अग्नि आलोक
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*काल चिंतनम् : अथ ज्ञानवापी कथाकूटम्‌

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-पुष्पा गुप्ता —————-

   _मेरी अल्प समझ से हिंदू (सनातन) धर्म की दो मूल मान्यताएँ हैं : संकल्प-सत्ता और अधिकारी-भेद। संकल्प सत्ता और कुछ नहीं, दृढ़ विश्वास है। दृढ़ विश्वास चेतना की एक अवस्था है, भावजगत्‌ का एक घटक। किंतु दृढ़ विश्वास का फल भौतिक जगत्‌ को भी प्रभावित करता है। मनुष्य को अमूर्त सत्ता के जिस किसी रूप में दृढ़ विश्वास होता है, वही रूप उसके विश्वास का फल देता है। उसका भौतिक मनोरथ भी पूरा करता है (या उसके पूरा होने में सहायक बनता है)।_
   मूर्ति-पूजा का यही आधार है। मूर्ति उस अमूर्त सत्ता की प्रतीक है जो मनुष्य की चेतना में संकल्पित है, उसके भावलोक में उपस्थित है, जिस पर उसे दृढ़ विश्वास है। प्रतीक के रूप में मूर्ति एक सहारे का काम करती है। आराधक की चेतना में जिस सत्ता की जिस रूप में संकल्पना है, आराधक की चेतना में उसको उसी रूप में साकार करने में सहायक बनती है।
   _मूर्ति की आराधना उस सत्ता की आराधना है जो आराधक की चेतना में निहित है और वही सत्ता उसे मनोवांक्षित फल देती है।_
  संकल्प या विश्वास की अहम भूमिका होने से हिंदू धर्म की आराधना-पद्धति में (सैद्धांतिक रूप से) बहुत लचीलापन, अपूर्व उदारता और अतिशय सहिष्णुता है। जो जिस रूप में पूजे, उसे उसी रूप से मनोवांछित फल मिलेगा-- 

“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।“ ~गीता, 4:11॥
[जो जिस रूप में मुझे अपनाते हैं, मैं उनको उसी के रूप में ग्रहण करता हूँ। हे अर्जुन, सभी मनुष्य मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।]

इसीलिए सनातन धर्म में धर्म-परिवर्तन से विस्तार की कोई अवधारणा नहीं है।
श्लोक का उत्तरार्द्ध अधिकारी-भेद की ओर भी इंगित करता है जो सनातन का दूसरा मूल तत्व है। सभी मनुष्य समान क्षमता और समान प्रवृत्ति के नहीं होते। इसलिए सबका मार्ग अलग-अलग होना स्वाभाविक है।
कोई ज्ञान-मार्ग का अधिकारी है तो कोई कर्म मार्ग का तो कोई भक्तिमार्ग का। जीवन के लक्ष्य–धन-ऐश्वर्य, यश-कीर्ति, स्वर्ग-नर्क, पुनर्जन्म, मोक्ष आदि सभी अधिकारी-भेद के अनुरूप हैं।
निर्गुण-सगुण या निराकार-साकार भी अधिकारी-भेद के विषय हैं।

“न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्‌। कामये दु:खतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्‌॥
~महाभारत से।
[न मैं राज्य की कामना करता हूँ, नस्वर्ग की, न ही आवागमन से मुक्ति अर्थात्‌ मोक्ष की। मैं तो बस दु:ख़ से परितप्त प्राणियों की पीड़ा दूर करना चाहता हूँ।]
राजा रन्तिदेव जैसे प्रजाप्रेमी राजा इसी मार्ग के अधिकारी थे।

संस्कृत में धर्म शब्द धृ धातु में मन्‌ प्रत्यय लगाकर बनता है—ध्रियते लोकोsनेन, धरति लोकं वा इति धर्म:। जो लोकों को, ब्रह्माण्ड को धारण करता है वही धर्म है। वैदिक साहित्य में धर्म के लिए ऋत शब्द का प्रयोग होता था। ऋग्वेद के ऋत सूक्त में सृष्टि के संदर्भ में ऋत और सत्य शब्द साथ-साथ प्रयुक्त हुए हैं—
ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः।। समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद् विश्वस्य मिषतो वशी।। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्‌। दिवं च पृथिवीं चाSन्तरिक्षमथो स्वः।।
(ऋग्वेद 10.190.1-3).
इस सूक्त के अनुसार तप (उर्जा या ऊष्मा) से सम्पन्न हुई सृष्टि में सबसे पहले ऋत और सत्य प्रकट हुए। ऋत का अर्थ होता है उचित, स्थिर और निश्चित नियम या दिव्य नियम। यूनानी परम्परा का Natural Law. ऋत का स्थानापन्न होने से धर्म का भी वही अर्थ अभिप्रेत है।
इस अर्थ में धर्म से परे कुछ हो ही नहीं सकता। किसी के लिए भी। इसीलिए मैं मज़हब या religion या सम्प्रदाय के अर्थ में धर्म शब्द के प्रयोग से बचता हूँ जब कि व्यवहार में हिंदू समाज भी इधर एक मज़हब-जैसा ही बनने की दिशा में उन्मुख है।
यह सर्वमान्य है कि वैदिक काल में मंदिर और मूर्ति-पूजा का कोई विधान नहीं था। प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के प्रतीक देवों की स्तुतियाँ थीं और उन्हीं के प्रसाद के लिए यज्ञादि क्रियायेँ प्रचलित थीं।

