पुष्पा गुप्ता
_चोमोलुंग्मा पहाड़ कहां स्थित है, इसकी खासियत क्या है? क्या आप जानते है ?? सोचिए, क्योकि आप जानते हैं। तब तक हम आपको भारत के सबसे पुराने संस्थान के बारे में जरा बताते हैं :_
बात 1767 की है, दस साल पहले प्लासी की लड़ाई के साथ अंग्रेजो ने भारत पर पहला कदम रख दिया था। जो बात आज के अम्बानी अडानी समझते है, जो आप नही समझते है, वो बात अंग्रेज उस दौर से समझते आ रहे थे। वो यह कि असल जिंदगी तो मुनाफा है, समृद्धि है। और मुनाफा तब आएगा जब गवर्नमेंट अपनी होगी।
तो अंग्रेज व्यापार के साथ गवर्नेस भी अपनी मुट्ठी में कर रहे थे। पहले तो आज ही कि तरह पिट्ठू को गद्दी पर बिठाया। याने मीरजाफर और फिर मीरकासिम को.. पर समझ मे आया कि भारत मे पिट्ठू की रीढ़ कभी कभी उग आती है, और मामला जीतन मांझी की तरह रिस्की हो जाता है। तब सीधे खुद ही राज हाथ मे ले लिया।
अब कम्पनी का राज है, तो राज्य का नक्शा भी होना चाहिए। उस दौर में फलाना नदी, ढिमका पहाड़ी के इस पार, या उस पार हमरा राज है, जैसी भाषा मे बात होती थी। मगर अंग्रेज थे प्रिसिजन और परफेक्शन वाले लोग। उन्हें एक एक डिग्री तक क्लियर डिमार्केशन चाहिए था। कुछ फौजियों, नक्शानवीस (ड्राफ्ट्समैन) और कुछ सिविल इंजीनियरों को मिलाकर एक सेवा बनी। नाम हुआ – “सर्वे ऑफ इंडिया”.
कम्पनी का राज बढ़ता गया, सर्वे ऑफ इंडिया का काज बढ़ता गया। ग्रेट टिगनामेंट्री सर्वे हुआ, एक दो नही कोई पचास साल का प्रोजेक्ट था। इस काम को खत्म करते वाले महानुभाव थे – सर जार्ज एवरेस्ट , सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया..
तो 1 जनवरी 1954 को जवाहरलाल नेहरू ने फॉरेन ऑफिस और सर्वे ऑफ इंडिया को एक पत्र लिखा। लिखा ये कि भैय्या, बहुतेरे स्टेट जो इंडिया में मिले, और जो नया देश कायम हुआ, सबकी बॉउंड्री जरा वेरिफाई करो, और मिलाजुलाकर देश का एक नया नक्शा बनाओ।
तब पुराने सारे नक्शों को जोड़ जाड़कर एक मैप बना। यह मैप सारे स्कूल, कालेज, एम्बेसी, वर्ल्ड गवर्नमेंट्स को भेज गया। यही नक्शा आपने भारत माता की जय कहते हुए कल्पना करते हैं। यही मैप हमारे दिलों दिमाग में बैठा है। और हम इसके लिए बेतरह इमोशनल हैं।
असल मे हुआ ये था, चीन ने जब अक्साई चीन में रोड बनाई, हमने कहा कि भैया ये तो हमारे कश्मीर स्टेट के मैप में आता है। पर सच्चाई यह थी कि उस इलाके में ब्रिटिश जमाने के मैप लीजेंड ( नक्शे के नीचे लीजेंड होता है, जो बताता है कि नक्शे की नीली लाइन फ़्लान चीज है, काले बिंदु ढेकान चीज है, उसको लीजेंड कहते हैं) में भारत की पूर्वी सीमाओं में अनेक स्थान पर “अनडीमार्केटेड” कहा गया था।
