रचना कुलश्रेष्ठ
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पुरुष जो भी कहते या करते हैं,
उनके पीछे की कहानीयाँ स्त्रियाँ
भाँप लेती हैं।
जब मुखर हो कर पुरुष करते हैं
तारीफ़, या लगाते हैं मक्खन
याकरते हैं मनाने की भरसक कोशिश
उनके पीछे की मनमानियाँ,
स्त्रियाँ भाँप लेती हैं।
वो भाँप लेती हैं, हर अनकहा सच
जब भीतर सैलाब लिए फिरने
लगते हैं पुरूष।
वो भाँप लेती
हर कहा गया झूठ,
जिसे कहते समय
गला सूखता है उनका
और बेफ़िक्री वाली हँसी से
वे ढाँपते हैं भीतर की विकलता।
स्त्रियाँ पुरुषों के चेहरे पढ़ लेती हैं।
वो पढ़ लेती हैं-
माथे की लकीरों में आई सिलवटें,
चढ़ी हुई त्योरियाँ, अतीत की
झाइयाँ,
भविष्य की परछाइयाँ,
आँखों की तेज़ी या नमी,
होंठों पर रखी गई तरह-तरह की मुस्कानें
और उन मुस्कानों में छिपे ख़्याल,
स्त्रियाँ भाँप लेती हैं।
वो बिना भाव के सपाट चेहरों पर
थर्राती आवाज़ें।
सपाट चेहरों
और सधी हुई आवाज़ों में
लरजती हुई तेज़ या मद्धम धड़कनें,
प्रवाह जैविक है या अजैविक?
जो धार चली आ रही है,
उस बहाव का ताप लेती हैं।
हाँ! स्त्रियाँ भाँप लेती हैं।
सुन लेती हैं पेट की गुड़गुड़,
और थाली सजा देतीं हैं।
वक़्त और स्थिति समझ,
चाय पहले ही चढ़ा देतीं हैं।
पुरुषों की तत्काल ज़रूरतों का ही नहीं,
उनकी संभावित ज़रूरतों का भान लगा लेती है।
निभातीं है
अपने साथी के संग भूमिकाएँ
अनगिनत।
मित्र, पत्नी या माँ कब होना है?
स्त्रियाँ भाँप लेती हैं।
रहें चुपचाप तो ठगी जाती हैं,
और बोल दें मन का सच,
तो कटघरे में लाई जाती हैं।
चाहे जो भी हो,
स्त्रियाँ जब प्रेम में होतीं हैं भाँप लेती है।
स्त्रियाँ जब प्रेम में नहीं होतीं,
तब भी भाँप लेती है।
चढ़ती-उतरती प्रतिक्रियाएँ, आचार-विचार, संचार
और रिश्ते में पनपता हर नवाचार, वो हमेशा भाँप ही लेतीं हैं।
फिर भी चुनती हैं अपने लिए वही पुरुष जिसे सौंपा मन,
किया आत्मसमर्पण, दिया सर्वस्व।
बार-बार हर बार भाँपती हैं सब कुछ
फिर भी चुनती हैं।
इसलिए नहीं कि विकल्प नहीं,
बल्कि इसलिए कि वे थक चुकी होतीं हैं,
ठगे जाने से,
कटघरे में आने से,
झूठ बोले जाने से;
वे थक चुकी होती हैं विकल्प खोजते-खोजते,
वे थक चुकी होती हैं,
भाँपते-भाँपते।
और जब
भाँपने के मायने भी झुठलाए जाने
लगते हैं,
तब वो समय भाँप लेती है जाने का,
काटने लगतीं हैं धागे,
समेटने लगतीं हैं ऊर्जा।
स्त्रियाँ सामान बहुत बाद में समेटतीं है।
स्त्रियाँ सबसे पहले भाँपती हैं, तापती हैं, मापती हैं।
स्त्रियाँ जाने से बहुत पहले जा
चुकी होतीं है
मगर स्त्रियाँ फिर भी ठहरतीं हैं,
एक आस के सहारे।
जिस रोज़ वो आस आखिरी साँस लेती है,
उससे कहीं पहले स्त्रियाँ भाँप लेती हैं।
क्योंकि स्त्रियाँ सबकुछ भाँप लेती हैं।





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रचना कुलश्रेष्ठ
yah kavita mel par bheji gai thi hamare pas jachane ki koi vyavstha nahi he fir bhi aapke nam se prakashit kar di gai he