डॉ. अभिजित वैद्य
कोविड महामारी के बाद विश्व के अमीर लोग और अधिक अमीर बन गए और गरीब और अधिक गरीब बन
गए यह वास्तव ‘ग्लोबल ऑक्सफॅम दावोस रिपोर्ट-२०२२’ जैसे अनेक वैश्विक अह्वालों ने प्रसिद्ध किया l
लेकिन संपदा के इस सागर में लोटनेवाले अमीर ज्यादा से ज्यादा १% हैं, शेष पूरे विश्व का वास्तव कितना
भयानक है, इसे ‘यूनिसेफ’ के ‘अन्न एवं कृषि संस्था’ द्वारा हाल ही में प्रकाशित ‘विश्व की अन्न सुरक्षा एवं
पोषण की स्थिति २०२२’ इस द्वारा विश्व के सम्मुख रखा है l कोविड की महामारी ने विश्व का अन्न वितरण
का वास्तव, भूखे लोगों की बढ़ती हुई संख्या, बढनेवाली अन्न की असुरक्षा तथा बढनेवाली दरिद्रता का
पर्दाफाश किया l विश्व में बढ़ती हुई संपत्ति तथा प्रगति, तो दूसरी ओर बढ़ता कुपोषण तथा उसके कारण
रेंगते हुए बढ़ते बच्चे l पोषक आहार जिनके बस की बात नहीं रही ऐसे लोगों की संख्या ११२ करोड़ से ३१०
करोड़ तक पहुँच गई l ये आँकडे प्रत्यक्षरूप में इससे भी बढ़कर हो सकते हैं l
विश्व में कुपोषितों की संख्या २०१९ में ८% थी, २०२० में ९.३% हो गई और २०२१ में ७०.२
से ८२.८ करोड़ लोग भूखग्रस्त थे l इसमें २०१९ में १०.३ करोड़ लोगों की वृध्दी हो गई तो २०२० में और
४.६ करोड़ लोगों की वृध्दी हो गई थी l भूखग्रस्तों की संख्या में बढनेवालों की गति चिंतायुक्त है l२०२१ वे
वर्ष में विश्व के ५०% से अधिक भूखग्रस्त अर्थात ४२.५ करोड़ आशियाखंड में थे, १/३ से अधिक अर्थात
२७.८ करोड़ आफ्रिका खंड में थे l ऐसा अंदाजा लगाया जा रहा है कि २०३० में भी ६७ करोड़ लोग अर्थात
विश्व की आबादी के ८% लोग बिना भरपेट खाए हुए होंगे l अन्न सुरक्षा से वंचित लोगों की संख्या ध्यान में
लेनी होगी l २०२१ में विश्व की आबादी के ८% लोग अर्थात ६७ करोड़ लोग भोजन के दुर्भिक्ष का सामना
करते थे l यह दुर्भिक्ष अकाल के कारण न होते हुए आर्थिक क्षमता के आभाव के कारण है l २०२२ में ५ साल
के कम उम्रवाले ६.७% बच्चे कुपोषित थे तो ५.७% बच्चे स्थूल थे l गाँव का इलाका तथा गरीब घरों में रेंगते
हुए बच्चे बडी मात्रा में दिखाई दिए l शहर एवं संपन्न परिवार के बच्चे जल्दी ही स्थूलता प्राप्त करते हैं ऐसा
दिखाई दिया l इसका एक मात्र कारण यह है कि इस वर्ग के लिए भोजन की बडी मात्रा में उपलब्धता l
देश का प्रतिव्यक्ति उत्पन्न घट जाता है वैसे ही अन्न असुरक्षा का प्रमाण शीघ्रगति से बढ़ता है l पूरे
विश्व में पुरषों की अपेक्षा महिलाओं में अन्न की असुरक्षा बडी मात्रा में दिखाई देती है l पोषक आहार का
खर्च २०२० में विश्व में सभी ओर बढ़ गया l अतः वो आम आदमी के बस की बात नहीं रही l अन्न असुरक्षा
२०२० से शीघ्रगति से बढ़ने लगी l २०१९ में १५ से ४९ उम्र की महिलाओं में हर तीन महिलाओं की
तुलना में १ महिला अर्थात ५७.१ करोड़ महिलाएँ अॅनिमियाग्रस्त थी I कम से कम छह महीनोंतक छोटे
