मुनेश त्यागी
वकीलों के एक स्वतंत्र संगठन ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन ने अपने एक वक्तव्य में मांग की है कि भारत सरकार न्यायपालिका को डराने, धमकाने और कब्जाने की मुहिम बंद करे। उसने कानून मंत्री द्वारा न्यायपालिका को धमकाने वाले बयान की भी कठोर आलोचना की है।
केंद्रीय मंत्री ने अपने बयानों में कहा है कि जब तक नई व्यवस्था कायम नहीं की जाती तब तक उच्च न्यायपालिका में रिक्तियों और नियुक्ति का मामला यूं ही उठता रहेगा। भारत के उपराष्ट्रपति भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने भी संसदीय कानून के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक पुनरीक्षण की शक्ति को लेकर न्यायपालिका की खुली आलोचना की है और उस पर बेबुनियाद दोषारोपण किया है। केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई लोगों को जमानत दिए जाने से भी खुश नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय में सरकार के कि कई नीतियों पर सवाल उठाए हैं जिन्हें लेकर भी सरकार एकदम असहज स्थिति में है। वह नहीं चाहती कि कोई संस्था उसकी नीतियों पर उसके कार्यक्रम पर उसके कदमों पर कोई नुक्ताचीनी करें
ये तमाम बयानात और हालत न्यायपालिका को दोषारोपित करने वाले और डराने वाले हैं और अधिनायकवाद और फासीवाद स्थापित करने वाले और न्यायपालिका को पालतू बनाने वाले हैं। जनतंत्र, समय-समय पर होने वाले चुनावों और विधायिका की सर्वोच्चता से, बड़ी चीज है। संवैधानिक अदालत को दी गई न्यायिक पुनरीक्षण की शक्ति, हमारे संविधान की बुनियादी संरचना है। विधायिका की सर्वोच्चता ही जनतंत्र है, वाली मान्यता, जनतांत्रिक तरीके से अधिनायकवाद और फासीवाद की स्थापना करने वाली मुहिम है।
इसलिए उपरोक्त बयान पूर्ण रूप से गलत एवं निंदनीय है जो न्यायपालिका की आजादी का सीधा सीधा हनन हैं जो कतई भी विश्वासनीय और स्वीकार्य नही है। न्यायपालिका पर सरकार द्वारा किए जा रहे इन हमलों में आर एस एस भी सरकार के साथ है। यह सब दर्शाता है कि न्यायपालिका की उपरोक्त आलोचना सद्भावनापूर्ण नहीं है। ये सब एक सोची-समझी, मनमानी और एकजुट कार्यवाहियां हैं ताकि न्यायपालिका पर गलत तरीके से दबाव डाला जा सके।
अगर कोई स्वतंत्र संस्था राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाने की वकालत करती है तो इसे वर्तमान कॉलेजियम व्यवस्था की आलोचना करने को कार्यपालिका की सर्वोच्चता को बढ़ाने वाली नहीं कहा जा सकता और ना ही यह न्यायपालिका की आजादी में हस्तक्षेप करने वाली है। सरकार की उपरोक्त तमाम कार्यवाहियां न्यायपालिका की कार्यप्रणाली में मनमाना और अनचाहा हस्तक्षेप है।
जब तक एक जनतांत्रिक, स्वतंत्र और पारदर्शी व्यवस्था कायम नहीं की जाती, तब तक सरकार, कोलिजियम प्रणाली में अधिनायकवादी रुख नही अपना सकती। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में जजों की नियुक्ति और तबादले में हो रही फिलहाल की गतिविधियां और टालमटोल, एआईएलयू की राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की नियुक्ति की मांग को न्यायोचित ठहराती है।
केंद्र सरकार ने विभिन्न हाईकोर्टों में कॉलेजियम द्वारा किए गए जजों के तबादले और नियुक्तियों को ठुकरा कर, उसका अपमान किया है। केंद्र सरकार बहुत दिनों से कॉलेजियम द्वारा की गई नियुक्तियों को ठुकरा कर न्यायपालिका की आजादी में हस्तक्षेप कर रही है। उसे न्यायपालिका की आजादी स्वीकार्य नहीं है। वह न्यायपालिका का भगवाकरण करने पर तुली हुई है।
एआईएलयू जैसी स्वतंत्र संस्था, बहुत समय से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के जजों के तबादले, नियुक्तियों और मिसकंडक्ट को तय करने की मांग को लेकर, संवैधानिक आधार पर राष्ट्रीय न्यायिक आयोग को स्थापित करने की मांग करती चली आ रही है, ताकि स्वस्थ जनतंत्र और न्यायपालिका की आजादी की सुरक्षा की जा सके।
इस राष्ट्रीय न्यायिक आयोग में न्यायपालिका के सभी अंगों न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका, इंडियन बार और भारतीय समाज और जनता के प्रतिनिधि होंगे। इसमें न्यायपालिका या कार्यपालिका की मनमानी और प्रभुत्व नहीं होगा।
इस विषय में एआईएलयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा राज्यसभा में राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बिल 2022 पेश किया गया, एक सही दिशा में, सही कदम है। इस प्रस्ताव में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कानून मंत्री का कोई रोल नहीं होगा। इस राष्ट्रीय कमीशन में भारत का अटार्नी जनरल होगा और दो स्वतंत्र और प्रसिद्ध एवं जानेमाने सदस्य होंगे, जो प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और नेता विपक्ष द्वारा पेश किए गए पैनल में से सर्वोच्च न्यायालय की फुल कोर्ट द्वारा चुने जाएंगे।
इस प्रकार वर्तमान समय में राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की स्थापना, भारत के जनतंत्र को मजबूत करने और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने का सबसे अहम कदम है। इसकी स्थापना किए बिना भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कायम नहीं रखा जा सकता है।





