अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

अमृत महोत्सव…आजादी के नींव में है जिनका त्याग, तप और बलिदान

Share

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेकों वीर योद्धाओं, राजा-महाराजाओं ने देश की आन-बान और शान के
लिए लड़ाई लड़ी। भारत के हर क्षेत्र, हर वर्ग और हर समाज ने आजादी की लड़ाई में अपने भीतर राष्ट्र
भक्ति की लौ को प्रज्ज्वलित रखा। मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले इन
सेनानियों ने वर्षों तक अंग्रेजों से संघर्ष किया और आजादी हासिल की। कुछ वीर जवान ऐसे भी थे
जिन्होंने आजादी के बाद भी राष्ट्र रक्षा की परंपरा को जीवित रखा। उनके लिए ‘जननि जन्मभूमिश्च,
स्वर्गादपि गरीयसी’ का मंत्र सर्वोपरि था जो हमें प्रतिपल देश के लिए जीने, देश के लिए कुछ करने के
लिए करता है प्रेरित…

आजादी के अमृत महोत्सव से लेकर आजादी की शताब्दी तक का यह अमृत काल, संकल्प सिद्धि का
काल है जिसमें ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ की भावना की सशक्त
अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। देश के लिए यह गौरव की बात है कि आजादी का अमृत महोत्सव एक
जन-आंदोलन का रूप ले रहा है और व्यापक जनभागीदारी के साथ मनाया जा रहा है। इसमें अनेक
कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
भारत की आजादी की यात्रा में 22 जुलाई का भी खासा महत्व है। दरअसल, इसी दिन संविधान सभा ने
तिरंगे को देश के राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर अंगीकार किया था। 15 अगस्त 1947 को यह भारत का
आधिकारिक ध्वज बन गया। तब से आज तक हमारे प्यारे तिरंगे का स्वरूप वही है। जिस पर सभी
देशवासी गर्व करते हैं। भारतीय ध्वज-तिरंगा अर्थात, केसरिया, सफेद और हरा रंग; अशोक चक्र, जो 24
तीलियों वाला पहिया है; और जिसके केंद्र में गहरा नीला रंग है।
आजादी के अमृत महोत्सव की इस श्रृंखला में इस बार कल्पना दत्त, सुब्रमण्यम शिव, यू तिरोत सिंह और
उधम सिंह की वीरता की कहानी, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से ली थी कड़ी टक्कर…

कल्पना दत्त : लड़का बनकर
अग्रेजों से लड़ने वाली क्रांतिकारी

जन्म : 27 जुलाई 1913, मृत्यु : 8 फरवरी, 1995
देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष
करने वालों में एक नाम कल्पना दत्त का भी है। वह वेश बदलकर क्रांतिकारियों को गोला-बारूद सप्लाई
करती थीं। उन्होंने निशाना लगाने का भी प्रशिक्षण लिया था और वह कारतूस बनाना भी जानती थीं।
इतना ही नहीं, जरूरत पड़ने पर क्रांतिकारी जरूरतों को पूरा करने के लिए वह लड़के का वेश धारण कर
एक जगह से दूसरे जगह जाती थीं। कल्पना दत्त का जन्म पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के चटगांव के
श्रीपुर गांव में 27 जुलाई 1913 को हुआ था। उन्हें बचपन से ही साहसी कहानी सुनने का शौक था।
हाईस्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने क्रांतिकारियों की जीवनी और कहानियों को भी पढ़ा। इन
कहानियों का उनके मस्तिष्क पर जबरदस्त प्रभाव था। कोलकाता में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान कल्पना
की मुलाकात बीना दास, प्रीतिलता वद्देदार और ‘मास्टर दा’ के नाम से जाने जाने वाले सूर्य सेन से हुई।