बच्चे को स्तनपान करना आवश्यक है l इस प्रचार के कारण रेंगते हुए बच्चों का प्रमाण २०२० में ३३.१% से
२२% तक नीचे उतर आया l लेकिन इसका अर्थ ऐसा है कि आज भी पूरे विश्व में ५ साल से कम उम्रवाले
२२% बच्चे रेंगते हुए दिखाई दे रहे हैं l बच्चों के शरीर की वृध्दि न होना केवल शरीर से संबंधित बात नहीं है
अपितु इसका संबंध बौद्धिक वृध्दि से भी होता है l ऐसे बच्चों को संसर्गजन्य बीमारियाँ तुरंत घेर लेती है और
उनकी मृत्यु का प्रमाण बडी मात्रा में होता है l इसका मतलब ऐसा है कि विश्व के औसतन २२% बच्चों के
बुध्दि की वृध्दि पोषक आहार के आभाव में थम जाती है लेकिन बच्चों को जन्म से ही जिंदगी में सभी प्रकार
का पोषण प्राप्त बच्चों से शैक्षणिक स्पर्धा करनी पड़ती है l बुध्दि केवल जन्म से ही प्राप्त देन नहीं है अपितु
इसका वैज्ञानिक तौर पर अनेक चीजों से संबंध होता है और दरिद्रता बुध्दि की वृध्दि को हानिकारक होती है
इस बात को ध्यान में नहीं लिया जाता l
२०३० में पूरे विश्व में कोई भी भूखा नहीं रहेगा ऐसी नीति यूनिसेफ ने अपनाई थी l भूखमुक्त विश्व
‘जिरो हंगर’ का सपना था l विश्व में रहनेवाले सभी को उचित दाम में पोषक आहार देने का वचन था l यहाँ
दो मुद्दों पर विचार करना पड़ेगा l पहला मुद्दा है – योग्य उष्मांकयुक्त आहार लेने की व्यक्ति की, परिवार की
आर्थिक क्षमता l दूसरा मुद्दा है – योग्य उष्मांक साथ पोषकमूल्ययुक्त अन्न खरीदने की क्षमता l वास्तव में
इसके बारे में विश्व की यात्रा पलटी दिशा से हुआ है ऐसा नजर आ रहा है l २०२० में अन्नपदार्थों की
कीमतों में पूरे विश्व में अपेक्षा से ज्यादा वृध्दि हुई है l २०१९ के आँकड़ों में ११२ करोड़ लोगों की वृध्दि
होकर २०२२ में यह संख्या ३१० करोड़ तक पहुँच गई l सबसे बडी वृध्दि आशिया खंड में हुई l आशिया
खंड में पहली संख्या में ७८ करोड़ लोगों की वृध्दि हो गई l २०२० में पोषक आहार की प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति
कीमत लगभग ३ डॉलर अर्थात २४० रूपए प्रतिदिन थी l इसके अनुसार एक व्यक्ति का पोषक आहार का
महीने का व्यय ७२००/- रूपए होता है l अतः उस व्यक्ति के अन्य खर्च ध्यान में लेते हुए इसका प्रति महिना
उत्पन्न कम-से-कम १५ हजार रूपए होना चाहिए l ‘यूनिसेफ’ के इस अहवाल के अनुसार भारत में ७०.५%
लोगों को ‘पोषक आहार’ बन नहीं पडता l भारत के बाद बहुत ही कम – पाकिस्तान, बांगलादेश, घाना
तथा नायजेरिया जैसे देश है l इसका औसतन अफ्रिका खंड में २३.६% तो दक्षिण आशिया की ४१.१% है l
इसका मतलब है कि दक्षिण आशिया के औसतन की तुलना में भारत की अवस्था अत्यंत दयनीय है l विश्व के
सभी उन्नत देशों का यह औसतन १% से भी कम है l
यूनिसेफ के इस अहवाल की पार्श्वभूमि पर आरोग्य सेना ने ‘मेहनतकशोंकी आहार एवं उत्पन्न’ इस
विषय पर किए हुए दो पथदर्शी सर्वेक्षण की ओर ध्यान खिंचना आवश्यक है l अत्यंत अल्प आर्थिक सहायता
