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सुप्रीमकोर्ट के निर्णयों में न्याय का विलोपन क्यों ?

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निर्मल कुमार शर्मा

वर्ष 2013के मई महीने में भारतीय सुप्रीमकोर्ट ने कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले मामले में सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट में तत्कालीन कांग्रेसी कानून मंत्री अश्विनी कुमार के हस्तक्षेप को लेकर सीबीआई को फटकार लगाते हुए कहा था कि “सीबीआई एक पिंजरे का तोता बनकर रह गई है,जो हमेशा अपने मालिक की आवाज़ बोलती रहती है,सीबीआई स्वतंत्र नहीं हैं,ऐसे में वह निष्पक्ष जांच कैसे कर सकती है,इस तोते को आजाद कराना है,सीबीआई एक स्वायत्त संस्था है,उसे अपनी स्वायत्तता बरकरार रखनी चाहिए, सीबीआई को एक तोते की तरह अपने मास्टर की बातें नहीं दोहरानी चाहिए,आपको मतलब सीबीआई को अपने दिमाग का इस्तेमाल करना चाहिए,आपको खुद को चट्टान की तरह सख्त बनना चाहिए,लेकिन आप रेत की तरह भुरभुरे हैं,हम बहुत प्रोफेसनल,बहुत उच्च कोटि की,बेहद सटीक जांच चाहते हैं ! “
आज ठीक 9साल बाद जरा ईमानदारी और निष्पक्ष होकर विचार करिए कि आज से ठीक 9साल पूर्व सीबीआई को इतनी नसीहतें देनेवाले भारतीय सुप्रीम कोर्ट की आज मोदीराज में क्या स्थिति हो गई है ? इस देश में सरेआम दंगे -फसाद भड़काने के लिए इस सरकार के गुंडे मंत्री सरेआम “गोली मारो सा..को ” नारे लगाते हैं, सुप्रीमकोर्ट के जजों को सरेआम “अपनी हद में रहने की सलाह देते हैं !” गुंडे मंत्री का माफिया, आवारा बेटा सरेआम किसानों पर गाड़ी चढ़ाकर उन्हें रौंदकर मार देता है,एक दंगाई को अपराध मुक्त कराने से इंकार करने पर एक सीबीआई जज तक की सुनियोजित हत्या तक कर दी जाती है, उस दु:खद घटना की निष्पक्ष और न्यायोचित जांच तक नहीं होने दी जा रही है,एक अपराधिक पृष्ठभूमि का दागी प्रधानमंत्री अभी हाल ही में हुए दंगे की सूत्रधार अपने राजनैतिक दल की एक महिला प्रवक्ता को अतिरिक्त पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाता है ! और एक गुंडे से एक राज्य का मुख्यमंत्री बना व्यक्ति इससे भड़के दंगे के कथित अपराधियों के घरों को बुलडोजरों से दिन-दहाड़े ध्वस्त कर देने के कुकृत्य को यही सुप्रीमकोर्ट बेशर्मी से यह कहता हो कि वह “उत्तर प्रदेश में बुलडोजर एक्शन को रोक नहीं रहा है। हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने कहा कि कोई भी कार्रवाई कानून से इतर नहीं हो और बिल्कुल निष्पक्ष हो ! ” अब यक्षप्रश्न है सुप्रीमकोर्ट इस अत्यंत महत्वपूर्ण गैरकानूनी,असंसदीय व असंवैधानिक मामले में किस “कानून से इतर और निष्पक्षता की बात कर रहा है ? ” किसी आरोपित के घर को एक अपराधिक पृष्ठभूमि का मुख्यमंत्री द्वारा बगैर आरोप साबित हुए ही सरेआम बुलडोजरों से दिन-दहाड़े उनके घरों को विध्वंस्त करने के कुकर्म को आप किस कानून के तहत विध्वंस को न रोककर सरेआम बेशर्मी से उस कुकृत्य को जारी रखने की सलाह दे रहे हैं !

सत्ताधारियों के पिंजरे के तोते आज कौन -कौन ?

