अग्नि आलोक
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ईरानी मज़दूर-सबीर हका जिन्होंने इन कविता के ज़रिए अपनी व्यथापूर्ण बात कहे हैं

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शहतूत…
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क्या आपने कभी शहतूत देखा है ?
जहां गिरता है, उतनी ज़मीन पर
उसके लाल रस का धब्बा पड़ जाता है.
गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं !
मैंने कितने मज़दूरों को देखा है
इमारतों से गिरते हुए,
गिरकर शहतूत बन जाते हुए…!
—-
ईश्वर…
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ईश्वर भी एक मज़दूर है…!
ज़रूर वह वेल्डरों का भी वेल्डर होगा….!
शाम की रोशनी में
उसकी आंखें अंगारों जैसी लाल होती हैं…!
रात उसकी क़मीज़ पर
छेद ही छेद होते हैं……!
—–
करियर का चुनाव
_

मैं कभी साधारण बैंक कर्मचारी नहीं बन सकता था …!
खाने-पीने के सामानों का सेल्समैन भी नहीं…!
किसी पार्टी का मुखिया भी नहीं ….!
न तो टैक्सी ड्राइवर …!
प्रचार में लगा मार्केटिंग वाला भी नहीं…!

मैं बस इतना चाहता था
कि शहर की सबसे ऊंची जगह पर खड़ा होकर
नीचे ठसाठस इमारतों के बीच उस औरत का घर देखूं
जिससे मैं प्यार करता हूं ….!
इसलिए मैं बांधकाम मज़दूर बन गया…..!
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आस्था…
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मेरे पिता मज़दूर थे …!
आस्था से भरे हुए इंसान….!
जब भी वह नमाज़ पढ़ते थे…!
अल्लाह उनके हाथों को देख शर्मिंदा हो जाता था….!

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                      घर
                ___________

मैं पूरी दुनिया के लिए कह सकता हूं यह शब्द
दुनिया के हर देश के लिए कह सकता हूं ..!
मैं आसमान को भी कह सकता हूं …!
इस ब्रह्मांड की हरेक चीज़ को भी….!
लेकिन तेहरान के इस बिना खिड़की वाले किराए के कमरे को …!
नहीं कह सकता….!
मैं इसे घर नहीं कह सकता…!
—-
इकलौता डर…
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जब मैं मरूंगा
अपने साथ अपनी सारी प्रिय किताबों को ले जाऊंगा…..!
अपनी क़ब्र को भर दूंगा…..!
उन लोगों की तस्वीरों से जिनसे मैंने प्यार किया….!
मेरे नये घर में कोई जगह नहीं होगी …!
भविष्य के प्रति डर के लिए…!
मैं लेटा रहूंगा, मैं सिगरेट सुलगाऊंगा
और रोऊंगा उन तमाम औरतों को याद कर
जिन्हें मैं गले लगाना चाहता था….!

इन सारी प्रसन्नताओं के बीच भी
एक डर बचा रहता है….!
कि एक रोज़, भोरे-भोर,
कोई कंधा झिंझोड़कर जगाएगा मुझे और बोलेगा –
“अबे उठ जा सबीर ! अब जल्दी से काम पे चलना है.! “

   साभार -सबीर हका,ईरानी मज़दूर

 संकलन - निर्मल कुमार शर्मा गाजियाबाद उप्र संपर्क-9910629632

Ramswaroop Mantri

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