तथा इनेगीने कार्यकर्ताओं की संख्या को ध्यान में रखते हुए आरोग्य सेना द्वारा किया गया सर्वेक्षण का
निष्कर्ष यूनिसेफ के अह्वालसे बडी मात्रा में समानता रखता है l
आरोग्य सेना ने ७ अप्रैल २००९ ‘विश्व आरोग्य दिन’ को ‘आधेपेट मेहनतकशोंकी आवाज’ नामक
अहवाल प्रस्तुत किया l पुणे शहर एवं गाँव का इलाका ऐसे मजदूरों के छह गुटों में ३११ स्त्री-पुरुष
असंघटित मजदूरों का यह सर्वेक्षण था l इस सर्वेक्षण में श्रमिकों का औसतन मासिक उत्पन्न रु. ३८४२/- तो
परिवार का रु. ५७८२/- तथा प्रति व्यक्ति का रु. ११६५/- दिखाई दिया l इन परिवारों का खाने-पीने का
खर्च कुल उत्पन्न से ४९.६ प्रतिशत था और फिर भी आवश्यक उष्मांक की अपेक्षा केवल ५०% उष्मांक
उनके आहार में नजर आए l आहार का पोषक मूल्य तो अत्यंत अल्प था l २००९ वर्ष में अन्न-पदार्थों के
मूल्य ध्यान में लेते हुए उस वक्त पोषक आहार हेतु प्रतिदिन कम से कम ३५/- रुपयों की आवश्यकता थी l
अर्थात मासिक लगभग १०००/- रूपए l लेकिन प्रतिव्यक्ति मासिक उत्पन्न केवल रु. ११६५/- होने के कारण
मजदूरों के परिवार आहार पर ज्यादातर ५००/- रूपए खर्च करते थे l बचे हुए पैसों में आरोग्य-शिक्षण-
निवारा-वस्त्र आदि आवश्यकताएँ पूरी करते थे l जिस व्यवस्था की ओर से ऐसे वर्ग को आधार देना अपेक्षित
था उस सार्वजनिक अन्न-धान्य वितरण व्यवस्था से प्रत्यक्ष रूप में काफी कुछ नहीं मिलता था l
आरोग्य सेना ने २०२१ में कोविड महामारी में संघटित श्रमिकों का दूसरा सर्वेक्षण किया l यह
अहवाल १८ फरवरी २०२१ में प्रसिध्द किया l इस सर्वेक्षण में श्रमिकों का औसतन उत्पन्न रु. १३७७९/-
उनके परिवार का महीनेका उत्पन्न रु. १८९३७/- तो परिवार का प्रति सदस्य प्रतिदिन उत्पन्न रु. १२१.४
इतना ही था l हर परिवार का प्रतिदिन खाने-पीने का खर्च रु. २२२/- तो प्रतिव्यक्ति खाने का खर्च रु. ४३/-
था l श्रमिकों के आहार में प्रतिदिन उष्मांक १८०० नजर आया जो जरुरत से ५०० से कम था l उनका
औसतन बॉडी मास इंडेक्स ( बी.एम.आय.) लगभग २२.९ दिखाई दिया l इन सभी के आहार में प्रथिनों,
जीवनसत्वों, क्षार तथा तंतुओं की कमी बडी मात्रा में दिखाई दी l
गत तीन सालों में विश्व की यह घसरड क्यों हो गई इस पर सोचना चाहिए l इसकी तीन महत्त्वपूर्ण
वजह है- क्लायमेट, कॉन्फ्लीकट तथा कोविड, याने पर्यावरण, अशांतता तथा महामारी l पर्यावरण के
उच्चतम (पान ५) परिवर्तन विश्व की अशांति, संघर्ष तथा कोविड की महामारी के कारण निर्माण हुई आर्थिक
मंदी, उसमें से बढ़नेवाली विषमता l लेकिन केवल इतनी वजह हैं ऐसा मानना उचित नहीं होगा l अन्न
उत्पादन तथा कृषिक्षेत्र के बारे में अपनाई गई गलत नीतियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार हैं l भविष्य में अगर
इसपर मात करनी हो तो विश्व को कुछ साहसी कदम उठाना आवश्यक है l इस सर्वेक्षण में यह भी समझ में
