमें ढाई करोड़ के ऊपर तो वयस्क मतदाता होंगे ही और चूंकि इनमें ज्यादातर वोट डालने वाले निम्न/निम्न मध्यमवर्गीय हैं तो साठ प्रतिशत यानि मोटे तौर पर एक करोड़ चालीस लाख तक तो वोट डालते ही हैं। यह वोट पिछले बीस-पच्चीस सालों में सपा/बसपा/कांग्रेस के बीच बंटते रहे हैं। इस बार यह 75+ प्रतिशत से ऊपर ही सपा के फेवर में गये हैं जिसका फायदा सपा को होना तय है।
हालांकि एक मुस्लिम वोटर के तौर पर हम चुनाव के टाईम सपा से कहीं ज्यादा बसपा पर भरोसा करते हैं क्योंकि बसपा का वोटर स्टिक रहता है जबकि सपा वाले का पता नहीं चलता कि कब हिंदुत्व का झुनझुना बजाने लगे। फिर इस बार सब सपा के पक्ष में क्यों लुढ़के? वजह योगी का शासन था जिसने काफी हद तक मुसलमानों को त्रस्त किया और मुस्लिम इससे बचने के लिये बेचैन हुए। अगर मायावती समय रहते यह भरोसा दिलातीं कि वे भाजपा से लड़ने में मुख्य विपक्ष हैं तो यह वोट उनकी तरफ शिफ्ट हो जाती लेकिन वे पांच साल भाजपा के बजाय सपा पर हमले करती रहीं और घुमा फिरा कर भाजपा की हां में हां मिलाती रहीं। इससे हमें लगा ही नहीं कि उन्हें कहीं से भाजपा का विकल्प बनने में दिलचस्पी है, जबकि अखिलेश ने भी पांच साल विपक्ष के तौर पर किया तो कुछ नहीं लेकिन भाजपा पर अटैक करते रहे, उतना भी कम नहीं था। पांच साल विपक्ष के तौर पर सबसे ज्यादा सक्रियता कांग्रेस ने दिखाई, सबसे ज्यादा मेहनत की लेकिन उसके जीतने की उम्मीद नहीं थी तो हमें मजबूरन सपा के पक्ष में जाना पड़ा।
किसान आंदोलन से पहले भाजपा अपनी तमामतर नाकामियों के बावजूद अपराजित थी और दूर-दूर तक कोई आसार नहीं थे कि वह आज वाली स्थिति में पहुंचती लेकिन किसान आंदोलन में अपनाये अड़ियल रवैये और किसानों के खिलाफ इनके समर्थकों का बर्ताव जाटों के एक बड़े वर्ग को नाराज कर गया, किसानों के मंच पर 13 से बंटे जाट मुस्लिम वापस एक होने शुरू हुए और काफी हद तक मुजफ्फरनगर की खाई पटी। अब इन भाजपा से नाराज जाटों को बलियान वाले भाजपाई नेतृत्व के बजाय जयंत के नेतृत्व में भरोसा पैदा हुआ। अखिलेश ने बिना देर किये जयंत को अपने साथ ले लिया। इससे पूरे पश्चिमी यूपी की तस्वीर एकदम बदल गई।
इन दो प्वाइंट्स ने आम लोगों को यह मैसेज दे दिया कि भाजपा के खिलाफ लड़ाई में मुख्यतः सपा है न कि बसपा। इसका असर यह हुआ कि चुनाव से पहले बाकी दलों से सपा की तरफ बड़े पैमाने पर शिफ्टिंग शुरू हो गयी। इसके साथ ही 300 यूनिट बिजली, भर्तियों का वादा और सबसे बढ़ के ओपीएस का वादा उन तमाम लोगों को सपा के पाले में ले आया जो इन मुद्दों के दायरे में आते थे। इससे सब मिला के जो धारणा बनी, उसने पहले-दूसरे चरण में पहली नजर में दिखने वाली बढ़त बनाई और इससे हुआ यह कि जो आगे के चरणों का फ्लोटिंग/स्विंगिंग वोटर था या वह जो हमेशा सत्ता के साथ जुड़े रह कर मलाई चाटने वाला वर्ग रहा है.. वह भी सपा के पक्ष में लुढ़का।
