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 केरल की वामपंथी सरकार ने शहीदे आजम भगतसिंह को शामिल किया आपने पाठ्यक्रम में

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,मुनेश त्यागी

     कुछ दिन पहले कर्नाटक सरकार ने शहीदे आजम भगत सिंह के चैप्टर को दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया था। अब खबर आई है कि केरल की वामपंथी सरकार ने भगत सिंह के विचारों को अपने पाठ्यक्रम में जगह दे दी है। पहले हमारी सरकारें विदेशी क्रांतिकारियों मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ, स्टालिन,  फिदेल कास्त्रो और चे ग्वेरा के विचारों से डरती थीं। उसके बाद में कबीर, तुलसी, निराला,रहीम, प्रेमचंद और फैज अहमद फैज से भी डरने लगीं थीं। 

    मगर केरल की सरकार वामपंथी सरकार है। वह उपरोक्त कवियों, दार्शनिकों और लेखकों के विचारों से डरती नहीं है, भगत सिंह के विचारों से डरती नहीं है और भगत सिंह के विचारों के अनुसार समाज का निर्माण करना चाहती है और असल में उनके विचारों का समाज बनाने के लिए वहां की सरकार भगत सिंह के विचारों को अमल में ला रही है, इसीलिए उसे भगत सिंह के विचारों से कोई डर नहीं लगता। 

क्योंकि केरल की सरकार भगत सिंह के विचारों को अमल में उतारना चाहती है और छात्रों के दिलो-दिमाग में भगत सिंह और साथियों के विचारों को उतारना और बसाना चाहती है, इसीलिए वहां की सरकार ने भगत सिंह को अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया है। केरल की  सरकार, हमारे देश के, दुनिया के, प्रगतिशील, जनवादी, धर्मनिरपेक्ष और क्रांतिकारी विचारों से डरती नहीं है 

     यहां पर यह देखना बिल्कुल उपयुक्त होगा कि केरल की सरकार ने भगत सिंह को अपने पाठ्यक्रम में क्यों शामिल किया? आइए देखें कि भगत सिंह के विचार क्या थे और वे और उनके शहीद साथीगण क्या चाहते थे? कैसा देश और समाज बनाना चाहते थे? हमारी आजादी के इतिहास में भगत सिंह और उनके साथी, सबसे पहले क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने आजादी के आंदोलन में सबसे पहले “इंकलाब जिंदाबाद” और “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” का नारा बुलंद किया, जिन्होंने लेनिन जिंदाबाद का नारा अदालत में लगाया, जिन्होंने रूसी क्रांति का अभिवादन किया, जिन्होंने बोल्शेविक क्रांति की प्रशंसा की। आखिर क्यों भगत सिंह और उनके साथी जब अदालत में जाते थे तो वे अपने गले में लाल रुमाल क्यों डाल कर जाते थे? वे ऐसा इसलिए करते थे क्योंकि वे भारत के समाज में आमूलचूल परिवर्तन करके, समाज में क्रांति के द्वारा मार्क्सवादी सिद्धांतों पर आधारित समाजवादी समाज कायम करना चाहते थे।

      आईये इस बारे में  महान क्रांतिकारी भगतसिंह के विचार को जानने की कोशिश करते हैं। भगत सिंह का कहना था कि हमारा उद्देश्य एक ऐसी क्रांति से है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण का अंत कर देगी। वे कहते हैं क्रांति के लिए खूनी लड़ाइयां अनिवार्य नहीं है, वह बम और पिस्तौल का संप्रदाय नहीं है, क्रांति से हमारा अभिप्राय है, अन्याय पर टिक्की मौजूदा सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करना।

      वे कहते हैं कि देश में आमूलचूल परिवर्तन चाहने वाले क्रांतिकारियों का कर्तव्य है कि वे साम्यवादी सिद्धांतों पर आधारित समाज का और समाजवादी व्यवस्था का पुनर्निर्माण करें, क्रांति से हमारा मतलब है एक ऐसी समाज व्यवस्था की स्थापना से है जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य होगा। वे आगे कहते हैं क्रांति केवल सतत कार्य करने से, लगातार कोशिशों से, कष्ट सहन करने से और बलिदानों से ही उत्पन्न की जाएगी। क्रांति की तलवार विचारों की धार से ही तेज होती है।

