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सीमा पात्रा के बेटे आयुष्मान की  अनूठी सराहनीय पहल

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-सुसंस्कृति परिहार

एक रिटायर विकास निगम आयुक्त की पत्नि ,31वर्ष का राजनैतिक सफर पहले कांग्रेस और अब भाजपा में बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ अभियान की झारखंड में संयोजक सीमा पात्रा इतनी कुपात्रा है कि उनका अपना सगा बेटा मां  के घर में काम करने वाली सुनीता के साथ किए कुकृत्यों से परेशान होकर अपने दोस्त विवेक आनंद से सारे रहस्यों से पर्दा उठवाकर पुलिस हिरासत में पहुंचाता है। आयुष्मान जैसे संवेदनशील बेटे और उसके मददगार दोस्त की जितनी सराहना की जाए वह बहुत कम है। सलाम दोस्तों। आयुष्मान तुमने तो अपनी मां के खिलाफ जिस तरह मोर्चा संभाला वह एक मिसाल है।सुनीता जैसी कई घरेलू कामगार इस तरह की समस्याओं से अक्सर जूझती रहती हैं काश उन्हें भी आयुष्मान जैसे बेटे का सहारा मिलता लेकिन तुम्हारे इस नेक काम का असर दूर तलक जाएगा।

सुनीता एक आदिवासी लड़की जिसे आठ साल से घर में नज़रबंद रखा गया कुल दस साल से वह इस परिवार का घरू काम करती रही।वह पहले से  विकलांग तो है ही पर उसके साथ जिस तरह का घृणित और वीभत्स क्रूर व्यवहार सीमा ने किया वह अत्यंत त्रासद है। भाजपा जिसने एक आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बनाया उसकी ही बेटी बचाओ और पढ़ाओ की झारखंड संयोजक ने एक आदिवासी बेटी के साथ जुल्मों का कहर ढाया उसकी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भर्त्सना तो करनी ही चाहिए सुनीता की पर्याप्त चिकित्सा व्यवस्था के साथ मोहतरमा सीमा को एस  टी ज्यादती कानून के तहत कड़ी से कड़ी सजा दिलवाने की पहल भी करनी चाहिए। सुनीता की सुरक्षा व्यवस्था अब सरकार का फ़र्ज़ भी बनता है।पता नहीं यह राजनैतिक दुष्ट महिला उसकी जान ही ना ले ले।

सीमा ने  सदैव अपनी सीमाएं तोड़ती रही। हम सभी जानते हैं कि  किसी शासकीय आफीसर की पत्नि का राजनीति में जाना वैसे भी बड़ा ही रिस्की होता है । लेकिन सीमा ने तो शादी के चार पांच साल बाद ही राजनीति का रुख कर लिया।वो पहले कांग्रेस में रही लेकिन कांग्रेस में गर्दिश के दिन देखते ही उसने अपना पल्ला झाड़ लिया  तथा भाजपा का दामन थाम लिया यह उनके चाल चरित्र और चेहरे को उजागर करती है।सत्ता के साथ अपनी पैठ बनाने की खूबी के कारण ही वो बनाव श्रृंगार और पहनावे की अच्छी खासी शौकीन हैं।रौब रुतबे का क्या कहना ना कभी उसकी इस दरिंदगी भरे काम के बीच  पति बोल पाए और ना ही बेटा बेटी।सुनीता तो जरखरीद गुलाम थी क्या बोलती बेचारी।उसकी खामोशी ने सीमा को और जल्लाद बना दिया।

स्त्री चरित्र पर यह गंभीर सवाल है।जिसे त्रिया चरित्रम कहा जाता है।ना जाने उसके मन में क्या राजनैतिक भूख थी जिसे वह अपनी हर कोशिश से पा नहीं सकी हो सकता है वह भी भाजपा में लंबे समय प्रताड़ित रही हो।  जिसका गुबार वह अपने परिवार के साथ ही सुनीता पर हाथ उठाकर निकालती रही ।उसका बेटा इस कृत्य से सहमा रहा मां से कुछ कह नहीं सका जब असहनीय हो गया तो मित्र की मदद लेनी पड़ी।इस बेरहम मां को देखिए उसने बच्चे को पागल बताने की कोशिश में उसे पागलखाने भेज दिया ताकि उसकी बात का कोई भरोसा ना करें।सुना है आयृष्मान की बहिन ने अपने भाई को यहां से निकाल लिया है और उसे घर ले आई है।सीमा पात्रा अब पुलिस हिरासत में हैं।हो सकता है कि अब पिता और बेटी भी अपनी ज़ुबान खोलें।

कुल मिलाकर यह एक ऐसी स्त्री की हकीकत है जिसमें उसे राजनीति में तीव्र गति से आगे बढ़ने की ललक के वशीभूत अपने परिवार से दूरी बढ़ानी पड़ी और अंत में तमाम मानसिक दबावों को झेलते हुए कुंठाग्रस्त होकर सुनीता के प्रति इतना कठोर रुख अपनाना  पड़ा।कितने शर्म की बात है एक मां को अपने बच्चे के कारण ही  जलील होकर हिरासत में जाने बाध्य होना पड़ा।यह  एक स्त्री के सपनों की उड़ान की निंदनीय कहानी है।इस तरह की उड़ानों ने अब तक कई महिलाओं की जान ली हैं।सीमा की इस मनोदशा के गहन अध्ययन की भी ज़रूरत है जिसके कारण वह अपने परिवार से बेरुखी पूर्ण व्यवहार करती रही  ,इसकी वजह क्या थी । यूं ही कोई बेवफा नहीं होता। उसे सजा मिले लेकिन इसके पीछे कौन है इसका खुलासा भी होना चाहिए।

Ramswaroop Mantri

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