अब इतने सबसे यह तो क्लियर हो गया है कि छठे-सातवें चरण को छोड़ बाकी सभी चरणों में फाईट वन ऑन वन हुई है। जीता कौन है, यह अनुमान लगाना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि किसान आंदोलन से पहले अपराजित दिखती बीजेपी बाद में बने हालात के चलते कमजोर तो हुई है लेकिन कितनी कमजोर हुई, इस बारे में एग्जेक्ट तस्वीर दस तारीख को ही क्लियर होनी है लेकिन मेरे अनुमान के मुताबिक सात से दस प्रतिशत का वोट शेयर उसने गंवाया है और लगभग हर जिले में अपनी जीती हुई सीटों में औसतन दो तो हारी ही हैं। इस गणित से डेढ़ सौ सीटों की शिफ्टिंग हुई लगती है लेकिन सपा यह सब हासिल कर के भी दो सौ के आसपास ही दिखती है, ऐसा तो नहीं लगता कि वह एकदम बहुमत से चालीस-पचास सीटें ऊपर हो जायेगी। होने को यह भी हो सकता है कि इसी गणित से वह एक सौ सत्तानवे ही रह जाये और भाजपा बसपा को साथ लेकर बहुमत बना ले, चाहे इसके लिये उसे सीएम पद मायावती को ही सौंपना पड़े।
अब संभावनाओं के हिसाब से देखें तो सपा के पास एक मौका था कि जनता उसे सीधा और स्पष्ट बहुमत दे जबकि भाजपा के पास आजकल तीन मौके होते हैं। पहला कि जनता ही क्लियर मेंडेट दे दे, दूसरा कि भले सबसे बड़ी पार्टी गोवा/मणिपुर की तरह कोई और बने लेकिन बहुमत न छू पाये तो राज्यपाल के सपोर्ट से वह सरकार बना ले और बाद में विधायक सेट कर ले, सेट करने का तरीका आपको पता ही है। तीसरा तरीका है बिहार वाला.. अगर आखिरी चरण तक सपा फाईट में ही दिख रही, बजाय क्लियर बहुमत के, तो नजदीकी अंतर वाली सारी सीटों पर प्रशासन के सहयोग से बिहार वाला खेल हो जायेगा और सपा चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती। प्रशासन नजदीकी अंतर वाली सीटों पर कैसे खेल कर लेता है इसे एक उदाहरण से समझाता हूँ।
दो निकाय चुनाव से पहले हमारे यहां एक वकील कांग्रेस से पालिकाध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे थे जबकि सामने सपाई विधायक थे, कांग्रेस जीत गई लेकिन इधर लखनऊ से शिवपाल चच्चा ने फोन घुमाया और पूरा अमला लेट गया। सपा को विनर घोषित करके मतगणना सम्पन्न करा दी गयी। हम कांग्रेस के साथ थे और प्रत्याशी वकील था.. अड़ गया। हम धरने पर बैठ गये.. काफी तमाशा हुआ और दो दिन बाद उसे जीत दी गयी.. लेकिन वह निकाय चुनाव था, विधानसभा में ऐसी सुविधा नहीं मिलती। यहां एक बार सरकार बन गई तो फिर आप धरना नहीं आत्मदाह कर लीजिये, नतीजा बदलेगा तभी, अगर उस सीट से सरकार की सेहत पर प्रभाव न पड़ रहा हो।
तो कुल मिला कर सपा अनएडजस्टेबल मार्जिन से अगर दो सौ दस तक जीत रही होगी तभी उसकी सरकार बनेगी, वर्ना बाकी दोनों कंडीशन में भाजपा भले सपा से पिछड़ जाये मगर सरकार फिर बना ले जायेगी।
अब दस तक हमें अपने-अपने बस्ते लगा कर अनुमान ही परोसने हैं.. तो लीजिये पेश है मेरा बस्ता