   शहीदे आजम भगत सिंह का मानना था कि क्रांति का साम्राज्य फैलाने के लिए नौजवानों को क्रांति का संदेश देश के कोने कोने में, कारखानों में, गंदी बस्तियों और गांव-गांव में फैलाना है और करोड़ों लोगों में क्रांति की अलख जगानी है। क्रांति प्रकृति से स्नेह करती है, जिसके बिना कोई प्रगति नहीं हो सकती। क्रांति ईश्वर विरोधी तो हो सकती है लेकिन मनुष्य विरोधी नहीं। क्रांति एक नियम है, एक आदेश है, एक सत्य है, इसके बिना व्यवस्था कानूनपरस्ती और प्यार और शांति स्थापित नहीं की जा सकती।

    भगतसिंह आगे कहते हैं कि क्रांति कुछ लोगों के,,, सामंतों के, पैसे वालों के, पूंजीपतियों के और धन्ना सेठों के, विशेषाधिकार खत्म कर देगी। क्रांति से ही देश को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आजादी मिलेगी। वे कहते हैं कि क्रांति का अर्थ है मौजूदा लुटेरे, अन्यायी, शोषणकारी और भेदभावकारी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ढांचे में  बुनियादी परिवर्तन करके समाजवाद स्थापित करना। हम सरकारी मशीनरी को अपने हाथ में लेना चाहते हैं और नए ढंग की सामाजिक रचना यानी मार्क्सवादी ढंग से समाज की रचना चाहते हैं। क्रांति एक आदमी के बस की बात नहीं है, यह सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से ही पैदा होती है और जनता को उसके लिए तैयार करना होता है।

    अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि पार्टी कार्यकर्ताओं को तैयार करने के लिए अध्ययन केंद्र खोलने होंगे और पुस्तकें छापनी होंगी, क्रांति को समझाने के लिए सीधा-साधा लेखन करने की जरूरत है और क्रांति के लिए किसानों और मजदूरों का समर्थन हासिल करने के लिए प्रचार प्रसार जरूरी है। वे एक बहुत ही अहम बात कहते हैं और जिस पर लोग जल्दी से विश्वास भी नहीं करेंगे। वे कहते हैं कि “अगर मैं जिंदा रहा तो मैं एक पार्टी बनाऊंगा और उसका नाम कम्युनिस्ट पार्टी रखूंगा।” भगत सिंह और उनके साथी रूस की क्रांति की तरह, भारत में भी किसानों और मजदूरों का राज्य कायम करना चाहते थे। भगत सिंह और उनके साथी भारत की जनता की एकता और हिंदू मुसलमान की एकता में पूर्ण रुप से विश्वास रखते थे और किसी भी कीमत पर उनकी एकता, एकजुटता और आपसी भागीदारी और भाईचारे को बनाए रखना चाहते थे।

     अपने विचारों को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं की समाजवादी सिद्धांतों के बारे में जनता को सचेत बनाने के लिए सादा और स्पष्ट लेखन बेहद जरूरी है। क्रांति यानी इंकलाब, पूर्ण आजादी का नाम है, जिसमें लोग आपस में मिलजुल कर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आजाद हो जाएंगे। हमारे शहीद चाहते थे कि हम एक ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहां न भूख हो, न गरीबी हो, न नग्नता हो, जहां न गरीबी हो, जहां न अमीरी हो, जहां न जुल्म हों, जहां न अन्याय हो, जहां बस प्रेम बस्ता हो, एकता हो, इंसाफ हो, आजादी हो और सुंदरता हो और व्यक्ति का व्यक्ति द्वारा, राष्ट्र का राष्ट्र के द्वारा, किसी भी प्रकार का शोषण पूर्ण रूप से खत्म हो जाएगा।

     हमारे शहीदों का उद्देश्य था कि संसार में पूर्ण स्वतंत्रता हो, कोई किसी पर शासन न करे, सभी जगह पर लोगों के पंचायती राज हों और प्राकृतिक संसाधनों पर सबका एक सा अधिकार हो और सबके विकास के लिए उनका प्रयोग हो। भगत सिंह एक बहुत बड़े लेखक थे, एक बहुत बड़े विचारक थे, एक बहुत बडे क्रांतिकारी समाजवादी दार्शनिक थे। भगत सिंह ने देश में क्रांति का आह्वान किया था और अंग्रेजों द्वारा लुटेरी साम्राज्यवादी व्यवस्था को खत्म करके समाजवादी व्यवस्था कायम करने का आह्वान किया था। इसीलिए उन्होंने विदेशी लुटेरे शासन का खात्मा करने के लिए “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” और इस लुटेरी व्यवस्था और विदेशी शासन को खत्म करने के लिए, “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा दिया था।

