पुष्पा गुप्ता
खुले पैसों के झंझट से बचने के लिए फोन पर और खाते में पैसे लेने वाले भक्तों को जीएसटी का दैत्य अब समझ में आ रहा है। अगर आपने गौर किया हो तो फोटो कॉपी करने वालों ने नोटबंदी के समय दर बढ़ाकर दो रुपए कर दिए थे।
काफी समय से यह दर चल रही थी लेकिन नोटबंदी के समय फोटो कॉपी की जरूरत इतनी बढ़ गई कि बाजार में फोटो कॉपी वालों की चांदी रहने लगी। मोबाइल लोकप्रिय और सस्ता होने के बाद एसटीडी पीसीओ का धंधा बंद होने से परेशान दुकानदारों के लिए यह लॉटरी खुलने जैसा था।
ग्राहकों ने भी विरोध नहीं किया और सीधे 100 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो अभी तक जारी है।
मोदी सरकार के अच्छे कामों में एक यह भी था और इसीलिए था। इसके बाद जीएसटी आया तो छोटे दुकानदारों को मंदिर का नया जोश था और पेटीएम का प्रचार। कमाई (दर) सीधे दूनी हो चुकी थी सो जीएसटी का विरोध करने वाले बेईमान और टैक्स चोर नजर आए।
भाई लोगों ने फायदे गिनाए। और काला धंधा ‘बंद’ हो गया। कोरोना में पता चला कि एनसीआर में मामूली सी दुकान का भी औसत किराया 500 रुपये रोज था। मतलब रोज की 250 प्रति तो किराए में गई। बाकी खर्चे अलग।
धीरे-धीरे ऐसी दुकानों में मोबाइल एसेसरीज बिकने शुरू हुए। कोई कंप्यूटर पर टाइप करने लगा आदि आदि।
एक-दो और 10 रुपए प्रति ग्राहक का काम करने वाले धंधा चाहे जितना करते हों 20 लाख से नीचे ही थे। पर बजार में दुकान और नई भक्ति। सबने जीएसटी पंजीकरण करा लिया और पुरानी शैली में रिटर्न फाइल करते रहे।
उधर, जब नए पंजीकरण का कोई फायदा नजर नहीं आया, लक्ष्य मिलने लगे और पूरे नहीं हुए तो छापे पड़ने लगे। नई-नई सेवाओं को जीएसटी के दायरे में लिया गया और जो छूट देनी पड़ी वह अपनी जगह है ही।
ऐसे में हालत यह है कि दुकानों में अब लिखकर लगा दिया गया है कि नकद भुगतान नहीं करने पर (किसी भी तरह डिजिटल भुगतान करने पर) 18 प्रतिशत जीएसटी लगेगा।
फोटो कॉपी पर 18 प्रतिशत जीएसटी है या नहीं मैं नहीं जानता पर 5 प्रतिशत भी हो तो दुकानदार कैसे वसूले और कैसे जमा कराए। जाहिर है उसकी कमाई से जाएगा और जब टर्नओवर 20 लाख से कम हो तो मुनाफे यानी बच्चों के दूध या बुजुर्गों की दवाई में कटौती से जाएगा। और अब तो उसकी भी कीमत आसमान छू रही है।
दुकानदार को सतर्क करने के लिए मैंने बताया कि यह सूचना सीधे-सीधे स्वीकारोक्ति है कि आप नकद भुगतान पर टैक्स नहीं लेते हैं। और वह गलत है। रसीद मांगने का नियम और प्रोत्साहन इसीलिए है।
इसे हटा दो नहीं तो फंस जाओगे। उसने बताया कि वह फंस चुका है, हार्ट अटैक झेल चुका है और अब मरने से नहीं डरता है। मैं उसे अतिरिक्त तनाव न दूं। कोई रास्ता नहीं है।
समस्या यह है कि एक रुपए में फोटो कॉपी करे या दो रुपये 36 पैसे से ले और ले तो कैसे? वैसे तो फोटो कॉपी की जरूरत कम हो रही है और घर पर स्कैनर – प्रिंटर हो तो कोई बात ही नहीं है।
इसलिए यह धंधा भी बंद होगा और चलेगा तो पांच दस रुपए का भी हो सकता है। सरकार को जीएसटी चाहिए, धंधा हो या नहीं।
अगर आपका जीएसटी पंजीकरण है तो सरकार को पता है कि आप क्या बेचते हैं और अगर पकौड़े बेचते हैं तो पूछा जा सकता है कि भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण एफएसएसएआई का पंजीकरण है कि नहीं।
पहले छोटे कारोबारी इन झंझटों से मुक्त रहते थे अब काला धन खत्म करना है। सरकार का साथ देना सबका धर्म है।





