~ दिव्यांशी मिश्रा
_व्यास के अनुसार महाभारत में सब कुछ है – वेदों के रहस्य, उपनिषदों के कर्म-कांड, पुराणों में वर्णित भूत, वर्तमान और भविष्यत का इतिहास; क्षय, भय व्याधि की पहचान; चारो वर्णों के नियम; धार्मिक विद्यार्थी के कर्तव्य; सूर्य, चंद्र और ग्रहों-नक्षत्रों के आयाम; चारो युगों के काल, रिक्, साम और यजु: वेद; आध्यात्म; न्याय; रोग-व्याधि की चिकित्सा; दान और पाशुपत धर्म; पवित्र नदियों और अन्य तीर्थ स्थलों के वर्णन; वन, पर्वत, समुद्र आदि के वर्णन; युद्ध कला; विभिन्न राष्ट्र और उनके रीति-रिवाज … आदि सब कुछ._
जिस तरह जीवन के अन्य तीन आश्रम मिल कर भी गृहस्थ आश्रम की बराबरी नहीं कर सकते उसी तरह अन्य काव्य / महाकाव्य मिल कर भी महाभारत की बराबरी नहीं कर सकते.
_पढ़िए आज महाभारत में वर्णित एक श्राद्ध :_
पौरव वंश के वसु नामक एक धार्मिक राजा की इंद्र से प्रगाढ़ मैत्री थी. इंद्र के निर्देश पर उस ने कभी चेदि राज्य जीता था. इंद्र ने उसे एक स्फटिक-विमान दिया जो कहीं भी जा सकता था. इस विमान में उड़ सकने के चलते उस का एक नाम उपरिचर भी पड़ा था. इंद्र ने उसे एक पुष्पमाला भी दी थी जिस के कमल पुष्प कभी नहीं कुम्हला सकते थे और जिसे पहनने वाले को युद्ध में कभी कोई चोट नहीं पहुँच सकती थी. यह सब देते हुए इंद्र ने उस से संपूर्ण पृथ्वी पर धर्म की रक्षा करने के लिए कहा था. वसु इंद्र की नियमित पूजा करता था और इंद्र उसका पूजन स्वीकार करने हंस के रूप में चेदि आता था.
देवेन्द्र की मित्रता, देवेन्द्र की कृपादृष्टि से वसु पूरे विश्व का सम्राट बन राज कर रहा था. सम्राट वसु के पाँच पुत्र थे जिन्हे उस ने अपने साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों के राजा बना दिए थे. ज्येष्ठ पुत्र वृहद्रथ मगध का शासक बना था.
यही वृहद्रथ एक अन्य नाम महारथ से भी जाना जाता है. वसु के अन्य पुत्र थे प्रत्यग्रह, कुशाम्ब, मछिल्ल और यदु. कुशाम्ब का एक और नाम था मणिवाहन. वसु के पुत्रों ने अपने नामों पर राज्य और अपने राजवंश स्थापित किए, जिन वंशों ने बहुत दिनों तक पृथ्वी पर राज किए.
वसु की राजधानी के निकट एक नदी बहती थी शुक्तिमती. कभी कोलाहल नाम के एक सजीव पर्वत ने उस नदी का उल्लंघन कर उसे अपने पाश में बाँध लिया था. वसु ने अपने पदाघात से पर्वत में एक गहरा गड्ढा कर शुक्तिमती को मुक्त किया था. किंतु कोलाहल से मिलन के चलते शुक्तिमती को यमज संतानें, एक पुत्र और एक पुत्री हुईं.
उस नदी ने अपनी संतानों को अपने तारक वसु को दे दिए. उस के बालक को बड़े होने पर वसु ने उसे अपना सेना नायक बनाया और उस की बालिका गिरिका के बड़ी होने पर वसु ने उस से विवाह कर लिया था. गिरिका अत्यंत रूपवती थी.
एक दिन गिरिका के ऋतु काल में वसु उस के पास जाने ही वाला था जब उस के पितृ चेदि आ गये. पित्रियों ने उस से अपने भोजन (श्राद्ध) के लिए मृग के माँस की इच्छा व्यक्त की, और आखेट प्रेमी राजा मृग के संधान में वन निकल पड़ा.
आखेट में भी वसु गिरिका के रूप को याद करता रहा. वसंत ऋतु में वन बहुत रमणीय था और राजा का ध्यान रह रह कर गिरिका पर जा अटकता था. गिरिका की कामना में डूबा हुआ वसु फूलों से लदे एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठे स्खलित हो गया.
निकट के वृक्ष पर बैठे एक श्येन (बाज पक्षी) को उस ने अपने बीज दिए और उस से उन्हे गिरिका को दे आने के लिया कहा.
रास्ते में एक दूसरे श्येन ने उस के चंगुल में माँस का टुकड़ा समझ कर उस से राजा के बीज छीनने चाहे. उनके मुठभेड़ में वसु के बीज नीचे बहती यमुना नदी में गिर पड़े.
यमुना में उन दिनों अद्रिका नाम की एक अप्सरा किसी शाप वश मछली बन कर रह रही थी. जल में गिरते राजा के बीज को अद्रिका ने आगे बढ़ कर पी लिया. दस महीनों के बाद अद्रिका धीवरों के जाल में फँसी थी और जब उस का पेट चीरा गया था तो दो मानव शिशु मिले थे – एक बालक और एक बालिका. आश्चर्य चकित धीवर दोनो शिशुओं को ले कर अपने राजा उपरिचर के पास गये.
उपरिचर ने बालक शिशु को अपने पास रख लिया. इसी बालक ने बड़े होने पर मत्स्य राजवंश की स्थापना की. बालिका को अपरिचर ने धीवरों को दे दिया “यह तुम्हारी बेटी है”.
इस तरह वह अप्सरा पुत्री धीवरों के मुखिया के घर पलने लगी. उस के दत्तक पिता ने उस का नाम सत्यवती रखा था. बड़ी हो कर वह अप्सरा समान रूपसी हुई, पर मछली के पेट से जन्म लेने के चलते उस की देह से हमेशा मछली की गंध आती रही. सत्यवती यमुना पर नाव खे कर अपने पिता के हाथ बँटाती थी.
_आगे की कथा सर्वविदित है। मुख्य बात है, राजा उपरिचर के पितृ द्वारा भोजन में मांस मांगना और राजा द्वारा मांस की खोज में निकलना।