वह सूर्य सेन के संगठन ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी’ में शामिल हो गईं। सूर्य सेन के नेतृत्व में उनके दल
ने 1930 में चटगांव शस्त्रागार लूट लिया। इस घटना के बाद कल्पना दत्त भी अंग्रेजों की नजर में आ
गई। ऐसे में उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी लेकिन वह सूर्य सेन के संपर्क में बनी रहीं। इसी बीच, 19
सितंबर 1931 में सूर्य सेन ने उन्हें प्रीतिलता वद्देदार के साथ मिल कर चटगांव में यूरोपीय क्लब पर
हमला करने का काम सौंपा। हमलाें से पहले इलाके की निगरानी करते समय अंग्रेजों ने कल्पना दत्त को
पकड़ लिया। हालांकि, अभियोग साबित नहीं होने के बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। इसके
बाद वह सूर्य सेन के साथ मिलकर दो साल तक भूमिगत होकर आंदोलन चलाती रहीं। 16 फरवरी 1933
को पुलिस ने सूर्य सेन को एक जगह छापा मार कर पकड़ लिया, लेकिन किसी तरह कल्पना दत्त बचने में
कामयाब हो गईं। इसके बाद, पुलिस कल्पना दत्त के पीछे पड़ गई और आखिरकार 19 मई 1933 को उन्हें
गिरफ्तार कर लिया गया। चटगांव शस्त्रागार लूट के मामले की सुनवाई एक बार फिर से शुरू की गई।
इस दौरान सूर्य सेन को फांसी की सजा दी गई और कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई
गई। हालांकि, महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर की कोशिशों के बाद कल्पना दत्त को 1939 में जेल से
रिहा कर दिया गया। जेल से बाहर आने के बाद अपनी पढ़ाई पूरी कर उन्होंने 1940 में कलकत्ता
विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1979 में उन्हें वीर महिला की उपाधि दी गई। उन्होंने
बंगाली में अपनी आत्मकथा लिखी, जिसका अंग्रेजी में अनुवाद ‘चटगांव आर्मरी रेडर्स: रेमिनिसेंस’ के नाम
से किया गया है। अंग्रेजों से निडरता और साहस के साथ संघर्ष करने वाली कल्पना दत्त का 8 फरवरी,
1995 को निधन हो गया।

चटगांव शस्त्रागार लूट मामले में मिली थी आजीवन कारावास की सजा ।

..

20 साल बाद लंदन में जलियांवाला बाग का बदला लेने वाले उधम सिं

जन्म : 26 दिसंबर 1899, मृत्यु : 31 जुलाई 1940
शहीद उधम सिंह उस निडर और जांबाज भारतीय का नाम है, जिसने जलियांवाला बाग नरसंहार के हत्यारे
और दोषी को मार कर इस जघन्य हत्याकांड का बदला लिया था। 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर

जिले में जन्मे उधम सिंह का मूल नाम ‘शेर सिंह’ था। कहा जाता है कि साल 1933 में उन्होंने पासपोर्ट
बनाने के लिए अपना नाम ‘उधम सिंह’ रखा था। 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में बड़े होने के बाद वह
पंजाब में राजनीतिक घटनाओं जैसे 1914 की कामागाटा मारू कांड और गदर पार्टी के गतिविधियों से
अत्यंत प्रभावित थे। 1919 में जब जलियांवाला बाग ने जनरल डायर का पागलपन देखा तो उधम सिंह
20 साल के थे। जलियांवाला बाग हत्याकांड उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गया और उन्होंने
इसका बदला लेने का संकल्प ले लिया। इस नृशंस हत्याकांड ने उधम सिंह के मन में अंग्रेजी सरकार के
खिलाफ गुस्सा भर दिया और वह अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।
उधम सिंह ने इस घटना के लिए जिम्मेदार रहे जनरल डायर और जलियांवाला बाग घटना के समय
पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने को अपने जीवन का मकसद बना लिया। जुलाई
1927 में जब जनरल डायर की ब्रेन हेमरेज से मौत हो गई तब उधम सिंह के निशाने पर माइकल ओ
डायर आ गया। इस बीच उधम सिंह, भगत सिंह की गतिविधियों से प्रभावित होकर 1924 में गदर पार्टी
में शामिल हो गए। साथ ही अगले कुछ वर्ष तक उन्होंने विदेश यात्राएं की और औपनिवेशिक शासन को
उखाड़ फेंकने के लिए भारतीय क्रांतिकारियों को विदेशों में संगठित करते रहे। डायर को मारने के लिए
उधम सिंह 6 साल तक लंदन में रहे। आखिरकार उधम सिंह को यह मौका मिल ही गया। जलियांवाला
बाग हत्याकांड के 20 साल बाद उधम सिंह ने 14 मार्च 1940 को लंदन में एक बैठक में माइकल ओ
डायर को गोली मार कर अपना वादा पूरा कर दिया। गोली चलाने के बाद उधम सिंह ने भागने का
प्रयास नहीं किया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी दी गई। उनके
शहीद दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें याद करते हुए कहा था, “शहीद उधम सिंह का साहस
प्रत्येक भारतीयों की याद में बसा है। मैं भारत माता के इस वीर सपूत के शहादत दिवस पर उन्हें नमन
करता हूं।”