चूँकि वैदिक काल में मूर्ति और मंदिर नहीं थे, वैदिक धर्म की पुन:प्रतिष्ठा करने का दावा करने वाला दयानंद सरस्वती प्रणीत आर्यसमाज मंदिर और मूर्तिपूजा को वैदिक धर्म का अज्ञानमूलक विचलन मानता है। आर्यसमाजी भाई सनातनियों के मंदिर और मूर्ति-पूजा को त्याज्य मानते हैं किंतु कुछ मुस्लिम आक्रमणकारियों और शासकों द्वारा उनके ध्वंस से ख़फ़ा रहते हैं, वे तो उन्हीं का काम कर रहे थे, भाई।

संस्कृत में मूर्ति, विग्रह, प्रतिमा, लिङ्ग (चिह्न) सब एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। मूर्ति बनती है, पत्थर या मिट्टी या धातुओं से या ख़ास तरह की मिश्रधातु से। मूर्तिकार पत्थर की मूर्ति बनाने के लिए, ख़ासकर उसकी मुखमुद्रा पर वांछित भाव उकेरने के लिए, एक टाँग या जाँघ से उसे दबाकर बहुत कल्पनाशीलता, निपुणता और सावधानी से छैनी चलाता है।
पत्थर की मूर्ति जब बन रही होती है, वह पत्थर ही होती है। बनकर तैयार होने पर भी वह पत्थर ही रहती है। ढोकर स्थापित करने की जगह लाये जाने तक भी पत्थर ही रहती है। मंदिर में उसे स्थापित कर, शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से मंत्रोच्चारण द्वारा “प्राणप्रतिष्ठा” की जाती है—
“अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा क्षरन्तु च। अस्यै देवत्वमर्चार्यम मामेहन्ती च कश्चन्‌॥“
इसके बाद ही वह मूर्ति या प्रतिमा या शिवलिङ्ग के रूप में मान्य होती है। विडंबना है कि मनुष्य ही प्रतिमा में शिव की प्राणप्रतिष्ठा करता है, फिर मनुष्य ही मृत्यु से रक्षा के लिए उस प्रतिमा की आराधना करता है—
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात्‌॥
(महामृत्युञ्जय मंत्र)।

तो सनातनी हैं मूर्तिपूजक और मुसलमान हैं मूर्तिभञ्जक, बुतशिकन, बुतपरस्ती को क़ुफ़्र माननेवाले। (काबा के पवित्र पत्थर को छोड़कर) सभी प्रस्तर-मूर्तियाँ उनके लिए पत्थर हैं जिनकी पूजा उनके मज़हब में वर्जित है।
_फिर मुसलमान सनातनियों की तरह धर्म-परिवर्तन को भी वर्जित नहीं मानते बल्कि अपना मज़हबी कर्तव्य मानते हैं। आर्यसमाजियों के ‘शुद्धीकरण’ में अन्य धर्मावलंबियों को ‘अशुद्ध’ मानने के तर्ज़ पर सभी इतर धर्मावलंबियों को गुमराह मानते हैं और उन्हें सही रास्ते पर लाना पुण्य का कार्य समझते हैं.

   अन्य की चाहे जो राय हो, मुझे कोई संदेह नहीं कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। कारण चाहे जो रहा हो, यह काम औरंगज़ेब ने ही किया था। इतना अवश्य है कि कोई न कोई कारण अवश्य रहा होगा क्योंकि ऐसा तो कतई नहीं है कि औरंगज़ेब ने कभी एक ओर से सारे मंदिर तुड़वाने और उनकी जगह मस्जिद बनवाने का अभियान चलाया हो।
 _यह भी एक गुत्थी है कि यदि यह पुजारियों के किसी अपराध के चलते महज़ क़ानून-व्यवस्था का मसला था तो मंदिर को ध्वस्त करवाना पर्याप्त था, ठीक उसी जगह मस्जिद बनवाने की बात कानून-व्यवस्था के हवाले से पूरी तरह व्याख्यायित नहीं हो पाती।_
    जो भी हुआ रहा हो, वह तो हो चुका। और उसे हुए साढ़े तीन सौ साल के क़रीब बीत गये। कालांतर में थोड़ी दूर पर दूसरा मंदिर बन गया, उसमें प्राणप्रतिष्ठा हो गई, उसके गुम्बद पर सोने का छत्र भी लगा गया। 

