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राष्ट्रीयप्रतीक अशोकचिन्ह : आख़िर कहाँ थमेगा यह गुस्सा?

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 मीना राजपूत 

    _भले यह अनायास हुआ हो लेकिन हमारे राष्ट्रीय प्रतीक अशोक चिन्ह के सिंहों की मुद्रा हिंसक कर देने से यह तो लगता ही है कि समाज में अब करुणा, दया और ममता के स्थान पर रौद्र एवं वीभत्स प्रतीक ज़्यादा पसंद किए  जा रहे हैं। लोग कह सकते हैं कि सिंह की स्वाभाविक मुद्रा है उसका रौद्र रूप। क्योंकि सिंह का ख़्याल आते ही एक दहाड़ते हुए शेर की छवि हमारे दिमाग़ में आती है।_

           किंतु आज से 22-2300 वर्ष पहले सम्राट अशोक ने जो शांति संदेश फैलाया था, उसमें सिंहों की मुद्रा भी शांत दिखाई गई। थाई लैंड में सम्राट अशोक के धर्मचक्र के साथ चार सिंहों की प्रस्तर मुद्राएँ भी मिली हैं, जिनमें सिंह नम भाव से खड़े हैं। यह अद्भुत मुद्रा की कल्पना है। यानी सिंह के अंदर भी दया और करुणा का भाव होता है.

          यहाँ सिंह से आशय चंड अशोक से था, जिसने कलिंग के मैदान में लाखों लोगों को मारा था। यानी बौद्ध धर्म के प्रभाव से उसमें करुणा का भाव प्रस्फुटित हुआ।

         इसीलिए आज़ादी के बाद हमारे संविधान में इस मुद्रा को राष्ट्रीय प्रतीक माना गया। किंतु अब जो नया संसद भवन बन रहा है, उसमें सिंह की शांत मुद्रा के बजाय दहाड़ते हुए सिंह को दिखाया गया है। यह कहीं न कहीं समाज के बदलते हुए स्वरूप का आभास है, जिसमें हिंसा का प्राधान्य है। 

        हम इसको यूँ भी देख रहे हैं, कि समाज में हमारे देवी-देवताओं का चित्रांकन भी अब रौद्र रूप में हो रहा है। जिन राम, कृष्ण, परशुराम को वीर तो बताया गया है, लेकिन उनकी मुद्रा सदैव शांत दिखाई जाती रही, उन्हें भी क्रोधित मुद्रा में दिखाया जा रहा है। सबसे लोकप्रिय देवता हनुमान के चित्र हम संजीवनी पर्वत लिए हुए देखते रहे हैं, उनके चित्र भी अब रौद्र स्वरूप में बनाए जा रहे हैं। पूरी राम चरित मानस में रामचंद्र जी सिर्फ़ एक बार ग़ुस्सा होते हैं।

        जब वे लंका अभियान के समय समुद्र से विनती करते हैं, कि हे समुद्र देव! आप मुझे मार्ग दें किंतु समुद्र क़तई नहीं पसीजता, तब वे समुद्र को अपना रौद्र रूप दिखाते हैं। तुलसी दास जी लिखते हैं-  “विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत। बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीत!!” अन्यथा, जिन राम ने त्रैलोक्य विजेता रावण का वध किया।

       बाली, सुबाहु और मारिचि तथा खर-दूषण जैसे भयानक राक्षसों को मारा, वे कभी क्रोधित नहीं होते। इसी तरह कृष्ण जी के भी सिर्फ़ एक बार क्रोधित होने का वर्णन हमें मिलता है। वह भी तब जब सत्ता के मद में चूर दुर्योधन उन्हें बंदी बनाने चला था। कृष्ण पांडवों का संधि प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आए थे। वे पांडवों के वास्ते सिर्फ़ पांच गांव माँगते हैं किंतु दुर्योधन वह भी नहीं देता, उलटे स्वयं श्रीकृष्ण को बंदी बनाने के लिए उठता है। इसका वर्णन रामधारी सिंह दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ में किया है।

       वे लिखते हैं-

 “हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप विस्तार किया।

डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान कुपित हो कर बोले।

ज़ंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हां-हां दुर्योधन बांध मुझे।