हम चुकी बॉउंड्री नेगोशिएट कर रहे थे, रोड बनने की खबर आने पर हमारे चीनी राजदूत गए माओ से मिलने। माओ ने कहा-” भारत चीन के सांस्कृतिक रिश्ते पुराने हैं। सीमा का मसला जैसा कि परम्पराएं है, वैसा सुलझा लेंगे”…
माओ हमसे पोकर गेम खेल रहे थे। पहले कौन ब्लिंक करता है.. हमने किया। नेहरू ने दोतरफा नीति अपनाई। पहला- अंतरास्ट्रीय और कूटनयिक रूप से रूप से चीन के साथ सहयोग, सद्भाव। दूसरी ओर- बॉर्डर में कंसोलिडेशन। हम अपनी ऐच्छिक सीमाओं तक आगे बढ़ने लगे।
तो ऐसे में ब्रिटिश “अनडीमार्केटेड” लिखे नक्शे हमारे क्लेम को कमजोर करते। सो हमने नए नक्शे बनाये। अरुणाचल की ओर मैकमैहन लाइन चीन नही मानता, हमने उसे अपनी बॉउंड्री दिखाया। अक्साई चिन की ओर जॉनसन लाइन वह नही मानता हमने उसे सीमा दिखाई। और फिर ये नक्शे, सारी दुनिया को भेजने के बाद अनक्लेम्ड इलाको को कब्जे में लेने लगे। यही फारवर्ड पॉलिसी थी। चीन को यह आक्रमकता लगी।
क्या पता, नेहरू के मन मे रहा हो कि कल को, सेटलमेंट के लिए माओ को कुछ देना पड़े, तो कुछ बढ़ चढ़कर ही दिखाया जाए। दुकानदार यही करते है। मोलभाव वाले ग्राहक को दुगना रेट बताते है, फिर डेढ़ गुने पर मान जाते है। नेहरू गलत थे। हम दुर्योधन के देश के लोग 5 गांव छोड़ने पर राजी नही होने वाले थे ।
यहां तो गोल्डन पहाड़ियां थी। जाने कितने स्कवेयर फ़ीट प्लॉट होंगे। तिब्बती लड़कियां भी हैं, ब्याह लायक।
1960 में चाउ मोलभाव करने आये, नीचे मैकमैहन लाइन को मान लेने का प्रस्ताव किया। बदले में ऊपर अक्सई चिन में मैककार्टनी लाइन को भारत द्वारा मान्यता देने का अनुरोध किया। यह एक फेयर डील थी। नेहरू खुद और में इसे अवश्य मान लेते।
पर अब तक नेहरू में शायद थकान आ गयी थी। वो जनमत बनाने वाले नही, जनमत के पीछे चलने वाले होकर रह गए। पूरा देश, मीडिया, संसद और नेहरू कैबिनेट के अधिकतर सदस्य इस डील के साफ विरोध में थे। देश की हुंकार साफ थी – ओ नेहरू..सूई की नोक के बराबर जमीन न देना।
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तो नक्शा- नक्शा खेलते जान पर बन आयी। पेन के एक स्ट्रोक पर आप अपनी सीमा रशिया पार तक ले जा सकते हैं। इसे यूनिलेटरल मैपिंग कहते हैं। सर्वे ऑफ इंडिया के 1954 के मैप आज भी हमारी आंखों में बसे है। वही भारत माता है। गलती से किसी इंटरनेशनल एजेंसी के आअसल मैप कोई शेयर कर दे, तो गद्दार साबित हो जाता है।
बात चोमोलुंग्मा से शुरू हुई थी। यह उसी पहाड़ का तिब्बती नाम है, जिसे नेपाली सगरमाथा कहते हैं, और आप माउंट एवरेस्ट.. मगर इसका मतलब यह नही की सर जार्ज एवरेस्ट ने उस पहाड़ को जीतकर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया था, और अब उसके असल उत्तराधिकारी हम हैं। बेचारे ने सर्वे किया था
पर आपको ऐसा सोचने से रोक कौन सकता है। हम ख्याली सीमाओं में जीने वाले लोग है।
