शशिकांत गुप्ते
श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुवर बिमल जसु
जो दायकु फल चारि।
अर्थ- श्री गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है।
हनुमान चालीसा के प्रारंभ में संत तुलसीबाबा ने गुरु वंदना में उक्त दोहा कहा है।
गुरु की कृपा से चारों पुरुषार्थ का फल सहज प्राप्त होता है।
इनदिनों धर्म का समन्वय अर्थ के साथ स्थापित किया जा रहा है।
धर्म को भिन्न मतावलंबियों ने विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है।
साधारण रूप से ऐसा समझ में आता है कि,मानवों द्वारा मानवीय गुणों को आत्मसात करना ही धर्म है।
विद्वत जनों ने धर्म को इसतरह भी परिभाषित किया है, लोक,परलोक,के सुखों की सिद्धि हेतु, सार्वजनिक पवित्र गुणों और कर्मो का धारण और सेवन ही धर्म है
कुलमिलाकर सद्गुणों को अंगीकृत करना ही धर्म है।
वर्तमान में धर्म की पहचान झंडे के साथ भोंगे से हो रही है।
यह कोई विवाद का विषय नहीं है? यह तो देश के संविधान द्वारा प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का निर्भीकता से अभिव्यक्त किया जा रहा पालन हो रहा है?
इसे ध्वनि प्रदूषण भी नहीं कहना चाहिए। यह तो शुद्ध रूप से धार्मिक आस्था को प्रकट करने का अत्याधुनिक माध्यम है।
काम और मोक्ष दोनों पुरुषार्थ विपरीत प्रकृति के हैं, लेकिन अपने देश में एक स्वयंभू भगवान अवतरित हुए हैं। सयोंग से वे आचार्य भी रहें हैं। ऐसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त व्यक्तित्व ने काम को समाधि के प्राप्ति का मार्ग निरूपित किया है। समाधि एक अवस्था है, इस अवस्था में व्यक्ति अपने स्थूल देह को भूलकर देह में होते हुए भी विदेह की स्थिति में पहुँच जाता है।
Complete forgetfulness of gross body
समाधि का दूसरा अर्थ होता है,व्यक्ति का सारे सांसारिक बंधनो को त्याग कर सदेह समाधिस्थ हो जाना। उदाहरणार्थ मात्र 21 या 22 वर्ष की आयु में संत ज्ञानेश्वर समाधिस्थ हुए हैं।
भक्तिमार्ग में लीन संत तुलसीबाबा की राम के प्रति अनन्य भक्ति थी।
तुलसीबाबा रामचरितमानस में चारों पुरुषार्थों के विषय में क्या लिखतें हैं?
अरथ न धरम न काम रुचि
गति न चहउँ निरबान।
जनम-जनम रति राम पद
यह बरदानु न आन॥
भावार्थ:-मुझे न अर्थ की रुचि (इच्छा) है, न धर्म की, न काम की और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ। जन्म-जन्म में मेरा श्री रामजी के चरणों में प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं।
मो सम दीन न दीन हित
तुम्ह समान रघुवीर
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर
तुलसीदास कहते हैं-हे रघुवीर, मेरे जैसा कोई दीन हीन नहीं है, गरीब नहीं है। और आपके जैसा कोई दीन हीनों का भला करने वाला, हित करने वाला नहीं है। ऐसा विचार करके, हे रघुवंश मणि मेरे जन्म-मृत्यु के भयानक दुःख को दूर कर दीजिए।
तुलसीबाबा स्वयं राम के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखतें हैं।
राम भगवान से यही मांगते हैं कि,
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम
तिमि रघुनाथ निरंतर
प्रिय लागहु मोहि राम
भावार्थ जैसे काम के अधीन कामुक व्यक्ति को नारी प्यारी लगती है और लालची व्यक्ति को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे हीं हे रघुनाथ, हे राम, आप मुझे हमेशा प्यारे लगते रहिए।
उपर्युक्त विचारों पर गम्भीरता से विचार विमर्श होना चाहिए।
वर्तमान महौल को ध्यान में रखते हुए साथ ही यह कलयुग इसे यह भी न भूलते हुए विचार विमर्श होना चाहिए।
अंत में यही कहकर पूर्ण विराम लगता है।
जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी
शशिकांत गुप्ते इंदौर