         अर्थात् हमारे समाज में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं रहा है। इसीलिए दुष्ट-दलन जिस ईश्वर के रूपों का वर्णन हमारे मिथकों में है, उनमें भी हिंसा तब ही दिखती है जब वह अपरिहार्य हो। कोशिश की जाती रही, कि प्यार और समझाने से ही सिद्धि की प्राप्ति हो।

 महात्मा गांधी ने भी अहिंसा, करुणा और प्रेम को ही अपना हथियार बनाया था। मगर अब समाज में एक ग़ुस्सा भर रहा है, और इसी वजह से कट्टरता भी। अपने-अपने समुदाय के प्रति यह कट्टरता इतनी बढ़ती जा रही है, कि दूसरे समुदाय के लोगों को सरे आम मार देना भी एक तरह से धर्म की रक्षा बनता जा रहा है।

      मज़े की बात कि दुनिया के सारे धर्म ख़ुद को शांति दूत और करुणा के अवतार बताते हैं। लेकिन हिंसा उनके अनुयायियों में इस कद्र भर गई है, कि म्यांमार और श्रीलंका जैसे बौद्ध देशों में भी दूसरे धर्म वालों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं होता। पाकिस्तान का भी यही हाल है और यही स्थिति अब भारत में आ रही है।

        धार्मिक या सामुदायिक कट्टरता तब आती है, जब समाज में ग़रीबी, बेकारी, बेरोज़गारी और असंतोष बढ़ता है। इस असंतुष्टि को दबाये रखने में धार्मिक कट्टरता बहुत सहायक होती है। क्योंकि जो ग़ुस्सा व्यवस्था के प्रति था वह समाज के अंदर घुल जाता है। और लोग परस्पर उन्मादी होने लगते हैं। 

        कट्टरता सांप्रदायिकता का मूल है। एक कट्टर समाज अपने सारे प्रतीकों को लेकर एक भय से भर जाता है इसलिए भले वह अल्पसंख्यक हो अथवा बहुसंख्यक वह अपनी खोल में सिकुड़ता जाता है। अपनी सामुदायिक और धार्मिक पहचान बनाये रखने के लिए कट्टर लोग इतने अधिक प्रयत्नशील होने लगते हैं कि थोड़ी-सी भी उदारता उन्हें खटकती है।

       इसीलिए स्त्रियों और बच्चों को लेकर वे परेशान रहते हैं। उन्हें एक बंद समाज में रहने का अभ्यास कराया जाता है और इसे उनकी निजी स्वायत्तता बताई जाती है। इसी तरह शिक्षा को लेकर भी वे खिलवाड़ करते हैं और स्थापित मानकों से इतर साहित्य और इतिहास पढ़ाया जाने लगता है।

        इस अभ्यास से जो समाज पनपता है, उसमें साहस के स्थान पर दिखाऊ बहादुरी स्थान लेती है। यही कारण है कि हम आज जो प्रतिमाएँ अथवा चित्र देखते हैं, उनमें वह शांति नहीं दिखती जो हमारे मस्तिष्क में है। प्रत्यंचा चढ़ाए धनुर्धारी राम अथवा क्रोधित मुद्रा में सुदर्शन चक्र लिए कृष्ण क्या हमारी मूल भावनाओं से मेल खाते हैं?

         जिन हनुमान जी के चित्र हमने शांत मुद्रा में देखे हैं, उनका आधुनिक रूप डराने वाला है। और इसके पीछे समाज के अंदर बढ़ रहा ग़ुस्सा और कट्टरता। हम अचानक जब प्यारे अब्दुल चाचा के बच्चों को बढ़ी हुई घनी काली दाढ़ी और सफ़ाचट मूँछें में देखते हैं तो लगता है कि हर समुदाय अपनी खोल में क्यों जा रहा है? 

इसका एक ही जवाब है।

        उदारता सदैव समाज को हेल-मेल वाला बनाती है लेकिन कट्टरता उसे एक खोल में बंद कर देती है। जिस वजह से भिन्न-भिन्न समुदायों के बीच दूरी बढ़ती है। यह दूरी एक-दूसरे के प्रति संशय को पैदा करती है।

      जिस कारण से हम अपने मूल स्वभाव से विचलित होकर एक ऐसी वीर पूजा वाली छवि के दीवाने हो जाते हैं, जो किसी दुष्ट दलन की छवि नहीं होती वरन दूसरे समुदाय को भयभीत करने वाली होती है।

    (चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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