(आनंदित नहीं, तो मुर्दा हो)
~ सुधा सिंह
_जिस जीवन में आप बहे जा रहे हैं अगर वहां आनंद उपलब्ध नहीं होता है, तो आप गलत बह रहे हैं।_
दुख गलत होने का प्रमाण है और आनंद ठीक होने का। इसके अतिरिक्त कोई कसौटियां नहीं हैं।
न किसी शास्त्र में खोजने, न किसी गुरु से पूछने की जरूरत है। कसने की जरूरत है कि-
जहां बहा जा रहा हूं वहां मुझे आनंद बढ़ता जा रहा है, तो मैं ठीक जा रहा हूं। पीड़ा बढ़ती जा रही है, चिंता बढ़ती जा रही है, तो मैं गलत जा रहा हूं।
अगर आप अपने से पूछेंगे तो कठिनाई नहीं होगी। बूढ़े भी कहते हैं कि हमारा बचपन बहुत आनंदित था। इसका मतलब क्या हुआ : वे गलत बह गए? बचपन तो शुरुआत थी जिंदगी की, वे आनंदित थे और अब वे दुखी हैं। शुरुआत आनंद की थी और अंत दुख ला रहा है तो जीवन गलत बहा।
होना ये चाहिए था–
बचपन में जितना आनंद था वह रोज—रोज बढ़ता चला जाता। डेवलपमेंट की थ्योरी यही है। विकास यही है।
विद्यार्थी कहे कि पहली कक्षा में ज्यादा ज्ञान था; अब कम होता जा रहा है- तो? आगे की कक्षा में ज्ञान बढ़ना था, अज्ञान कम होना था।
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