,,मुनेश त्यागी
देश में एक बार पुनः मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलने की साजिश जारी है और इस बार तो यह और किसी ने नहीं बल्कि दिल्ली के बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा ने किया है। उन्होंने हाल की अपनी एक सभा में कहा है मुसलमानों को लेकर कहा है कि इनका दिमाग ठीक करना है। इनका एक ही इलाज है कि इनका संपूर्ण सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया जाए। उन्होंने कहा कि इनकी दुकान से, रेहड़ी से, सामान कोई नहीं ख़रीदे, इनकी कोई मजदूरी ना दें और इनसे काम ना कराएं।
सार्वजनिक सभा में उपस्थित लोगों ने इस नफरत भरे आह्वान का समर्थन किया और हाथ उठाकर शपथ खाई कि वे प्रवेश वर्मा के द्वारा आह्वान किए गए मुसलमान बहिष्कार का समर्थन करते हैं। परमेश वर्मा पहले भी कई बार नफरती बोल बोलकर समाज में हिंसा और नफरत का वातावरण पैदा कर चुके हैं। इनके खिलाफ बीजेपी ने आज तक कोई कार्यवाही नहीं की है और आश्चर्य तो यह है कि इन जनाब के नफरती बोल बोलने के खिलाफ पुलिस द्वारा भी कोई प्रभावी और पर्याप्त कानूनी कार्रवाई नहीं की गई है, इसीलिए इनका हौसला बढ़ा हुआ है।
भारत के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी चुप्पी साधे हुए हैं। इस बारे में कुछ नहीं बोल रहे हैं, जबकि यह सब उनकी नाक के नीचे हो रहा है। यही कारण है कि नफरती भाषण देने वालों के हौसले बढ़े हुए हैं और ये लोग मुसलमानों के खिलाफ कुछ भी कह सकते हैं, कुछ भी बोल सकते हैं, उनके खिलाफ कोई कानूनी नहीं की जाएगी। ना ही पुलिस द्वारा और ना ही इनकी राजनीतिक पार्टी द्वारा और ना ही किसी अन्य द्वारा।
हालात इतने खराब हैं कि दिल्ली का मुख्यमंत्री भी इस बारे में कुछ नहीं बोल रहा है और दूसरी राजनीतिक पार्टियों ने भी इस बारे में कोई खास कार्यवाही नहीं की है। यह भी एक हकीकत है कि नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री काल में गुजरात से भी ऐसी खबरें सुनने को मिली थीं। वहां पर भी एक समय में मुसलमानों का बहिष्कार करने की बातें अखबार और मीडिया में आई थी।
नफरती बोल बोलकर सत्ता में बना रहा जा सकता है, इससे एक नफरती माहौल तैयार किया जा सकता है, जनता का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया जा सकता है और वहां पर हिंदू मुसलमान की भावनाएं लाई जा सकती हैं, इसीलिए इस तरह की भाषण देकर माहौल खराब किया जा रहा है। अब तो ऐसा लगने लगा है कि जैसे यह सब 2024 के चुनावों का एक बड़ा साजिशी हिस्सा बन गया है।
इस बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी गंभीर चिंता व्यक्त की है। उसका कहना है कि नफरती भाषण देश के माहौल को खराब कर रहे हैं जिससे देश विदेश में भारत की छवि धूमिल हो रही है और उसकी किरकिरी हो रही है। यह भी एक हकीकत है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय की भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। उसकी बातों को भी सुना नहीं जा रहा है। उन पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है।
इस सबका और इस साम्प्रदायिक मुहीम का आखिर क्या कारण है? भारत की सांप्रदायिक ताकतें इन भाषणों और नफरत ही बोल बोलने के बिना जिंदा नहीं रह सकतीं। ये नफरती बोल और नफरत ही भाषण इन सांप्रदायिक तत्वों की जीवन रेखाएं हैं यानी इनकी लाइफ लाइनें हैं। सत्ता पाने के लिए और सत्ता में बने रहने के लिए यह सबसे जोरदार माध्यम बन गया है क्योंकि ऐसे बोल बोल कर जनता में नफरत फैलाई जाती है, हिंदू मुसलमान की बात की जाती है और मुसलमानों को दुश्मन ठहराया जाता है जिससे हिंदू पक्ष खुश होता है और वह सारी जुल्म जातियों के लिए इस देश की जनता द्वारा सही जा रही सारी समस्याओं के लिए वह मुसलमानों को जिम्मेदार समझता है और एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में वोट करता है।
यही कारण है कि बार-बार जनता के बीच में छोटे नेताओं द्वारा बड़े नेता द्वारा नफरती भाषण दिए जाते हैं और उनके खिलाफ सोच समझकर कोई कार्यवाही नहीं होती है। यह सब एक सोची समझी राजनीति और रणनीति का हिस्सा है। ऐसे बयान बोलकर, ऐसे भाषण देकर, एक साजिश के तहत यह सब किया जाता है ताकि जनता धार्मिक आधार पर बंटी रहे और उसकी सोच और संस्कृति को खंडित किया जा सके और उसको आपस में बांटा जा सके।
इसका फायदा सत्ता में बैठे बीजेपी को रहा है क्योंकि जनता धार्मिक आधार पर बंट जाती है। वह सही मुद्दों,,,, रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार सरकार की नीतियों पर कोई ध्यान नहीं देती, कोई संघर्ष नहीं करती और वह आपस में ही विभाजित रहती है। इसका सबसे ज्यादा फायदा सत्ता में बैठी बीजेपी और प्राविधिक शिक्षा में बैठे राजनीतिक सत्ता में बैठे देसी विदेशी पूंजी पति भाग को और सका द्वारा लागू की जा रही राजनीति और उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को लागू कराने वालों और इनसे फायदा उठा रहे तमाम पूंजीपतियों को हो रहा है।
अब यहां पर प्रश्न उठता है कि यह सब लगातार कई वर्षों से हो रहा है, ऐसे में क्या किया जाए? ऐसे में हमारा कहना है कि भारत की तमाम विपक्षी पार्टियों को इन नफरती भाषणों के खिलाफ एकजुट होगा होना होगा। इनके खिलाफ कार्यवाही करनी होगी और सारी जनता को किसानों को, मजदूरों को, नौजवानों को, विद्यार्थियों को, महिलाओं को, दलितों को और अल्पसंख्यकों को इनके खिलाफ जन जागरण के द्वारा एकजुट करना होगा और इनकी नीतियों की पोल खोलनी होगी और इसके लिए पूरी जनता को एकजुट करना होगा ताकि वह जागरूक होकर इन सांप्रदायिक नीतियों का शिकार न बने और अपने सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा जमुनी तहजीब की सभ्यता और संस्कृति को जिंदा रख सकें और उसे बनाए रखें।
यहीं पर इस देश की जनता को जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल हैं, मिलकर एक जरूरी काम करना होगा और वह यह है कि वे इन सांप्रदायिक ताकतों को वोट ना दें और इन्हें वोट ना देकर, सत्ता से और सरकार से, बाहर कर दें, तभी जाकर इस सांप्रदायिक मुहिम का और नफरत से भरे भाषणों का मुकम्मल इलाज किया जा सकता है और इससे स्थाई रूप से निजात पाई जा सकती है। यह काम मुश्किल है मगर सबसे जरूरी भी है। इन नफरत के भाषण देने वालों को, जागृत जनता ही कारगर रूप से समुचित सजा दे सकती है।





