( सरला माहेश्वरी की कविता )
भविष्य रुका हुआ है तुम्हारे लिये,
ओ लेनिन !
बस इतना याद है
देखा था तुम्हें इन आँखों ने
फिर क्या हुआ
कुछ भी तो याद नहीं
बस याद है वो जो
सोचा था देखने से पहले कि
कहूँगी मैं भी तुमसे कि
उट्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो
काखं-ए-उमरा के दरे-दीवार हिला दो
पर फिर सोचा ! नहीं …
चुपके से जैसे मीर ने कानों में कहा…
सिरहाने ‘मीर’ के आहिस्ता बोलो …
पर दिल है कि मानता नहीं था
बार-बार आती थी याद कि…
तुम होते तो क्या होता…
वो इस बात पर क्या कहते
वो उस बात पर क्या कहते
एक क़दम आगे, दो क़दम पीछे
या दो क़दम आगे…
या शायद
बिना कुछ कहे ही
सब कुछ समझ जाते
सारी बीमारियों की पड़ताल
बस एक नाड़ पकड़ कर लेते !
याद आती बर्नाड शॉ की
ये मत समझो कि लेनिन नहीं हैं
कि लेनिन कोई अतीत नहीं है
ओ लेनिन !
तुम तो हो जिंदगी की उम्मीदों का सूरज !
कानों में गूँज रही थी
तुम्हारी ही आवाज
“फिर भी रात के आगे दिन की हार अभी भी नहीं हुई,
अभी भी कब्र का विजय-उत्सव ज़िदगी को नेस्तानाबूद नहीं करता।
अभी भी राख के बीच चिनगारी धीमी-धीमी जल रही है,
ज़िदगी अपनी साँस से फिर उसे जगाएगी।”
यहाँ साहिर गा रहे थे
वो सुबह कभी तो आएगी…!
भगतसिंह जेल की दीवार पर लिख रहा था –
लेनिन ज़िंदाबाद !
और सुकांत भट्टाचार्य रहा था लिख-
‘क्रांति से धड़कते दिल में लगता है जैसे मैं ही हूँ लेनिन’
ओ लेनिन !
भविष्य रुका हुआ है तुम्हारे लिये !
Arun Maheshwari






