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आधारभूत चिंतन : अस्ति~ नास्ति का शाश्वत विवाद और इंसान

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डॉ. प्रिया

_कभी -कभी इतिहास का रास्ता इतना लम्बा होता है कि स्मरण में उतना ही रह जाता है, जितना रखने की कोशिश की जाती है._
    पिछले दिनों से जो धूल धुआं और प्रवचन चल रहे थे, मैं भीड़ वाद से परे हट कर कुछ कहना चाह रही थी, जिससे मैं जो तर्क उपस्थित कर रही हूं, वह नामी गिरामी विद्वानों के पास तक पहुंच सके, यह बात अलग है कि वे ध्यान न देने का दिखावा करें।
      सबसे पहले तो इस बात पर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगी कि हम अपनी सहूलियत के अनुसार शब्दों के अर्थ ग्रहण करते हैं।
   _सबसे बड़ा उदाहरण है, आस्तिक और नास्तिक शब्द, जिनका धड़ल्ले से उपयोग किया जाता है, आस्तिक का मतलब गाड पर विश्वास करने वाला, और नास्तिक का अर्थ विश्वास न करने वाला, पाश्चात्य अर्थ में यह जितना साधारण विवेचना लगती है, भारतीय दर्शन परम्परा में उतनी ही गफलत भरी।_
    चलिए हम ठेठ पूर्वी या फिर कहें तो भारतीय दार्शनिक परम्परा के अनुसार शब्दों को समझें.
    वैदिक ऋचाओं में लोक, शास्त्र , दर्शन और जन इतिहास सब आपस में गुंथे हैं, क्यों कि वे संहिताएँ है, भिन्न भिन्न ऋषियों द्वारा भिन्न काल में रची गई हैं। लेकिन दर्शन शास्त्रों की विवेचना के साथ ही वे सब भारतीय दार्शनिक परम्परा को पूर्णतया स्पष्ट करती है।  
 _आज हम केवल षड दर्शन शास्त्रों के नाम से परिचित हैं, जबकि  और नास्तिक के रूप में चार्वाक की कुछ उक्तियां ही मिलती हैं, जबकि कहा जाता है कि एक काल में बारह दर्शन विचार थे, जिनमें से केवल छह उपलब्ध हैं, जी हाँ हम अपना बहुत अधिक मात्रा में साहित्य खो चुके हैं।_
     जो षड दर्शन आज उपलब्ध हैं, उन्हें सामान्यता बाद के विवेचन कर्ता आस्तिक की श्रेणी में मान लेते हैं, जब कि अन्तस नियम के अनुसार दर्शन शास्त्रों में उस शास्त्र को ही आस्तिक माना जाता है, जो वेद को प्रमाण माने । यानी कि ब्रह्म की अवधारणा पर विश्वास करे।

इस भेद के अनुसार सांख्य, न्याय वैशेषिक भी शुद्ध आस्तिक नहीं हैं, क्यों ये जगत कर्ता के रूप तर्क पेश करते हैं। जैसे की सांख्य में तीन शक्तियों का उल्लेख है, तदेक , प्रकृति और जीव, हालांकि इस विचार धारा के मन्त्र ऋग्वेद और अथर्ववेद में मिलते हैं, नासदीय सूक्त में भी यह भाव प्रस्फुटित होता हैं, इस विचार के अनुसार तदेक वह शक्ति है जो सृष्टि का कारण हो सकती है, लेकिन संसार का क्रियाकलाप प्रकृति और जीव के बीच चलता है, तदेक केवल दृष्टा है।
इस भाव को बाद के अनेक सन्त कवियों ने भी अपनाया, जब कबीर कहते है्, एक तरवर दो पंछी, तो वे इसी अर्थ की व्याख्या करते हैं।
शुद्ध आस्तिक वेदान्तियों ने इस तरह के तर्कों को नास्तिक माना है।
बाद में स्मृतियों के काल तक सब सब कुछ घालमेल सा हो गया, क्यों कि वेदों के स्थान पर पुराणों ने एक अलग ही विचार धारा को अपना लिया,

बहुत काल से हमारे वैचारिक चिन्तकों ने पाश्चात्य के उस अर्थ को स्वीकार कर लिया, जिसमें सीधा भेद हैं, ईश्वर को मानने वाला और ईश्वर को ना मानने वाला.
नास्तिक मात्र वे नहीं है, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते, अपितु वे भी हैं, जो तर्क के साथ स्वीकारते हैं.
[चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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