_चोमोलुंग्मा पहाड़ कहां स्थित है, इसकी खासियत क्या है? क्या आप जानते है ?? सोचिए, क्योकि आप जानते हैं। तब तक हम आपको भारत के सबसे पुराने संस्थान के बारे में जरा बताते हैं :_
बात 1767 की है, दस साल पहले प्लासी की लड़ाई के साथ अंग्रेजो ने भारत पर पहला कदम रख दिया था। जो बात आज के अम्बानी अडानी समझते है, जो आप नही समझते है, वो बात अंग्रेज उस दौर से समझते आ रहे थे। वो यह कि असल जिंदगी तो मुनाफा है, समृद्धि है। और मुनाफा तब आएगा जब गवर्नमेंट अपनी होगी।
तो अंग्रेज व्यापार के साथ गवर्नेस भी अपनी मुट्ठी में कर रहे थे। पहले तो आज ही कि तरह पिट्ठू को गद्दी पर बिठाया। याने मीरजाफर और फिर मीरकासिम को.. पर समझ मे आया कि भारत मे पिट्ठू की रीढ़ कभी कभी उग आती है, और मामला जीतन मांझी की तरह रिस्की हो जाता है। तब सीधे खुद ही राज हाथ मे ले लिया।
अब कम्पनी का राज है, तो राज्य का नक्शा भी होना चाहिए। उस दौर में फलाना नदी, ढिमका पहाड़ी के इस पार, या उस पार हमरा राज है, जैसी भाषा मे बात होती थी। मगर अंग्रेज थे प्रिसिजन और परफेक्शन वाले लोग। उन्हें एक एक डिग्री तक क्लियर डिमार्केशन चाहिए था। कुछ फौजियों, नक्शानवीस (ड्राफ्ट्समैन) और कुछ सिविल इंजीनियरों को मिलाकर एक सेवा बनी। नाम हुआ – “सर्वे ऑफ इंडिया”.
कम्पनी का राज बढ़ता गया, सर्वे ऑफ इंडिया का काज बढ़ता गया। ग्रेट टिगनामेंट्री सर्वे हुआ, एक दो नही कोई पचास साल का प्रोजेक्ट था। इस काम को खत्म करते वाले महानुभाव थे – सर जार्ज एवरेस्ट , सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया..
तो 1 जनवरी 1954 को जवाहरलाल नेहरू ने फॉरेन ऑफिस और सर्वे ऑफ इंडिया को एक पत्र लिखा। लिखा ये कि भैय्या, बहुतेरे स्टेट जो इंडिया में मिले, और जो नया देश कायम हुआ, सबकी बॉउंड्री जरा वेरिफाई करो, और मिलाजुलाकर देश का एक नया नक्शा बनाओ।
तब पुराने सारे नक्शों को जोड़ जाड़कर एक मैप बना। यह मैप सारे स्कूल, कालेज, एम्बेसी, वर्ल्ड गवर्नमेंट्स को भेज गया। यही नक्शा आपने भारत माता की जय कहते हुए कल्पना करते हैं। यही मैप हमारे दिलों दिमाग में बैठा है। और हम इसके लिए बेतरह इमोशनल हैं।
असल मे हुआ ये था, चीन ने जब अक्साई चीन में रोड बनाई, हमने कहा कि भैया ये तो हमारे कश्मीर स्टेट के मैप में आता है। पर सच्चाई यह थी कि उस इलाके में ब्रिटिश जमाने के मैप लीजेंड ( नक्शे के नीचे लीजेंड होता है, जो बताता है कि नक्शे की नीली लाइन फ़्लान चीज है, काले बिंदु ढेकान चीज है, उसको लीजेंड कहते हैं) में भारत की पूर्वी सीमाओं में अनेक स्थान पर “अनडीमार्केटेड” कहा गया था।