..

स्वतंत्रता के लिए जेल जाने वाले मद्रास
के पहले क्रांतिकारी सुब्रमण्यम शिव

जन्म : 4 अक्टूबर, 1884, मृत्यु : 23 जुलाई 1925

तिलक युग के सबसे महान राष्ट्रवादियों में से एक सुब्रमण्यम शिव मद्रास के पहले व्यक्ति थे, जिन्हें
अंग्रेजी राज के दौरान राजद्रोह का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया था। 4 अक्टूबर, 1884 को
तमिलनाडु के मदुरै में जन्मे सुब्रमण्यम शिव ने दक्षिण भारत में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का मोर्चो
संभाल रखा था। भारत की आजादी की लड़ाई में उतरने के लिए सुब्रमण्यम शिव ने अपनी सरकारी
नौकरी तक छोड़ दी थी। सुब्रमण्यम शिवम के नाम से भी जाने जाने वाले सुब्रमण्यम शिव के बारे में
कहा जाता है कि वह एक उत्कृष्ट वक्ता भी थे। वी.ओ.चिदंबरम और सुब्रमण्यम भारती के समकालीन
रहे सुब्रमण्यम शिव, बाल गंगाधर तिलक के सिद्धांत से बहुत अधिक प्रभावित थे। अपने आंदोलन को
आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने धर्म परिपालना समाज की स्थापना की थी। साथ ही उन्होंने अनेक युवाओं
को स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के लिए भी प्रेरित किया। अंग्रेजों को सुब्रमण्यम शिव की सक्रियता
खटकती थी। ऐसे में अंग्रेजों ने 1908 में उन्हें आखिरकार गिरफ्तार कर लिया और 6 वर्ष की सजा दी।
जेल में उनके साथ कठोर और अमानवीय व्यवहार किया जाता, लेकिन वे अडिग बने रहे। जेल में बंद
रहने के दौरान भी सुब्रमण्यम शिव शांत रहने वाले व्यक्ति में से नहीं थे। ऐसे में उन्होंने मासिक पत्रिका
ज्ञानभानु के माध्यम से जेल से भी अपना स्वतंत्रता संघर्ष जारी रखा। दुर्भाग्यवश, सुब्रमण्यम शिव को
जेल में ही कुष्ठ रोग हो गया जिसके कारण रिहा होने के बाद उन्हें अपनी यात्राओं और भाषणों को कम
करना पड़ा। हालांकि, उनकी देशभक्ति के कारण लोग उनकी ओर आकर्षित होते रहे और भाषणों के
कारण उन्हें कई बार जेल की सजा भी हुई। इतना ही नहीं, शिव ने तत्कालीन कलकत्ता, मद्रास, तूतीकोरिन
और तिरुनेलवेली में श्रमिक आंदोलनों को भी अपना समर्थन दिया था। सुब्रमण्यम शिव एक प्रख्यात
लेखक भी थे, और उन्हें ‘रामानुज विजयम’ और ‘माधव विजयम’ सहित उनकी पुस्तकों के लिए भी जाना
जाता है। उन्होंने अपने अंतिम कुछ वर्ष पप्पारापट्टी में बिताए, जहां उन्होंने अपने मित्रों की सहायता से
देशबंधु चित्तरंजन दास को भारत माता के लिए एक मंदिर की आधारशिला रखने में सहायता की। दुर्भाग्य
से, उनके पास इस अभियान को आगे बढ़ने का समय नहीं था। 23 जुलाई 1925 को बढ़ते कुष्ठ रोग और
कमजोरी के कारण उनका निधन हो गया। 1 अगस्त, 2021 को, तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले के
पप्पारापट्टी में दस साल पहले बनाए गए स्मारक परिसर में स्वतंत्रता सेनानी सुब्रमण्यम शिव के
सम्मान में एक नए पुस्तकालय भवन खोले जाने की घोषणा की गई। साथ ही पिछले साल ही उनके
सपने को साकार करते हुए, उसी परिसर में भारत माता की कांस्य की एक प्रतिमा का अनावरण भी किया
गया।

