,,,,,,,, मुनेश त्यागी
सरकार द्वारा शुरू की गई अग्निपथ योजना के दुष्परिणामों को लेकर भारत के अधिकांश राज्यों के लाखों नौजवान सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। सैकड़ों गाड़ियां और बसों को आग की लपटों के हवाले कर दिया गया है। कई प्रदेशों में रेलवे के संचालन पर रोक लगा दी गई है मगर प्रदर्शनों में कोई कमी नहीं आ रही है। यह नीति इतनी अपूर्ण और आधी अधूरी है कि सरकार को इसमें कई संशोधन करने पड़े हैं मगर प्रदर्शनकारियों ने सरकार के इस छलावे को पूरी तरह से नजर अंदाज कर दिया है और पूरी तरह से नकार दिया है।
अग्निपथ योजना का विरोध करते हुए इस योजना के विरोधी नौजवानों ने आज भारत बंद का आह्वान किया है। इस भारत बंद के आह्वान के मद्देनजर 500 से ज्यादा ट्रेनें कैंसिल कर दी गई हैं। एनसीआर में कई मार्गो पर जाम लगा हुआ है। देश के विभिन्न राज्यों केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि राज्यों में सतर्कता बरतने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।
अब सरकार के लोग इन प्रदर्शनकारियों को गुंडे, अपराधी और नासमझ और भड़के हुए बता रही है, उनके ऊपर आरोप लगा रहे हैं कि ये विपक्षी दलों का शिकार हो रहे हैं। जैसा किसान आंदोलन के किसानों को गुंडे, मवाली और अपराधी बताया जा रहा था। देश के प्रदर्शनकारी नौजवानों का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है कि सरकार की गलत नीतियों का विरोध करने वालों और अपने हकों की जायज मांग करने वालों को इस तरह से दर्शाया और प्रदर्शित किया जा रहा है?
शासक पार्टी के लोग और कई रिटायर्ड अधिकारी और अब तो सेना के बड़े अधिकारी, इस देश विरोधी नीति के, गुण दोष के आधार पर न देखकर, सरकार के पक्ष में इसके फायदे गिना रहे हैं और सरकार का पक्ष पोषण कर रहे हैं। दरअसल ये लोग देश सेवक नहीं बल्कि खुदगर्ज और पेटपूजक हैं। इस नीति का एकदम लागू किया जाना, कई सवाल खड़े करता है। आखिर इसे इस तरह से लागू करने की क्या जरूरत थी? देश के विपक्षी दलों और सांसदों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया? संसदीय प्रणाली को क्यों अंधेरे में रखा गया? ये शंकाएं कई सवाल उठाती हैं जिनका सरकार के पास कोई जवाब नहीं है।
इस नीति को लागू करने से कई सवाल पैदा होते हैं। सरकार इस नीति को एक साजिश के तहत तो नहीं ला रही है और वह आर एस एस के एजेंडे को पूरा तो नहीं करना चाहती है। चार साल बाद बेकार हुए इन सैनिकों को हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा मिस यूज करके समाज की शांति और समरसता को गंभीर खतरा तो पैदा नही किया जाएगा और इटली और जर्मनी की फासीवादी ताकतों की तरह इनका गलत इस्तेमाल तो नही किया जायेगा? इसकी बहुत गंभीर आशंकाएं पैदा हो गई हैं।
देश की खराब हालत को देखकर यह कहना पड़ेगा कि सरकार को सेना भर्ती की नई नीति अग्नीपथ को तुरंत निरस्त कर देना चाहिए। इससे भारत के राष्ट्रीय हितों को बहुत भारी नुकसान होने वाला है। यह योजना भारत के राष्ट्रीय हितों के सब प्रकार से खिलाफ है। पेशेवर सशस्त्र बलों को चार साल की संविदा पर सैनिकों को भर्ती करके तैयार नहीं किया जा सकता। इससे हमारे सैनिकों, सेना और सशस्त्र बलों की गुणवत्ता और कुशलता के साथ समझौता होगा। इस देश विरोधी अग्नीपथ योजना को तुरंत निरस्त करके पुरानी भर्ती प्रणाली शुरू की जाए।