हम चुकी बॉउंड्री नेगोशिएट कर रहे थे, रोड बनने की खबर आने पर हमारे चीनी राजदूत गए माओ से मिलने। माओ ने कहा-” भारत चीन के सांस्कृतिक रिश्ते पुराने हैं। सीमा का मसला जैसा कि परम्पराएं है, वैसा सुलझा लेंगे”…
माओ हमसे पोकर गेम खेल रहे थे। पहले कौन ब्लिंक करता है.. हमने किया। नेहरू ने दोतरफा नीति अपनाई। पहला- अंतरास्ट्रीय और कूटनयिक रूप से रूप से चीन के साथ सहयोग, सद्भाव। दूसरी ओर- बॉर्डर में कंसोलिडेशन। हम अपनी ऐच्छिक सीमाओं तक आगे बढ़ने लगे।
तो ऐसे में ब्रिटिश “अनडीमार्केटेड” लिखे नक्शे हमारे क्लेम को कमजोर करते। सो हमने नए नक्शे बनाये। अरुणाचल की ओर मैकमैहन लाइन चीन नही मानता, हमने उसे अपनी बॉउंड्री दिखाया। अक्साई चिन की ओर जॉनसन लाइन वह नही मानता हमने उसे सीमा दिखाई। और फिर ये नक्शे, सारी दुनिया को भेजने के बाद अनक्लेम्ड इलाको को कब्जे में लेने लगे। यही फारवर्ड पॉलिसी थी। चीन को यह आक्रमकता लगी।
क्या पता, नेहरू के मन मे रहा हो कि कल को, सेटलमेंट के लिए माओ को कुछ देना पड़े, तो कुछ बढ़ चढ़कर ही दिखाया जाए। दुकानदार यही करते है। मोलभाव वाले ग्राहक को दुगना रेट बताते है, फिर डेढ़ गुने पर मान जाते है। नेहरू गलत थे। हम दुर्योधन के देश के लोग 5 गांव छोड़ने पर राजी नही होने वाले थे ।
यहां तो गोल्डन पहाड़ियां थी। जाने कितने स्कवेयर फ़ीट प्लॉट होंगे। तिब्बती लड़कियां भी हैं, ब्याह लायक।
1960 में चाउ मोलभाव करने आये, नीचे मैकमैहन लाइन को मान लेने का प्रस्ताव किया। बदले में ऊपर अक्सई चिन में मैककार्टनी लाइन को भारत द्वारा मान्यता देने का अनुरोध किया। यह एक फेयर डील थी। नेहरू खुद और में इसे अवश्य मान लेते।
पर अब तक नेहरू में शायद थकान आ गयी थी। वो जनमत बनाने वाले नही, जनमत के पीछे चलने वाले होकर रह गए। पूरा देश, मीडिया, संसद और नेहरू कैबिनेट के अधिकतर सदस्य इस डील के साफ विरोध में थे। देश की हुंकार साफ थी – ओ नेहरू..सूई की नोक के बराबर जमीन न देना।
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तो नक्शा- नक्शा खेलते जान पर बन आयी। पेन के एक स्ट्रोक पर आप अपनी सीमा रशिया पार तक ले जा सकते हैं। इसे यूनिलेटरल मैपिंग कहते हैं। सर्वे ऑफ इंडिया के 1954 के मैप आज भी हमारी आंखों में बसे है। वही भारत माता है। गलती से किसी इंटरनेशनल एजेंसी के आअसल मैप कोई शेयर कर दे, तो गद्दार साबित हो जाता है।
बात चोमोलुंग्मा से शुरू हुई थी। यह उसी पहाड़ का तिब्बती नाम है, जिसे नेपाली सगरमाथा कहते हैं, और आप माउंट एवरेस्ट.. मगर इसका मतलब यह नही की सर जार्ज एवरेस्ट ने उस पहाड़ को जीतकर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया था, और अब उसके असल उत्तराधिकारी हम हैं। बेचारे ने सर्वे किया था
पर आपको ऐसा सोचने से रोक कौन सकता है। हम ख्याली सीमाओं में जीने वाले लोग है।