 हकीकत यह है कि आज सीबीआई ही नहीं अपितु सुप्रीमकोर्ट खुद “वर्तमान सत्ताधारियों के पिंजरे का पूर्णतः तोता बन चुका है !” बाकी संस्थाएं मसलन सीबीआई,इनकमटैक्स प्रवर्तन निदेशालय,दिल्ली पुलिस आदि न्यायसंगत और निष्पक्ष आवाजों को अपने बूटों तले दमन के लिए जर्मन शेफर्ड कुत्तों की तरह बन गए हैं,जो अपने सत्ताधारी मालिकों के केवल एक इशारे पर बगैर एक सेकेंड का वक्त गंवाए अपने वैचारिक विरोधियों की गर्दन दबोचने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं ! इसी देश में सांसदों,विधायकों की करोड़ों-अरबों रूपयों में खरीद-फरोख्त करके जनता द्वारा निर्वाचित सरकारों को गिराने का कुकृत्य हो रहा है,इतना होने के बावजूद वर्तमान चुनाव आयोग की आत्मा तक नहीं जगती ! चुनाव आयोग की आत्मा और स्वाभिमान तो श्री टी एन शेषन जैसे बहादुर चुनाव आयुक्त के बाद बिल्कुल मर ही गई है ! वह वर्तमान सत्ता के कर्णधारों बिल्कुल नपुंसक,नाकारा और दुमहिलाऊ कुत्ता ही बन चुका है !

                पुराने जमाने में,कुछ अपवाद स्वरूप यथा वैशाली,कपिलवस्तु,रोम आदि को छोड़कर,जहाँ उस प्राचीनकाल में राजा का चुनाव भी गणतांत्रिक ढंग से ठीक पांच साल के लिए होता था,भारत में 1947 के ठीक पूर्व तक  और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कहीं-कहीं अभी भी राजे-रजवाड़े राज्य करते थे और इंग्लैंड, जापान आदि देशों में आधुनिक समय में अभी भी राजा-रानी हैं। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था के ठीक विपरीत उस समय किसी राज्य के राजा के मृत्यु के उपरांत राज्य की बागडोर सदा राजा के उत्तराधिकारियों यथा उसके पुत्र,पुत्रियों या कोई निकट संबंधी के ही हाथ में जाना निश्चित होता था । समय ने करवट लिया और अब कुछ अपवादों को छोड़,दुनिया के अधिकांश देशों में उस प्राचीनकाल के राजा-रजवाड़ों के युग का अंत हो गया और अब ‘लोकतांत्रिक व संसदीय ‘व्यवस्था के तहत संसदीय व गणतंत्रीय शासनकाल की शुरूआत हुई, जिसमें पुराने राजाओं की तरह राज्य की बागडोर पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित न होकर केवल 5 वर्ष के लिए जनता अपने मताधिकार के अधिकार के तहत ‘जनप्रतिनिधियों ‘ का चुनाव करती है। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी विचलन से बचाने के लिए कुछ स्वायत्त लोकतांत्रिक नियामक संस्थान जैसे सुप्रीम कोर्ट,रिजर्व बैंक,सीबीआई,चुनाव आयोग,राष्ट्रीय साँख्यिकी आयोग आदि बनाए गए हैं।