आ गया है की वर्तमान उपलब्ध सार्वजनिक आर्थिक स्त्रोतों में भी शासन कृषि उत्पादनों में असरदार निवेश
कर सकती है l सद्यस्थिती में पूरे विश्व में कुल ६३० बिलियन डॉलर्स इसके लिए निवेश किए जाते हैं l
लेकिन इस निवेश का ज्यादा तर उपयोग बाजार में कृषि उत्पादन की कीमतें घटना, पर्यावरण का विनाश
करना, छोटे उत्पादकों को नुकसान पहुँचाना और स्थानीय लोगों को निष्क्रिय बनाने के लिए होता है l
इतना सभी करने पर भी पोषक आहार लोगों तक पहुँचाने में असमर्थ होता है lविश्व के सभी शासनों ने ये
स्त्रोत उचित ढंग से इस्तेमाल करने चाहिए l कम उत्पन्नवाले गुट के देशों में सार्वजनिक आर्थिक स्त्रोत कम
मात्रा में है लेकिन इन देशों की अर्थव्यवस्था कृषिप्रधान है l इन देशों में गाँव की भूमि अधिक है, ज्यादातर
रोजगार खेती पर निर्भर है l इन देशों में करोडो भूखग्रस्त हैं, ज्यादातर जनता पोषक अन्न से वंचित हैl
कुपोषन बडी मात्रा में है l इन देशों की आर्थिक नीतियाँ बदलना आवश्यक है l ऐसा करते वक्त यह परिवर्तन
आरोग्य, पर्यावरण, यातायात एवं उर्जा इन क्षेत्रों में भी करना आवश्यक है l आरोग्यपूर्ण एवं संतुलित कृषि
व्यवस्था में दूरगामी निवेश भविष्य का प्रावधान हैl अतः कृषिक्षेत्र कॉर्पोरेट क्षेत्र के हाथों में सौंप देना भी
घातक है ऐसा भी यह अहवाल बताता है l कृषि संविधान विरोधी आंदोलन से मोदी जी की आँखे अगर नहीं
खुलती हो तो उन्होंने कम से कम इस अहवाल का पठन करना चाहिए l
यह संपादकीय लिखते समय नरेंद्र मोदीजी के मित्र अदानी ने संपत्ति के मामले में बिल गेट्स को भी
पीछे ढकेल दिया है और अब वे विश्व के दुसरे नंबर के सबसे अमीर बन गए हैं ऐसे समाचार प्रसारित हुए हैं
l जिस कोविड महामारी के कारण पूरे विश्व में भूखग्रस्तों का प्रमाण बढ़ गया है उसी कालावधि में यह हुआ
है l यह केवल अदानी के बारे में नहीं हुआ अपितु विश्व के १०० अमीर लोगों के बारे में हुआ है l यह न
संयोग की बात है और न उनका कर्तुत्व l अमीरी का यह संसर्ग केवल भारत तक सिमित नहीं अपितु पूरे
विश्व को छा जानेवाला संसर्ग है l फर्क सिर्फ इतना है कि विश्व के केवल १ प्रतिशत लोग इस नफरतभरी
संपत्ति के संसर्ग के शिकार हैं, शेष ज्यादातर लोग भूख में झुलस रहे हैं l






अतिशय सुंदर ,परिपूर्ण, वास्तवदर्शी लेख आहे. श्रीमंत आणि गरीब यामधील वाढती दरी, जगातली वाढती गरिबी, वाढती लोकसंख्या , बालकुपोषण, महिलांचे आजार ,सामान्यांचे घटते उत्पन्न आणि कृषी क्षेत्रातील हानी यावर पुराव्यासहित सखोल भाष्य केले आहे. यावर उपाय करण्यासाठी सामाजिक संस्था आणि संघटना किती पुऱ्या पडणार आणि यावर काम करण्याची सरकारची अनास्था, बेजबाबदारपणा कारण आहे. यावरून श्रीमंतांच्या वृत्तीमध्ये बदल होणार काय ? आणि वरील समस्यांवर उत्तर मिळेल काय? हा प्रश्न कायम राहतोच..
thenks