जूली सचदेवा
_जो शिक्षा प्रणाली अभी मौजूदा भारत और दुनिया मे चल रही है वो आने वाले कुछ सालों में पूरी तरह से समाप्त हो जाएगी.. भारत वाली “प्रारंभिक” शिक्षा प्रणाली तो लगभग हर यूरोपीय और अमेरिकन देशों में बंद ही हो चुकी है.. क्योंकि अब ये समझ मे आने लगा है कि ये पूरी तरह से अनैतिक और अप्राकृतिक है._
आप सोच के दखिये कि आप अगर इस समय इंजीनियर हैं तो आपने जो कक्षा एक से लेकर कक्षा आठ तक पढा था उसका आपकी इंजीनियरिंग में क्या योगदान है?
शून्य.. कुछ भी नहीं.. और अगर उस शिक्षा का कोई भी योगदान होता तो आपको किसी इंजीनियरिंग की प्रतियोगिता की ज़रूरत न होती.. आप सीधे इंजीनियर या डॉक्टर बन चुके होते.. यहां तक कि इंजीनियर और डॉक्टर बनने के लिए जो प्रतियोगिता होती है उस प्रतियोगता के लिए आप जो पढ़ते हैं उसका भी आपके इंजीनियर और डॉक्टर बनने में कोई योगदान नहीं होता है.
_कक्षा बारह तक अगर न भी मानें आप तो कक्षा आठ तक तो एकदम फ़ालतू के कोर्स और फालतू का बोझ होता है बच्चों पर.. क्योंकि ये सब अगर कोई ज़रूरी पढ़ाई होती तो हर स्कूल की एक होती.. जैसे डॉक्टरी की और अन्य प्रोफेशनल कोर्स की होती है.. डॉक्टरी में ये नहीं हो सकता है कि आप किसी स्कूल में कुछ और पढ़ेंगे और किसी मे कुछ और.. मगर कक्षा आठ तक तो हर स्कूल अपने हिसाब से पढ़ाता है और अपना कोर्स निर्धारित करता है.. सबकी किताबें अलग अलग होती हैं._
और यहीं से स्कूल वालों बिज़नेस शुरू होता है.. उदाहरण के लिए यहां लखनऊ के ही प्राइवेट स्कूल अगर आप देखें तो वो हर साल अपनी किताबें बदल देते हैं.. यहां तक कि ड्रेस में भी बड़ा बदलाव कर देते हैं.. अब ये किताबें क्यों बदलते हैं?
_वो इसलिए ताकि बच्चे आपस में किताबें बदल के आगे के क्लास में न जाएं.. हमारे टाइम में तो ये था कि मेरी माँ ने जो हिंदी की किताब पढ़ी थी वही हमारे क्लास में भी चलती थी.. इस तरह हर कोई अपनी किताब संभाल के रखता था और वो उसकी कई पीढियां पढ़ती थीं.. ग़रीब से गरीब आदमी पढ़ाई करवा लेता था इस हिसाब से.. लोग एक दूसरे को किताब दान कर देते थे._
अब चूंकि ये कोई निर्धारित और मान्य कोर्स तो होता नहीं है सिवाए बिज़नेस के इसलिए हर स्कूल अपने हिसाब से मैटेरियल तैयार करता है.
प्राइवेट स्कूल वाले इसीलिए अब बिल्कुल थोड़े से बदलाव हर किताब में हर साल कर देते हैं ताकि आप किताबों का पूरा सेट नया ख़रीदें.
_ड्रेस में भी बदलाव करते रहते हैं.. इस से उनको किताब वाली कंपनी से मोटा कमीशन भी मिलता है और ड्रेस वाली कंपनी से भी.. स्कूल की दीवारों पर ये गरीबों बेसहारों के लिए नारा लिखे रहते हैं मगर इनकी कोशिश एक ही होती है कि किसी तरह कोई ग़रीब इनके यहां पढ़ न पाए.. जो आये वो मोटी पार्टी ही आये और इनको इनकम होती रहे._
तो कक्षा आठ तक के सारे कोर्स और किताबें ये लोग तय करते हैं.. और अब नए नए स्कूल मार्किट में आ गए हैं.. कोई स्वीडन के हिसाब से पढ़ा है कोई स्विट्ज़रलैंड के हिसाब से, कोई स्पीच के हिसाब से पढ़ता है कोई साउंड के हिसाब से.. ये सब मार्केट और प्रचार का खेल है.
आपको कम होमवर्क चाहिए तो आप लखनऊ के स्टडीहाल स्कूल में जाइये, ज़्यादा पढ़ाई करवानी है तो CMS में जाईये, अगर चाहते हैं कि बिल्कुल होमवर्क न मिले तो स्वीडिश स्कूल Kunskapsskolan में जाईये.
_ये सब आपके मूड और पसंद के हिसाब से आपके बच्चों को पढ़ाएंगे.. क्योंकि ये सब ग़ैर ज़रूरी पढ़ाई है जो आपके हिसाब से तैयार की गई है पैसा कमाने के लिए.. और यही इनका बिज़नेस है.. बच्चे वो सब पढ़ें या न पढ़ें उस से उनके जीवन और बौद्धिक विकास में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.. इस से बस आपके “अहंकार” में फ़र्क पड़ेगा._
और “अहंकारवश” इस गैरजरूरी पढ़ाई को आप इतना ज्यादा सीरियस ले लेते हैं कि आपके बच्चे और और आपकी स्वयं की जिंदगी नर्क हो जाती है.. औरतें अपना सोशल सर्किल से लेकर सब कुछ त्याग देती हैं क्योंकि उन्हें अपने बच्चे को दिन रात पढ़ाना होता है.
स्कूल वाले जान बूझकर इतना बोझ लाद देते हैं ताकि आपको महसूस हो कि बच्चा कुछ बड़ी और अच्छी पढ़ाई कर रहा है.. स्कूल वाले पैरेंट्स को पूरी तरह से स्कूल के कार्यक्रमों और होमवर्क में पूरी तरह से व्ययस्त रखते हैं ताकि अभिभावकों को कुछ सोचने का वक्त ही न मिले और उन्हें लगे कि इतना ज़्यादा पढ़ाई, मतलब कुछ बहुत अच्छा सीख रहा है मेरा बच्चा.
_ये पूरा मनोवैज्ञानिक खेल है.. और ये खेल आपके हिसाब से डिज़ाइन किया गया है क्योंकि आप इस खेल को ऐसे ही खेलने का “आग्रह” करते हैं.. आप स्कूलों के हाथों की कठपुतली बने रहते हैं._
[चेतना विकास मिशन]