  सुप्रीमकोर्ट के जजों का चयन बिल्कुल गैरकानूनी और असंवैधानिक   

            अभी पिछले दिनों कुछ राष्ट्रीय स्तर के सुप्रतिष्ठित समाचार पत्रों में एक बहुत ही दुःखी,स्तब्ध और चौंकाने वाले कुछ तथ्यात्मक रिपोर्ट वाले समाचार प्रकाशित हुए हैं,जिनके अनुसार भारतीय राष्ट्र राज्य के सबसे बड़े स्वायत्त लोकतांत्रिक नियामक संस्थान न्यायपालिका यथा हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के जजों के चयन में घोर अनियमितता,लोकतान्त्रिक नियमों की अवहेलना व असंसदीय व्यवहार के बारे में सूचना इस देश की 140 करोड़ जनता के संज्ञान में आया है । समाचार पत्रों की रिपोर्ट के अनुसार आज न्यायपालिका में न्यायालयों में पूर्व में पदासीन रहे उच्च पदस्थ लोगों यथा हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट में पदासीन रहे भूतपूर्व जजों के परिवार वाले ही मसलन उनके बेटे,भतीजे या रिश्तेदार ही वर्तमान में भी जज बने बैठे हैं ! इस रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में आज भी मुख्य जज सहित कुल 31जज हैं,जिनमें 6 जज पूर्व जजों के बेटे ही बेशर्मी से बैठाए गए हैं । इसके अलावे देश के अन्य 13 हाईकोर्ट्स में भी जज के पद पर आसीन 88 जज भी किसी न किसी भूतपूर्व जज,वकील या न्यायपालिका से जुड़े किसी रसूखदार व्यक्ति के परिवार या रिश्तेदार ही हैं ! इस रिपोर्ट का श्रोत सुप्रीमकोर्ट की अधिकारिक वेबसाइट और अन्य 13 हाईकोर्ट्स के डाटा पर आधारित है,भारत के शेष हाईकोर्ट्स के डाटा आश्चर्यजनक रूप से उपलब्ध ही नहीं है ! इस रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि सुप्रीमकोर्ट में इस देश के ‘कुछ 250 से 300 विशेष घरानों ‘ के लोग ही हमेशा से जज बनते चले आ रहे हैं। यह उनका ‘खानदानी अधिकार ‘बन गया है। सबसे दुःखद और क्षुब्ध करने वाली बात यह है कि भारत के 135 करोड़ जनसंख्या वाली आम जनता के परिवारों के तीक्ष्णतम् ,कुशाग्रतम् बुद्धि और अति उच्चतम् मेधावी युवा-युवतियों के लिए भी सुप्रीमकोर्ट में जज बनने के रास्ते को इन कुछ गिने-चुने घरानों के लोगों ने पूर्णतः अवरूद्ध कर रखा है !

       उक्त रिपोर्ट में मुंबई हाईकोर्ट के एक मजे हुए, प्रसिद्ध कानूनविद् व्यक्ति द्वारा नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन  यानी एन.जे.ए.सी.एक्ट को चुनौती देते हुए कॉलेजियम सिस्टम के असंवैधानिकता और अलोकतांत्रिक रवैये पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए सुप्रीमकोर्ट में याचिका लगाने का भी जिक्र है।इस रिपोर्ट में सुप्रीमकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम पर संशय व्यक्त करते हुए कहा गया है कि यह सिस्टम बहुत ही रहस्यमयी,गुप-चुप और अपारदर्शी तरीके से काम करता है । यहाँ के उच्च न्यायपालिका में रिक्त हुए पदों का न तो कभी नोटिफिकेशन जारी होता है,न उसका कभी किसी मिडिया आदि में विज्ञापन निकलता है ! अभी पिछले दिनों सुप्रीमकोर्ट के बार एसोसिएशन के एक प्रतिष्ठित एडवोकेट ने कॉलेजियम सिस्टम की कमियों और पक्षपातपूर्ण दुर्नीतियों पर करारा हमला बोलते हुए कहा था कि ‘इस सिस्टम में सुयोग्य और क़ाबिल लोगों की पूर्णतः अवहेलना की जाती है और सुप्रीमकोर्ट में ऐसे ‘नाकारा और अयोग्य ‘लोगों की नियुक्ति की जाती है,जिनके ताल्लुकात न्यायपालिका, राजनीति और समाज में दमदार, रसूखदार और प्रभावशाली लोगों से होती है ! ये नाकारा और अयोग्य लोग उक्त वर्णित ‘कथित बड़े लोगों ‘ के भाई-भतीजे-रिश्तेदार या खानदान और परिवार के होते हैं।

        अब सुप्रीमकोर्ट में मुख्य जज और अन्य 30 जजों की वर्तमान नियुक्ति की कार्यप्रणाली पर दृष्टिपात करें। इस प्रक्रिया में मुख्य जज सहित अन्य सभी 30 जजों की नियुक्ति के लिए भारत का राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 124 (2) के तहत कार्यवाही करता है। मुख्य जज की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार,कृपया यहां ‘इच्छानुसार ‘शब्द पर ध्यान दीजिए ! वह पहले से नियुक्त सुप्रीमकोर्ट के अन्य जजों से सलाह लेता है  सुप्रीमकोर्ट के जजों के चुनाव में अर्हता मतलब योग्यता के लिए सामान्यतः अन्य सभी भारतीय सिविल सेवाओं जैसे ही नियम हैं यथा वह भारत का नागरिक हो,वह कम से कम 5 साल तक किसी उच्च न्यायालय में जज रहा हो या वह राष्ट्रपति की राय में 10 वर्ष किसी कोर्ट में प्रतिष्ठित वकील के रूप में वकालत किया हो आदि-आदि।इसी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों की अनुशंसा पर भारत का राष्ट्रपति सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्याधीश का चयन कर देता है। इसी प्रकार अन्य 30 जजों की चुनावी प्रक्रिया में राष्ट्रपति महोदय सुप्रीमकोर्ट के मुख्य जज से किसी जज या किसी कथित प्रतिष्ठित वकील के नाम देने का अनुरोध करते हैं। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का मुख्य जज अपनी इच्छानुसार सुप्रीमकोर्ट के ही चार जजों के समूह से उस व्यक्ति के बारे में विचार-विमर्श करके,उनकी अनुशंसा के आधार पर उस व्यक्ति विशेष का नाम भारतीय राष्ट्रपति को प्रस्तावित करके भेज देता है और राष्ट्रपति महोदय उसे सुप्रीम कोर्ट का जज चुन लेते हैं !