    भगतसिंह और उनके साथी, उसी के लिए लड़े, मरे और फांसी के फंदे पर चढ़ गए और देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व स्वाह कर दिया और देश की आजादी के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया और खुशी खुशी फांसी का फंदा चूम लिया। भगत सिंह ने अपने जीवन काल में किसी भी क्रांतिकारी से ज्यादा बल्कि सबसे ज्यादा 97 लेख लिखे हैं। अभी तक क्रांतिकारियों द्वारा लिखे गए 137 लेखों में 97 लेख भगत सिंह ने लिखे हैं। भगत सिंह के इन्हीं लेखों और विचारों के कारण हमारे देश में सांप्रदायिक सरकारें भगत सिंह के विचारों से डरती हैं। उनकी क्रांति की स्थापना से डरती हैं, उनकी क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी बनाने की प्रस्थापना से डरती हैं।

      भगत सिंह ने अपने लेखों में सभी प्रकार की सांप्रदायिकता, धर्मांधता और कट्टरता का विरोध किया था और इसके लिए उपाय बताया था कि मजदूरों की ट्रेड यूनियनें ही और वर्ग आधारित किसान और मजदूरों के संगठन ही इस सांप्रदायिकता का खात्मा कर सकते हैं। भगत सिंह और उनके साथियों ने ही सबसे पहले अपने व्यवहार में, अपने बर्ताव में और अपनी पार्टी में और अपने विचारों में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की नीव डाली थी। वे धर्मनिरपेक्षता के प्रबल समर्थक थे। पिछले दिनों जब कर्नाटक की वर्तमान सरकार ने भगत सिंह को अपने पाठ्यक्रम से निकाला था तो वह, भगत सिंह के इन्हीं विचारों  डर गई है, भयभीत हो गई है, और खौफजदा हो गई है।

     इसलिए भगत सिंह के हौंसले, जज्बे और विचारों को भलीभांति समझकर केरल सरकार ने भगत सिंह को पाठ्यक्रम शामिल करके कर्नाटक की सांप्रदायिक सरकार के भगत सिंह को पाठ्यक्रम से बाहर करने फैसले को, बहुत ही करारा और समुचित जवाब दिया है, ताकि छात्र छात्राएं भगत सिंह और हमारे शहीदों के बारे में, उनके विचारों के बारे में, सही जानकारी प्राप्त  सकें, उनके विचारों को पढ़कर क्रांतिकारी समाज क्रांति की स्थापना और समाजवादी समाज की स्थापना के अभियान में दिलोंदिमाग से जुट जाएं, इसलिए भगत सिंह को और उनके विचारों को छात्र-छात्राओं की नजरों लाने के लिए और और भारत में क्रांतिकारी समाजवादी जनवादी समाज काम करने के लिए केरल की सरकार ने भगत सिंह को अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया है जो बहुत ही काबिले तारीफ है और देश और दुनिया की परिस्थितियों के अनुकूल है, ताकि हमारे देश से शोषण, अन्याय, जुल्म, भेदभाव, गरीबी, भुखमरी, गैरबराबरी और भेदभाव का साम्राज्य खत्म किया जा सके।

      हम इसका तहे दिल से समर्थन करते है वर्तमान समाज में शांति, न्याय, समता, समानता समानता, धर्मनिरपेक्षता, आजादी और बराबरी का समाज स्थापित करने के लिए भगत सिंह के विचारों का पढना और इनको छात्र छात्र छात्राओं द्वारा जानना बहुत जरूरी है। हम केरल की सरकार के इस कदम की भूरी भूरी प्रशंसा करते हैं, तारीफ करते हैं। केरल की सरकार ने भगत सिंह को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करके पूरे हिंदुस्तान की वामपंथी शक्तियों का, पूरी दुनिया के वामपंथी, समाजवादी, जनवादी और धर्मनिरपेक्ष लोगों का दिल जीत लिया है।

      केरल की सरकार का यह काम एकदम काबले तारीफ और प्रशंसनीय है। हम इसकी भूरी भूरी प्रशंसा और वकालत करते हैं।

Ramswaroop Mantri

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