अग्नि आलोक
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गीत गाता चल…?

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शशिकांत गुप्ते इंदौर

आज सुबह मोबाइल पर कॉल आया। कॉल रिसीव किया और हैलो कहतें हुए पूछा, कौन?
अंकल मै ज्ञानेश बोल रहा हूँ।
सीतारामजी का बेटा
हॉ बोलो ज्ञानेश क्या हुआ
अंकल आप अभी हमारे घर आ सकतें हैं?
हाँ हाँ क्यों नहीं लेकिन बात क्या है?
अंकल आप आजाइए सब बताता हूँ।
मै जल्दी तैयार होकर सीतारामजी के घर गया, तो क्या देखता हूँ। सीतारामजी पुरानी फिल्मों के गीत सुन रहें हैं।
ज्ञानेश ने मुझे कहा अंकल देखों ने पिताजी को क्या हो गया है?
मैने कहा क्या हुआ? सीतारामजी तो पुरानी फिल्मों के गीत ही तो सुन रहें हैं इसमें इतना क्यों परेशान हो रहें हो?
उसी भाभीजी( सीतारामजी की पत्नी) बाहर आई और कहने लगी पुरानी फिल्मों के गाने सुनने से परेशानी नहीं है,ये तो सारे Sad Song सुन रहें हैं। घर में हमेशा हँसी खुशी का माहौल होना चाहीए लेकिन ये दुःख भरे गीत सुन रहें हैं। वह भी तेज आवाज में।
मुझे आश्चर्य हुआ हास्यव्यंग्य का लेखक आज इतना खिन्न क्यों हो गया है?
जब मैने सीतारामजी के पास बैठ कर गाने सुने तो मुझे सखेद आश्चर्य हुआ।
आज सीतारामजी जो गाने सुन रहे थे वे इसतरह के गाने हैं।
सन 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म एक साल यह गीत जिसे लिखा है, गीतकार प्रेम धवनजी ने।
न पूछो प्यार की
हमने जो हकीकत देखी
वफ़ा के नाम पे
बिकती हुई उल्फ़त देखी
किसी ने लूट लिया और
हमें खबर न हुई
खुली जो आँख तो बर्बाद
मुहब्बत देखी
सब कुछ लुटा के होश
में आये तो क्या किया
दिन में अगर चराग़
जलाये तो क्या किया
पत्थर पे हमने फूल
चढ़ाए तो क्या किया
सीतारामजी ने इस गीत के तुरंत बाद यह गीत सुनाया।
सन 1961 में प्रदर्शित फ़िल्म नज़राना का गीत इसे लिखा है,गीतकार शैलेंद्रजी ने
एक वो भी दीवाली थी,
एक ये भी दीवाली है
उजड़ा हुआ गुलशन है,
रोता हुआ माली है
बाहर तो उजाला है,
मगर दिल में अँधेरा
समझो ना इसे रात,
ये है ग़म का सवेरा
क्या दीप जलाएँ हम,
तक़दीर ही काली है
उजड़ा हुआ गुलशन है,
रोता हुआ माली है
ऐसे ना कभी दीप किसी दिल का बुझा हो
मैं तो वो मुसाफ़िर हूँ जो रास्ते में लुटा हो
ऐसे ना कभी दीप किसी दिल का बुझा हो

मै सीतारामजी से पूछना चाहता था कि आज क्या हो गया है? आप ऐसे गाने क्यों सुन रहें हैं?
उन्होंने मेरी बात का जवाब तो नहीं दिया और म्यूजिक सिस्टम पर यह गाना शुरू कर दिया।
अलबेले दिन प्यारे
मेरे बिछड़े साथ सहारे
हाय! कहाँ गए
आँखों के उजियारे
मेरी सुनी रात के तारें
कोई लौटा दे मेरे …
मेरे ख्वाबों के महल
मेरे सपनों के नगर
पी लिया जिनके लिए
मैने जीवन का जहर
यह सुन मैने क्रोध में कहा अब आप यह कहर ढाना बंद करों।
मेरा क्रोध देखकर सीतारामजी थोड़े सामान्य हुए।
मैने पूछा यह क्या हो गया आपको ऐसे दुःखद गाने सुन रहे हो।
सीतारामजी ने शायराना अंदाज में जवाब दिया।
आबाद नहीं, बर्बाद सही
गाता हूँ खुशी के गीत मगर
ज़ख्मों से भरा सीना है मेरा
हंसती है मगर ये मस्त नज़र

भाभीजी चाय बिस्कुट लेकर आई और कहने लगी अच्छा हुआ आप आगए भाई साहब।
सुबह से ना तो इन्होंने चाय पी ना ही कुछ नाश्ता किया।
सीतारामजी ने सहज होते हुए कहा कि आप तो जानतें हैं, मै व्यंग्यकार हूँ। पिछले दो तीन दिनों से व्यंग्य लिखने के लिए कोई विषय ही मिल रहा था।
सिर्फ हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था।
मैने कहा मतलब हनुमानजी ने आपको प्रेरित किया गानों के माध्यम से यथार्थ प्रकट करतें हुए व्यंग लिखने के लिए।
मेरा जवाब सुनकर सीतारामजी अपनी वाली पर आते, इसके पहले ही मै,राम रामजी कहतें वहाँ से विदा हो गया।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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