        उक्त सभी रिपोर्ट्स को ध्यानपूर्वक अध्ययन करने पर भारत का कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति यह सहज में ही अनुमान लगा सकता है कि सुप्रीमकोर्ट और अन्य हाईकोर्ट्स में जजों के चुनाव की प्रक्रिया में ‘सब कुछ ‘राष्ट्रपति,मुख्य जज और अन्य जजों के ‘इच्छानुसार ‘और उनके ‘विवेकानुसार ‘ ही होता है। जजों के चुनावी प्रक्रिया में कहीं भी लोकतांत्रिक,संवैधानिक, योग्यता आदि मूल्यों का कहीं रंचमात्र भी इसमें जरा भी कहीं भी नाममात्र का भी उल्लेख नहीं है।इसीलिए देश के तमाम हाईकोर्ट्स और सुप्रीमकोर्ट में पूर्व जजों,वरीष्ठ वकीलों और मात्र 250 से 300 खानदानों के ‘कुछ कथित कुलदीपक या लाडले ‘ न जाने कितने दिनों से अपने बाप,चाचा,मामा और फूफा के सिफारिश पर जज बने बैठे हैं ! इस पर तुर्रा यह कि इन सिफारिश पर बन बैठे जजों को इनकी अयोग्यता, इनके भ्रष्टाचार,इनके पक्षपात इनके दुर्व्यवहार आदि कदाचारों पर इनको हटाने की प्रक्रिया बेहद जटिलतम् और दुष्कर है। मसलन ऐसे कतिपय कदाचारी जजों को भी पद से हटाने के लिए बाकायदा संसद की दो-तिहाई बहुमत से पारित किए और लाए गए प्रस्ताव के माध्यम से ही भारत का राष्ट्रपति ही इन्हें मदमुक्त कर सकता है,जबकि संसद में यह दो-तिहाई सांसदों का बहुमत लाना ही लगभग बहुत ही दुष्कर,कठिन और टेढ़ी खीर की बात है ! कल्पना करें कितने दुःख,हास्यास्पद और आश्चर्य की बात है कि भारत जैसे देश में कोई रसूखदार मंत्री का बेटा साधारण सी एल.एल.बी की परीक्षा उत्तीर्ण करके किसी कोर्ट में 10 साल सफलतापूर्वक वकालत कर ले,उसके बाद वह अपने बाप के रसूख के बल पर राष्ट्रपति महोदय की नजरोंं में ‘एक प्रतिष्ठित वकील ‘भी आसानी से बन जाएगा फिर उसे सुप्रीमकोर्ट के 30 जजों में अपना स्थान बनाते हुए सुप्रीमकोर्ट के सीधे मुख्य जज का शपथ राष्ट्रपति महोदय द्वारा लेकर माननीय सुप्रीमकोर्ट का माननीय मुख्य जज बन सकता है ! और उसके किंचित कदाचार पर,उसे हटाने के लिए करोड़ों आमजन द्वारा चुनी संसद के दो-तिहाई सांसदों द्वारा पारित प्रस्ताव के द्वारा ही केवल और केवल भारतीय राष्ट्र राज्य का सबसे बड़ा नौकरशाह राष्ट्रपति ही हटा सकता है ! यह विधान भी भारतीय लोकतंत्र का एक ‘नायाब नमूना ‘ही है !

 सुप्रीमकोर्ट का निर्णय 85 प्रतिशत बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ क्यों ?  