समय बीतने के साथ सब कुछ सामान्य हो गया होगा, बस यह घटित हिंदुओं की स्मृति में जीवित रह गई हो गई। हो सकता है, उस स्मृति के साथ पराजय बोध की कचोट भी जुड़ी हो।
सबमें नहीं तो कुछ में। लेकिन सवाल यह है कि इधर ऐसी क्या बात हो गई कि मामला एकदम से उछल पड़ा? तात्विक रूप से कुछ नहीं।
माना कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारें इस पर चुप हैं और दावा कर सकती हैं कि इस मामले से उनका कुछ लेना-देना नहीं। कहा जा सकता है कि तकनीकी तौर पर यह मामला मुद्दई, मुद्दालैह और न्यायालय के बीच तक सीमित है।
लेकिन माहौल? इतने सालों बाद महौल कैसे बदल गया? क्या हुआ जिसने माहौल को एकाएक इस क़दर बिगाड़ दिया कि दोनों ओर के लोग ताल ठोंकने लगे??
अंग्रेजी की एक कहावत है—
Let the sleeping dogs lie.
और मेरे ख़्याल से इस कहावत में जबर्दस्त व्यावहारिक बुद्धिमत्ता है। किसी-किसी स्थिति में तो इसमें इंगित रास्ता अपरिहार्य हो जाता है। इसी में सबकी सलामती निहित होती है।

धर्म के बारे में एक तकनीकी सवाल मेरे मन में और उठता है। पता नहीं सही या ग़लत, कहते हैं, विवादित स्थल पर तरमीम की गई मस्जिद जायज़ नहीं होती और सामूहिक नमाज़ पढ़ने के क़ाबिल नहीं समझी जाती, जिस काम के लिए मुख्यत: मस्जिदों की तरमीम होती है।
दूसरा सवाल इसी से जुड़ा हुआ है। कोई मंदिर बना, उसमें मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा हुई, फिर किसी कारण से मंदिर ध्वस्त हो गया, मूर्ति खंडित हो गई, या जिस स्थान पर उसकी प्राणप्रतिष्ठा हुई थी, वहाँ से हटा दी गई।
ऐसी स्थिति में प्राणप्रतिष्ठा की प्रतिष्ठा बनी रहेगी या वह भी खंडित हो जायेगी? यदि खंडित हो जायेगी तो मूर्ति सही अर्थ में मूर्ति, धार्मिक प्रतीक, दैवी भावना की उत्प्रेरकरास्ता वगैरह कैसे बनी रहेगी ? वह तो पुन: पत्थर बन जायेगी जो वह मूलत: थी। आख़िर दूसरा मंदिर बन ही गया है और वहाँ विधिवत प्राणप्रतिष्ठा हुई ही होगी।

बुद्धिमत्ता तो इसी में लगती है कि दोनों फ़रीक़ैन सदाशयता का परिचय दें। इतिहास ने उन्हें सहजीवन के लिए नियतिबद्ध कर दिया है। सहजीवन की अनिवार्यता है कि परस्पर सदाशयता से रहें, उदारता और सौख्य भाव का परिचय दें।
जो हो चुका उसे भूलने की कोशिश करें। माहौल को और बिगाड़ने के बजाय उसे बेहतर बनाने की कोशिश करें। अगर कोई सोचता है कि दोनों के सहजीवन का कोई विकल्प है तो मेरी अल्प समझ से वह मूर्ख तो है ही, देशद्रोही भी है।
संस्कृत के उस प्रसिद्ध सुभाषित के साथ बात ख़त्म करती हूँ—
खादन्न गच्छामि हसन्न जल्पे गतं न शोचामि कृतं न मन्ये।
द्वाभ्यां तृतीयो न भवामि राजन्‌ किं कारणं भोज भवामि मूर्ख:॥
[मैं भोजन करते हुए चलता नहीं हूँ; जो बीत गया उसके बारे में सोचता नहीं हूँ; उपकार करनेवाले के प्रति कृतघ्न नहीं होता; दो लोग बात कर रहे हों तो उनके बीच घुसता नहीं; हे भोज महाराज, मैं किस कारण मूर्ख हुआ?]
तो बस गतं न शोचामि, गतं न शोचामि… याद रखें, शांतिपूर्ण समाधान निकल आयेगा।
[चेतना विकास मिशन}

Ramswaroop Mantri

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