..

तीर-भालों से अंग्रेजों का सामना करने वाले योद्धा यू तिरोत सिंह

जन्म : 1802, मृत्यु : 17 जुलाई 1835
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे कई योद्धा हैं, जिन्होंने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त करने के लिए
खुशी-खुशी अपना जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे ही एक योद्धा थे मेघालय के पश्चिम खासी हिल्स के
खासी जनजाति के राजा यू तिरोत सिंह, जिन्होंने 10 साल तक अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। भारत के
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पहले ही तिरोत सिंह ने बहुत कम उम्र में ही ब्रिटिश शासकों के खिलाफ मोर्चा
संभाल लिया था। राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले तिरोत सिंह एक ऐसे व्यक्ति थे,
जिनके सर्वोच्च बलिदान ने न केवल मेघालय और पूर्वोत्तर में, बल्कि पूरे देश में स्वतंत्रता सेनानियों की
एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित किया। दरअसल, अंग्रेज ढाका को मैदानी इलाके से जोड़ने के लिए मेघालय होते
हुए असम तक एक सड़क बनाना चाहते थे। तिरोत सिंह अंग्रेज अधिकारी डेविड स्कॉट की इस योजना
को कतई पूरा नहीं होने देना चाहते थे। ऐसे में दोनों पक्ष के बीच टकराव बढ़ गया और तिरोत सिंह की
सेना ने 2 अप्रैल 1829 को अंग्रेजों के खिलाफ हमला बोल दिया। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में तिरोत सिंह
ने वीरता और बेहतरीन युद्ध कौशल का परिचय दिया। आंग्ल-खासी युद्ध (1829-33) में तिरोत सिंह और
उनके वफादार अनुयायियों ने औपनिवेशिक ताकतों से बचने के लिए छापामार रणनीति का इस्तेमाल
किया। इस लड़ाई में यू तिरोत सिंह ने परंपरागत शस्त्रों से आधुनिक हथियारों का मुकाबला किया था।
असल में उनके पास सिर्फ पारंपरिक युद्ध के सामान जैसे तीर, भाला, तलवार आदि ही थे जो अंग्रेजों की
बंदूक और युद्ध की रणनीति के खिलाफ असरदार नहीं थे। बावजूद इसके, तिरोत सिंह के नेतृत्व में
खासी समुदाय के लड़ाकों ने अंग्रेजों का डट कर सामना किया। आधुनिक हथियारों के अभाव में तिरोत
सिंह की सेना को आखिरकार हार का सामना करना पड़ा और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें ढाका
की जेल में बंद कर दिया। जेल में ही 17 जुलाई 1835 को उनकी मृत्यु हो गई। कहते हैं कि अंग्रेजों ने
जहर देकर तिरोत सिंह को मार दिया था। स्वतंत्रता संग्राम की लौ को जीवित रखने वाले तिरोत सिंह ने
पूर्वोत्तर और अन्य सभी के एकीकरण के लिए भी लगातार काम किया। खासी जनजाति और मेघालय के
लोग आज भी अपने प्रसिद्ध क्रांतिकारी तिरोत सिंह के बलिदान को कृतज्ञतापूर्वक बड़े गर्व के साथ याद
करते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर मेघालय में हर साल अवकाश रहता है।

……………………………

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें