
सुसंस्कृति परिहार
भारतीय लोकतंत्र की रक्षार्थ बने सर्वोच्च न्यायालय के एक और न्याय देवता श्री खानवलकर सेवानिवृत्त हो गए। उन्होंने जिस तरह से भारत सरकार की सेवा में हाथ बंटाया उसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है।अब उन्हें मिलने वाली मेवा पर लोग टकटकी लगाए बैठे हैं।अभी तक सरकार के मददगार ज जस्टिस लोगों को सरकार की सेवा का जो प्रतिफल मिला है उससे तो लगता है उनके राज्यपाल बनने की संभावनाएं प्रबल हैं चूंकि अभी कई राज्य हैं जहां भाजपा को सत्ता में लाना बहुत ज़रूरी है। वहां यदि इतने बड़े कानून के ज्ञाता विद्वान न्यायाधीश का सहयोग मिल जाए तो सोने में सुहागा ही होगा।आप समझ ही रहे होंगे यदि राज्यपाल कठपुतली है तो यह काम सहजता से हो रहा है। जबकि विभिन्न विधानों के अंतर्गत कई निकायों में नियुक्त किए जाने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की आवश्यकता होती है जैसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय हरित अधिकरण, दूरसंचार विवाद समाधान एवं अपील अधिकरण, अंतर-राज्य जल विवाद अधिकरण, आदि।
याद रखें,134 साल पुराने अयोध्या मंदिर-मस्जिद विवाद पर जब सुप्रीम कोर्ट ने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया। तो सरकार की बांछे खिल गई ।इसके तहत अयोध्या की 2.77 एकड़ की पूरी विवादित जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए दे दी।इसका पुरुस्कार रंजन गोगोई को मिल गया उन्हें राज्यसभा सदस्य चार महीने बाद बना दिया गया ।
इसी तरह चीफ जस्टिस अरुण मिश्रा मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर है।फरवरी 2020 में, शीर्ष अदालत द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन में, न्यायमूर्ति मिश्रा ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की।“प्रधानमंत्री एक बहुमुखी प्रतिभा वाले व्यक्ति हैं जो विश्व स्तर पर सोचते हैं और स्थानीय स्तर पर कार्य करते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित दूरदर्शी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय का एक जिम्मेदार सदस्य है।”
तभी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए), जो सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रैक्टिस करने वाले वकीलों का निकाय है, ने मिश्रा के बयानों की निंदा की, जिसमें कहा गया था कि यह शीर्ष अदालत और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर खराब प्रदर्शन करता है।
इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने विशेष सीबीआई जज बीएच लोया की मौत की स्वतंत्र जांच कराने से मना कर दिया है।तब मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और डि वाइ चंद्रचूड़ की तीन जजों की पीठ ने यह फैसला दिया था ।पीठ ने कहा कि गेस्ट हाउस में लोया के साथ ठहरे चार अन्य जजों के बयान पर शक करना उचित नहीं है। ये सब जज अपने एक साथी की बेटी के विवाह में शामिल होने नागपुर गए थे। पीठ ने कहा इस मामले में पीआईएल याचिका के क्षेत्राधिकार का दुरुपयोग किया है।
लोया इस देश के सबसे अहम मुकदमों में एक 2005 के सोहराबुद्दीन मुठभेड़ हत्याकांड की सुनवाई कर रहे थे. इस मामले में मुख्य आरोपी अमित शाह थे, जो सोहराबुद्दीन के मारे जाने के वक्त गुजरात के गृह राज्य मंत्री थे और लोया की मौत के वक्त भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. मीडिया में खबर आई थी कि लोया की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है। मामला रफा-दफा हो गया।
इधर कूछ दिनों पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगों में मारे गए कांग्रेस नेता एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्य के 60 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए “बड़ी साजिश” के आरोपों को शुक्रवार को खारिज कर दिया ।यह फैसला पढ़ना चाहिए क्योंकि इसके ज़रिए तत्कालीन गुजरात सरकार के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के तमाम दोष हमेशा के लिए जबरन कर दिए गए।जिसका जोर शोर से मोदी जी ने प्रचार भी किया।इसी निर्णय का आधार बना सामाजिक कार्यकर्ता तिस्ता सीतलवाड़ और तत्कालीन डीएम जी पी श्री आरबी कुमार की गिरफ्तारी।
इसी भांति धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत गिरफ्तारी करने, संपत्ति कुर्क करने, तलाशी लेने और जब्ती कार्रवाई करने की प्रवर्तन निदेशालय की शक्तियों को बरकरार करने का फैसला सुनाने वाले न्यायमूर्ति खानविलकर शीर्ष अदालत की कई संविधान पीठ का हिस्सा रहे, जिन्होंने महत्वपूर्ण निर्णय दिए।जिनका नज़ारा हम देख ही रहे हैं।जिसे सरकार चाहे ई डी के सहारे परेशान कर सकती है।अब तक जो इसकी गिरफ्त में आए हैं उनमें प्रतिपक्ष के नेता प्रमुख हैं।इस कार्रवाई का सीधा लक्ष्य यह होता है सूत्र बताते हैं कि सम्बंधित को पहले डर धमकाकर भाजपा में शामिल होने का संदेश दिया जाता है ।उस पर अमल ना करने वालों के पीछे ई डी भेज दी जाती है।हाल ही में बंगाल के मंत्री पार्थ और संजय राऊत इसके शिकार बने हैं। खानविलकर जी की मेहरबानी से ई डी को जो पावर दिए गए उनका धड़ाधड़ इस्तेमाल विरोधी ताकतों के खिलाफ हो रहा है।
गुजरात नरसंहार से मुक्ति और ई डी की ताकत का इस्तेमाल चाहे जिस पर करने का अधिकार देने वाले जस्टिस साहब को कायदे से राष्ट्रपति बना देना चाहिए था किन्तु वे देर से सेवानिवृत्त हुए।वे केंद्र में विधि मंत्री पद की बेहतरीन योग्यता रखते हैं।अब देखना यह है कि इन महान फैसला देने वाले न्याय देवता को कहां स्थापित किया जाता है।





