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अप्रैल फूल का भावभीना बयान

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सुसंस्कृति परिहार
होली के बाद मौज मस्ती का एक उल्लास, अप्रैल फूल आने पर भी देखने को मिलता था , लेकिन अप्रैल फूल आने के बाद भी आज सन्नाटा पसरा हुआ देख मैं परेशान हो गई ।सीधे जा पहुंची उसके पास ।वह बहुत परेशान नज़र आया मुझे देख बहुत शर्मिंदा भी हुआ देखकर लगा वह ठगा सा महसूस कर रहा है ।आख़िर क्यों! क्या हुआ उसे ? वैसे इस बार होली में भी चुहलबाज़ी देखने को नहीं मिली । ना हीं ज्यादा शोर शराबा शायद चुनाव के कारण हो।और, अब अप्रैल फूल ने भी उम्मीद पर पानी फेर दिया । मुरझाया- मुरझाया सा अप्रैल फूल । मैं अवाक ! सोचने लगी –क्या वैलेंटाइन डे की तरह उसे विदेशी करार तो नहीं दिया गया है । पर कहीं कोई हल्ला- गुल्ला तो सुनाई नहीं दिया ये कैसे हो सकता है ? फिर सोचा हाल-चाल पूछ ही लूं । मैंने कहा क्या हुआ भाई बोलो क्यों रोनी सूरत बनाए हो ?वह कुछ ना बोला ,कुछ ना बोला अपनी ही धुन में मगन रहा । मैं फिर बोली, अरे भाई कुछ तो बोलो ।अजी ,गलत बोल दिया हमारे देश में घुसपैठियों से भाई नहीं कह सकते । यहां तो भाई कहने पर माफी मांगनी पड़ जाती है जबकि एक पूरा प्रांत गुजरात ऐसा भी है जहां सिर्फ भाई- बेन संबोधन ही चलता है। खैर देश में जो चलन होगा वही तो कहेंगे ना । यहीं रहना है पाकिस्तान थोड़ी जाना है ।अजी, अप्रैल फूल जी कहें ,तो मान जाएंगे ना ।लो फिर भूल हो गई पता नहीं किस देश के आतंकी हो तुम ।हमारे देश में घुस आए हो ‘जी’ भी नहीं कहेंगे गलती हो गई । देशवासियो माफ करना ।क्या कीजिएगा बिहारियों के साथ रहते- रहते जी कहने की आदत पड़ गई वे तो लड़ते झगड़ते गालियां देते समय भी जी कहना नहीं छोड़ते ।अप्रैल फूल अब तक खामोश था । मेरी पेशानियों पर बल उभर आए थे।वह निर्विकार रहा । मैं चीख पड़ी- अजीब हाल है तुम्हारा एक तो मैं खामोशी का सबब पूछ रही हूं । तुम्हारे ग़म में ग़ुसार हूं और एक तुम हो कि घास भी नहीं डाल रहे ।मुझे याद आया घास लाओगे भी कहां से ?सारा चारा तो लालू जी खा गए और अब सब गोबर साफ़ करने में लगे हैं।
मैं बुरी तरह की झल्ला उठी। जाओ भाड़ में ,मुझे क्या लेना देना ? वैसे भी देश में संवेदनशील होना गुनाह हो गया है । चलती हूं, ओढ़े रहो मायूसी ।कोई नहीं पूछेगा तुम्हारा हाल ? पड़े रहोगे यूं ही ।आलम यूं ही उदास है ,एक तुम से आस थी । वह भी खत्म।
मेरा इतना कहते ही वह फुर्ती से आंखें पोंछते हुए बरबस उठ खड़ा हुआ।उसने जब बोलना शुरू किया तो मैं हतप्रभ रह गई ।उसका दर्द इतना भारी था ,कैसे सह रहा था सुनो तो , सहम जाओगे ।वह बोला -मैं तो बेखटके विदेशी धरती से इस देश में कब से आ रहा था कि यह सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र जैसे लोगों का देश है ।सत्यमेव जयते यहां का प्रमुख सरकारी मंत्र है ।सत्यम शिवम सुंदरम यहां का आदर्श वाक्य है। यहां सदैव असत्य पर सत्य की जीत का इतिहास है। सत्य की ताकत सत्याग्रह दुनियां को बापू दिखा गये ।ऐसे देश में कम से कम एक दिन झूठ बोलकर मनोरंजन तो कर ही सकते हैं’ फूल’ यानी मूर्ख बना सकूं तो मज़ा आ जाता ।हंसी ठठ्ठा हो जाती , थोड़ी मस्ती भी ।पर पिछले आठ साल से यहां जो बदलाव आया है उसमें अब मेरी ज़रूरत किसे है ?यहां तो निरंतर पंचवर्षीय फूल योजना देख कर स्तब्ध हूं ।कहां एक दिन और कहां पांच साल ।अभी उन्हें और चाहिए पांच साल ।उसके बाद तब सब तरफ ‘फूल’ कमल वाले होंगे।अब मेरी क्या बिसात ? मूर्खता के समंदर की कीच में वे शान से खिलेंगे।क्या कहा समंदर की कीच में! हां हां तब तक उसका हाल ही गंगा की तरह ही हो जायेगा । यहां मेरा क्या काम ? वह उड़ा और चला गया पाकिस्तान की ओर ।हम ताक़ते रह गये ।उस बेचारे को सलाम भी नहीं कह पाये । अप्रेल फूल चला गया और मैं सोच में डूबती चली गई बेशक अब वह नहीं आएगा क्या करेगा आकर यहां जहां फ़ूलों का डेरा हो और जनता उसमें आनंदित हो।तभी पास खड़े एक व्यक्ति का अट्टहास गूंजा अप्रेल फूल तुम आओगे वेलेंटाइन डे की तरह चुपके-चुपके मिलने पूरा विश्वास है। भावुकता छोड़ो ग्लोब्लाईज़ेशन ज़िंदाबाद।

Ramswaroop Mantri

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