             वर्तमान समय की भारत की जनता कथित न्याय के सबसे बड़े मंदिर भारतीय सुप्रीमकोर्ट की तरफ आशाभरी नजरों से देखती रहती है,लेकिन सुप्रीमकोर्ट में एक ही जाति, मानसिकता और संकीर्ण मानसिकता के जजों के असंगत और पक्षपाती निर्णयों को सुनकर इस देश के न्याय के पक्षक्षर लोगों की भावनाएं और भी आहत हो जाती हैं , क्योंकि सुप्रीमकोर्ट में जब तक इन जातिवादी वैमनस्यता वाले मानसिकता के भ्रष्ट जजों का आरक्षण खत्म नहीं होगा,जब तक हम इस कथित सबसे बड़े न्याय के मंदिर कहे जाने वाले सुप्रीमकोर्ट से न्याय पा ही नहीं सकते ! सुप्रीमकोर्ट में भी इस देश की 85 प्रतिशत बहुलतावादी जातियों,वर्गों,पिछड़ों, दलितों,आदिवासियों आदि की समानुपातिक भागेदारी नहीं होगी,तब तक इस देश की बहुसंख्यक आबादी न्याय से सदा वंचित रहेगी ! केवल एक आदिवासी महिला और एक दलित समुदाय के व्यक्ति को मोहरे के तौर पर राष्ट्रपति बना देने से इस देश के दलित और आदिवासी इस देश के फासिस्ट, नरपिशाच और वहशी कर्णधारों के दमन से नहीं बच पाएंगे, उदाहरणार्थ वर्तमान दलित समुदाय के राष्ट्रपति महोदय के रहते दलितों और दलित समुदाय की कमजोर,अबला लड़कियों से बलात्कार करनेवाले कितने नरपिशाच और दरिंदों को फांसी पर लटकाकर मृत्यु दंड दिया गया ?  

 सुप्रीमकोर्ट के जज भी इस देश की आबादी के समानुपातिक और उनका चयन जातिवाद के आधार न होकर निष्पक्ष और योग्यता के आधार पर हो !

              इसलिए समाधान यह है कि सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट्स में जजों की नियुक्ति की यह अत्यंत घृणित विद्रूपता, संवैधानिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाता और माखौल बनाता,पूर्णतया असंवैधानिक व अलोकतांत्रिक ‘नाटक ‘अब बन्द होना ही चाहिए। भारत की करोड़ों जनता की आशा की किरण इन न्याय के मंदिरों से अब ‘भाई-भतीजावाद और सिफारिशी संस्कृति ‘ का पूर्णतया खात्मा होना ही चाहिए । सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट्स में जज बनना अब किसी की भी ‘बपौती अधिकार ‘ कतई नहीं रहना चाहिए । भारतीय लोकतांत्रिक व संविधान सम्मत राष्ट्र राज्य में सुप्रीमकोर्ट हो या हाईकोर्ट्स इनके जजों के चुनाव में पूर्णतया पारदर्शी, निष्पक्ष,संविधान सम्मत अन्य सिविल सेवाओं की तरह अखिल भारतीय न्यायिक सेवा परीक्षा के सर्वश्रेष्ठ चयनित उम्मीदवारों में से ही योग्यतम् चयनित प्रतिभागियों को ही सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट्स में जज नियुक्त किए जाने चाहिए और इन पहले से सिफारिश पर रखे गए कुंडली मारे बैठे सभी नाकारा,जातिवादी, पारिवारिक सिफारिश के आधार पर रखे गए, अपने उटपटांग,बहुसंख्यक जनहित के खिलाफ अक्सर निर्णय देने वाले ‘इन नाकारा ‘ जजों को भारत का राष्ट्रपति ‘जबरन एकमुश्त सेवामुक्त ‘ करे और भविष्य में सुप्रीमकोर्ट से होने वाले निर्णय संविधान सम्मत,संसदीय गरिमा के अनुकूल बनाए गए विद्वान,निष्पृह और निष्पक्ष जजों के माध्यमों से इस देश में सर्वजनहिताय और सर्वजनसुखाय तथा न्यायोचित्त निर्णय हों।

-निर्मल कुमार शर्मा,प्रतापविहार,गाजियाबाद, उ.प्र.,संपर्क-9910629632,

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