पुष्पा गुप्ता
_भारत की गोबर पट्टी के किसी भाट कवि की ये पंक्तियां गुजरे जमाने में अंग्रेजों की सत्ता के आगे नतमस्तक होते समाज की प्रतीक हैं , किन्तु इन पंक्तियों के पीछे इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय छुपा हुआ है । चलिये आज इतिहास के पन्नों को खंगालते हुए चलते हैं सत्रहवीं शताब्दि के उत्तरार्ध में बंगाल की ओर !_
फोर्ट विलियम अब बंगाल में सत्ता का मुख्यालय बन चुका था, लार्ड क्लाइब अंग्रेज शासन की जड़े जमा चुका था, क्लाइब के जाने के बाद गवर्नर बन कर आया हैरी वैरेल्स्ट , हैरी ने तीर्थ देशाटन में रमते सशत्र संन्यासियों के शस्त्र लेकर चलने पर और नागा संन्यासियों के नागा घूमने पर प्रतिबंध लगा दिया।
तत्कालीन भटसैप संघ बताता है कि उसे भंयंकर बीमारी हो गयी , वो वापस चला गया।
_किन्तु दस्तावेजी सत्य ये है कि वो नये गवर्नर नियुक्त होने तक कार्यवाहक के रूप में आया था और कम्पनी के ही काम से उसे वापस बुला लिया गया था, तो उसके स्थान पर दूसरा कार्यवाह आया गवर्नर जान कर्टियर , संयोग से बंगाल अकाल और जान कर्टियर साथ साथ आये , अकाल को देखते हुए कर्टियर ने कृषि पर राहत देने के बजाय लगान बढ़ा दिया , और भिक्षाटन कर पेट भरने वाले गिरि सम्प्रदाय के साथ ही भिक्षा के लेन देन पर प्रतिबंध लगा दिया।_
बंगाल में अकाल का असर धीरे धीरे बढ रहा था लोग व्याकुल हो रहे थे तो धर्माचार्य प्रतिबंधों से आहत थे।
चारों शंकराचार्यों ने अंग्रेजों के काले कानूनों का विरोध किया, 1770 के मध्य में अकाल की विभीषिका बढने लगी तो धन्ना सेठों और अंग्रेज शासन ने अन्न के भंडारण कर लिये। इस जमाखोरी के कारण अन्न संकट और गहरा गया , शंकराचार्य के अनुयायी सशस्त्र अखाड़ों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, गिरि , नागा और अन्य अखाड़ों ने सरकारी ठिकानों पर गुरिल्ला छापा शुरू कर दिया अन्न धन समेट कर जनता में बांटने लगे, अकाल साल दर साल बढता गया और साथ साथ बढते गये सन्यासियों के छापे, तत्कालीन बंगाल मने आज का बिहार झारखंड, बंगाल ,ओडिसा 1769 से 1773 तक भयानक अकाल से त्रस्त रहा।
_गवर्नर जान कार्टियर की फौजें मैदान में उतर चुकीं थीं, अन्न भंडरों को लूट रहे संन्यासियों को मारा काटा जाने लगा , राजा फतेहबहादुर संन्यारियों के समर्थन में अपने बचे खुचे सौनिकों के साथ उतर गये , बदहाल किसान, नौजवान , शिल्पकार, पूर्व रियासतों के सैनिक, भूमिहीन मजूदर सब अखाड़ों की शरण जा कर सन्यासी बन अखाडों की ओर से युद्ध के मैदान में उतर पड़े। किसानों मजदूरों और रियासतों के पूर्व सैनिकों में हिन्दू मुसलमान सभी शामिल थे।_
उधर बंगाल के सम्पन्न साहूकार , मालदार अंग्रेजों की शरण जाने लगे , अंग्रेजों को रसद और मदद करने लगे , इससे क्रोधित सन्यासियों ने अब सरकारी अन्न भंडारों के साथ ही सेठ साहूकारों, मालदारों की कोठियों पर भी हमले शुरू कर दिये, इस बीच कम्पनी सरकार ने स्थाई गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स को 1772 के शुरूवात में कलकत्ता भेज दिया।
_हेस्टिंग्स ने विद्रोही सन्यासियों को कुचलने के लिये पूरी फौज मैदान में उतार दी , पूरे बंगाल के सेठ साहूकारों ने हेस्टिंग के लिये मुखबिरों की फौज खड़ी कर दी।_
पुरी के शंकराचार्य पर पहरा लगा दिया गया, छापामार सन्यासियों की धर पकड शुरू हुई ए उन्हें फांसी पर लटकाया जाने लगा।
इस विद्रोह को अंग्रेजों के खिलाफ पहला भारतीय विद्रोह कहा जाता है जो संन्यासी विद्रोह के नाम से इतिहास में दर्ज है।
_संन्यासी जब छापा मारने जाते तो एक नारा लगाते “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ” लेकिन ऋगवेद की इस संस्कृतनिष्ठ ऋचा के वाक्यांश को नये नये सन्यासी बने किसान मजदूर उच्चारित नहीं कर पाते थे, तो उन्होने साझा समझ से इसे अपनी लोकभाषा में गढ कर “बन्दहूँ मात भवानी ” कर दिया।_
संन्यासी विद्रोह का अध्ययन कर रहे बंकिम बाबू के दिमाग में ये दो नारे घर कर गये और फिर यहीं से उपजा कालजयी स्वतंत्रा आन्दोलन का जयघोष : ” वन्देमातरम्”।
वारेने हेस्टिंग ने इस विद्रोह पर एक विस्तृत रिपोर्ट बना कर लंदन को सौंपी जिसमें एक वाक्यांश था : “सन्यासी के नाम से जाने जाने वाले डकैतो का एक दल है जो इन इलाकों में अव्यवस्था फैलाए हुए हैं ये बंगाल के कुछ हिस्सों में भिक्षा और लूटपाट मचाने का काम करते हैं।… अकाल के बाद इनकी संख्या में अपार वृद्धि हुई। भूखें किसान मजदूर इनके दल में शामिल हो गए। … सनातन परम्परा के शंकराचार्य पीठ बेहद शक्तिशाली हैं इनका वर्चस्व तोड़ के उपाय किये जाने चाहिए।”
_इस रिपोर्ट के आधार पर ही आगे चल कर फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई गयी, बंगभंग के दौर में पूरे देश में हिन्दू मुस्लिम का वातावरण तैयार करवाया गया। शंकराचार्यों को विशेष निशाना बनाया गया इसी नीति के तहत बाद में फर्जी शंकराचार्य स्थापित किये गये जो हिन्दू महासभा और आरएसएस युग के आते आते बढते गये।_
आज हिन्दू राष्ट्र के सपने के गुफाद्वार पर खडे भारत में सनातन धर्म के समूल नष्ट के लिये 84 फर्जी शंकराचार्य खड़े कर दिये गये हैं। ये सारे फर्जी शंकराचार्य किसने पैदा किये हैं अब ये मत पूछ लेना , आप को पता है और बहुत अच्छी तरह से पता है, बस बोलने में फटती है।
मत फटने दो, सच की सुई और हिम्मत का धागा उठाओ और बोलो :
_माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः !बन्दहूँ मात भवानी!!_
(चेतना विकास मिशन)