भारत में सेना में ठेका प्रथा को लागू करना, कम वेतन देकर युवाओं का शोषण करना है तथा यह सेना में आर एस एस के लिए पिछले दरवाजे से प्रवेश का तरीका है। यह हमारे करोड़ों बेरोजगार नौजवानों के साथ विश्वासघात है। इस योजना पर तुरंत संसद का अधिवेशन बुलाकर संसद में विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। यह योजना युवाओं के भविष्य और देश का भविष्य पूरी तरह से खतरे में डालती है और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करती है। मोदी सरकार ने “वन रैंक वन पेंशन” की बात की थी, मगर अब वह पूरी तरह से मुकर गई है और अब देश विरोधी और खतरनाक स्तर पर उतर आई है।
अग्नीपथ योजना की डिबेट में सरकारी पक्ष द्वारा एक बहुत बड़ा झूठ फैलाया जा रहा है की 4 साल की नौकरी के बाद अग्नि वीरों को विभिन्न विभागों में नौकरी मिल जाएगी। मगर आंकड़े कहते हैं कि इस वक्त हमारे देश में करीब 26 लाख पूर्व सैनिक हैं। 2019 तक लगभग 5 लाख 70 हजार पूर्व सैनिकों ने नौकरी का आवेदन किया जिसमें सिर्फ 14,165 पूर्व सैनिकों को ही नौकरी मिल पाती। यह है सरकार के झूठ की पोल। जनता को सरकार द्वारा पेश किए जा रहे आंकड़ों से सावधान रहना चाहिए और अग्निपथ की योजना पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं करना चाहिए।फौज के निजीकरण करने की यह योजना बिल्कुल भी, देश हित में नहीं है। इसे सरकार को तत्काल प्रभाव से वापस लेना चाहिए।
पिछले 2 साल से कोई भर्ती नहीं हुई है जहां कई लाख पद खाली पड़े हैं। नियमित सैनिकों की भर्ती के बजाय ठेके पर सैनिकों की भर्ती की योजना, उनके लिए चार साल के बाद नौकरी की कोई संभावना नहीं है। यह एक खतरनाक स्थिति पैदा करती है, जहां यह सेवानिवृत्त सैनिक निजी मिलिशिया की सेवा कर सकते हैं। यह सब हमारे पहले से ही गंभीर तनाव में चल रहे सामाजिक ताने-बाने पर खतरनाक और गंभीर प्रभाव डालता है।
इस अग्नीपथ योजना को लेकर हमारी फौज के अधिकारी भी बंटे हुए हैं। जहां कई अधिकारी इस योजना का समर्थन कर रहे हैं और इसे देश हित में बता रहे हैं, वहीं कई पूर्व सैनिक और सेना अधिकारी इस योजना को देश विरोधी बता रहे हैं वह कह रहे हैं कि यह योजना देश हित में नहीं है। यह सेना की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाएगी। सेना के हथियार चलाने में जो दक्षता और अनुभव चाहिए, वह दक्षता मात्र 4 साल में नहीं आ सकती। उसके लिए छः सात साल का प्रशिक्षण और अनुभव जरूरी है। इसके बिना वे आधुनिक हथियार नहीं चला सकते।
यहीं पर एक और विचलित करने वाला तथ्य सामने आया है। अग्नीपथ के विरोधी नौजवान सरकार की और उसके मंत्रियों की बात नहीं सुन रहे हैं। सरकार के आश्वासनों का उन पर कोई असर नहीं हो रहा है। इसलिए सरकार ने अपनी बात को पुख्ता रूप से कहने के लिए, सेना के तीनों अध्यक्षों को मैदान में उतारा है और वे इस योजना की खूबियां जनता को बता रहे हैं, मगर अग्नीपथ योजना के विरोधी नौजवान उनकी बातों को भी सुनने को तैयार नहीं है। यह भारत की राजनीति में एक नया मगर खतरनाक ट्रेन्ड है। सेना को इस प्रकार की गतिविधियों से दूर रखना चाहिए।
हमारे युवाओं को न्यूनतम सुरक्षा के बिना ही सर्वोच्च बलिदान देने के लिए तैयार रहने का आह्वान करना, जनता और नौजवानों के लिए एक गंभीर अपराध है। देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे हिंसक विरोध प्रदर्शन इस देश विरोधी योजना के खिलाफ गुस्से का प्रदर्शन करते हैं
समय की मांग है कि इस अग्निपथ योजना को तत्काल समाप्त किया जाए और सशस्त्र बलों की भर्ती पुराने तरीके से तुरंत शुरू की जाए। हम तो यहां यही कहेंगे ,,,,,
पहले ,,
वन रैंक वन पेंशन,
अब,,,,
नो रैंक नो पेंशन
आज,,,,
खतरे में है पूरा नेशन
यहां तो है,,,,
बस टैंशन ही टैंशन।





